किसान आंदोलन की राह निकालना आवश्यक है



Farmers Protest


कोरोना की समस्या में उलझते गिरते -पड़ते साल 2020 निकल गया, किंतु जाते-जाते किसानों की समस्याओं को सबके सामने ले आया। ये सच है कि अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों की आमदनी दिन प्रतिदिन घटती चली गई और धीरे -धीरे किसान बेहद दयनीय हालात में पहुंचा गए। मौजूदा समय में कड़ाके की सर्दी में जिस प्रकार तमाम किसान अपनी लड़ाई(Farmers Protest) लड़ रहे हैं उसने देश भर में लोगों को खासा चिंतित किया है। केंद्र सरकार ने शुरू में उन्हें लेकर असंवेदनशीलता जरूर दिखलाइए किंतु बाद में वह भी गंभीरता से हल खोजती नजर आई। पर अभी भी समस्या जस की तस है और कोई ठोस सलूशन नहीं निकल पाया है। 

वहीं साल 2021 का पहला महीना शुरु हो चुका है और अब तक इसके हल की सुगबुगाहट तक नजर नहीं आ रही है। 

सरकार द्वारा एमएसपी(MSP) पर आश्वासन और बिजली बिल सहित दूसरे कानूनों को लेकर थोड़ी ढील जरूर दी गई है, लेकिन जिस प्रकार से तमाम किसान संगठन तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं उसने वार्ता की गति को एक तरह से रोक दिया है। जैसा की सभी जानते है कि कृषि सुधार कई सालों से पेंडिंग पड़े हुए थे और इसे लेकर पिछली यूपीए सरकार में कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने भी बयान दिया कि कृषि सुधार वह भी करना चाहते थे लेकिन तमाम राज्यों के विरोध के बाद उन्होंने इसे स्थगित कर दिया। जाहिर तौर पर कृषि सुधार शुरू से ही एक बड़ा मुद्दा रहा है किंतु इसे समन्वयवादी तरीके से किया जाना आवश्यक है। बेहतर होता कि यह कानून लागू होने से पहले देश में एक आम राय बनाई गई होती और तमाम राज्यों के कृषि मंत्रियों को इस संबंध में विश्वास में लिया गया होता है। तब संभवतः कृषि कानून पर इतने विवाद की स्थिति खड़ी ही नहीं होती। 

हालाँकि अब यह सुगबुगाहट जरूर आ रही है कि बजट में हरियाणा और पंजाब के किसानों को कुछ अलग प्रावधान दिए जा सकते हैं, तो किसानों को लेकर भी कुछ अतिरिक्त घोषणाएं की जा सकती हैं। किंतु सवाल यही उठता है कि क्या यह तमाम उपक्रम पहले नहीं किए जा सकते थे!


वहीं बूढ़े -बुजुर्ग जिस प्रकार से ठंड में दिल्ली के बॉर्डर पर दिन और रात व्यतीत कर रहे हैं उसने सभ्य समाज पर एक प्रश्न तो खड़ा किया ही है, परंतु क्या इन बुजुर्ग किसानों की समस्याओं के लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार है?  तमाम किसान संगठनों को भी वार्ता में गति लाने के लिए क्यों प्रयास नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं जिस प्रकार से पंजाब में रिलायंस के एसेट को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है उसे भी कहीं से जायज नहीं ठहराया जा सकता। जबकि रिलायंस ने कोर्ट में यह आश्वासन दिया है कि उसकी कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में कोई रुचि नहीं है। 

अगर ध्यान दिया जाये तो रिलायंस का यह बयान उद्योगपतियों और इन्वेस्टर्स को हतोत्साहित करने वाला है। वहीं किसान संगठनों को भी यह समझना होगा कि जब तक कृषि के क्षेत्र में बड़ी इन्वेस्टमेंट नहीं आएगी और जब तक उसमें बाजार से प्रतिस्पर्धा करने की काबिलियत विकसित नहीं होगी तब तक कृषि क्षेत्र में ठोस परिवर्तन आना आसान नहीं है। 

वहीं सब्सिडी के ऊपर किसान आखिर कब तक चलते रहेंगे, यह भी एक बड़े प्रश्न का आकार लेता जा रहा है। आखिर कहीं ना कहीं तो कृषि सुधारों को सरकार द्वारा लागू करना ही पड़ेगा तो अभी क्यों नहीं? इस सन्दर्भ में विशेषज्ञों की कमेटी क्यों नहीं बनाई जा सकती और उस कमेटी के बनने तक या प्रावधान के बनने तक सरकार को भी कानूनों को लागू करने से बचने का आश्वासन दे देना चाहिए। 

Farmers Protest


 यह सत्य है कि भारत में एक चुनी हुई सरकार है और चुनी हुई सरकार को सिर्फ प्रदर्शनों के आधार पर कानून बनाने या ना बनाने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है। अपने हक़ की बात, अपनी मांग जरूर रखी जा सकती है। यहाँ तक कि अदालत के माध्यम से उस पर आपत्ति जताई जा सकती है, विरोध प्रदर्शन के माध्यम से सरकार का दरवाजा खटखटाया जा सकता है, किंतु कानून व्यापक हित को देखकर लागू किये  जाते हैं और उस व्यापक हित को किसी भी दबाव में छोड़ा नहीं जा सकता। 

तो आइए 2021 में किसान समस्या को सॉल्व करने के लिए जागरूकता फैलाई जाए। इसके साथ ही उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार और तमाम किसान संगठन इसे लेकर एक व्यावहारिक नजरिया प्रदर्शित करेंगे और यही इस आंदोलन की सफलता भी है। आंदोलन के माध्यम से किसानों की समस्याओं से हमारा समाज अवगत हुआ है और इसे इसकी सफलता मानी जानी चाहिए, परंतु कृषि सुधार आज देश में बड़ी जरूरत है और इसे तमाम आपत्तियों को सुलझा कर अवश्य ही लागू करनी चाहिए, इस बात में दो राय नहीं है। 

-विंध्यवासिनी सिंह 

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