पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव तय करेगा भाजपा का 'वर्चस्व'


2021 West Bengal Legislative Assembly election


भारतीय जनता पार्टी बेहद सधी हुई चालें चल रही है।  एक-एक करके वह तमाम क्षत्रपों और स्थापित पार्टियों की जड़ों को हिलाती जा रही है। देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर वह पहले ही कमजोर कर चुकी है, या यूं कहा जाए कि कांग्रेसी खुद ही बीजेपी के सामने सुपर कमजोर साबित हो गई है। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक चुटकुला शेयर किया जा रहा था जिसके अनुसार कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी के पुनः अध्यक्ष चुने जाने की खबर से सर्वाधिक खुश भाजपा के लोग थे। मतलब कि राहुल गांधी कांग्रेस को जब जब संभाल लेंगे तब तक भाजपा अच्छी सीटें निकालेगी और  कांग्रेस की चुनौती दिन पर दिन कमजोर होती जाएगी। बहरहाल कांग्रेस को छोड़ दिया जाए तो बिहार में नरेंद्र मोदी के सामने नीतीश कुमार एक बड़ी चुनौती थे, लेकिन धीरे-धीरे नीतीश कुमार को अपने भीतर भाजपा ने समेट लिया।  बिहार विधानसभा चुनाव में जिस प्रकार नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के बावजूद नीतीश को भाजपा ने पंगु किया वह राजनीति का बेहद सधा हुआ दाव था। 

जम्मू कश्मीर से धारा 370 खत्म करके भाजपा ने पहले ही अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं।  जिसके बाद अभी हाल ही में हुए डीडीसी इलेक्शन में बीजेपी ने कश्मीर घाटी में भी अपना खाता खोल लिया है। जहां यह कहा जाता था कि भाजपा का खाता नहीं खुलेगा वहां इसे एक सकारात्मक संदेश माना जा रहा है।  

हालाँकि महाराष्ट्र में जरूर एनसीपी कांग्रेस और शिवसेना की तिकड़ी सरकार में है किंतु भाजपा जानती है कि विचारधारा के स्तर पर शिवसेना बहुत लंबे समय तक महाराष्ट्र में इन दलों के साथ नहीं रह सकेगी। उस पर से शरद पवार की उम्र काफी अधिक हो चुकी है और उन्हीं के कंधों पर महाराष्ट्र की सरकार भी टिकी हुई है तो अंततः भाजपा के हाथ में ही महाराष्ट्र की बागडोर आनी है।

कर्नाटक में भाजपा पहले से जमी हुई है, वहां कांग्रेस और जेडीएस की सरकार को गिरा कर जिस प्रकार भाजपा के येदुरप्पा सरकार में आए उसे देखकर हैरान राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधरों ने दांतों तले उंगलियां दबा लीं। अब कहा तो यहां तक जा रहा है कि एच डी देवगौड़ा के बेटे कुमार स्वामी जेडीएस यानी जनता दल सेक्युलर का भाजपा में विलाय कर सकते हैं।  

तेलंगाना की बात करें तो हैदराबाद में नगर निगम चुनाव में हमने देखा भाजपा ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया और टीआरएस की सीटों में से अच्छी खासी सीटें अपने पाले में कर लीं। 
उधर तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद राजनीतिक रूप से बड़ा गैप बना हुआ है ऐसे में एआईडीएमके के साथ चुनाव लड़ने की घोषणा करके भाजपा ने भविष्य की राजनीति की योजनाओं को अमल में लाना शुरू कर दिया है। 
उड़ीसा में भी बीजू जनता दल की राजनीति नवीन पटनायक के ऊपर टिकी हुई है और वह भी राजनीति के आखिरी पड़ाव पर ही नजर आते हैं। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान और संबित पात्रा जैसे नेता उड़ीसा में पहले ही काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। 
पूर्वोत्तर में भाजपा पहले ही अपनी जड़ें जमा चुकी है ऐसे में देखा जाए तो पश्चिम बंगाल उसके लिए सबसे कठिन चुनौती बना हुआ है। हालांकि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जरूर 18 सीटें जीतकर लोगों को चौंका दिया किंतु विधानसभा में उसकी असली परीक्षा होनी बाकी है। 

2021 West Bengal Legislative Assembly election


मीडिया की मानें तो भाजपा ममता बनर्जी की पार्टी को चौंका सकती है और मीडिया की इसी हाइप को बड़े चुनाव रणनीतिकार के रूप में स्थापित हो चुके प्रशांत किशोर ने चैलेंज किया है और कहा है कि अगर 100 सीटों से अधिक भाजपा ने हासिल कर लिया तो वह राजनीति का कार्य छोड़ देंगे। प्रशांत किशोर भी जानते हैं कि उनकी चुनौती में पहले जैसी धार नहीं है, क्योंकि शुभेंदु अधिकारी जैसे बड़े नेता जो तृणमूल छोड़ कर जा चुके हैं वह पार्टी को खासा नुकसान पहुंचा सकते हैं केवल शुभेंदु ही क्यों और भी कई नेता तृणमूल के खेमे से जा चुके हैं। 

ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि जिस प्रकार से भारतीय जनता पार्टी जी -जान लगाकर पश्चिम बंगाल के चुनाव के मुकाबले में आने की कोशिश कर रही है वह कितना रंग लाती है। यही निश्चित करेगा कि भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व आने वाले दिनों में भिन्न राज्यों में किस हद तक कायम रहेगा। पश्चिम बंगाल का किला जीतने का मतलब सिर्फ एक राज्य को हासिल करना नहीं होगा बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे। ममता बनर्जी अभी भी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक मजबूत आवाज हैं और अगर पश्चिम बंगाल में बीजेपी उनको 'चित्त' कर देती है तो फिर संपूर्ण भारत में उसके राजनीतिक वर्चस्व से शायद ही किसी को इनकार होगा। 

इस लेख के सन्दर्भ में क्या कहते हैं कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं 

-विंध्यवासिनी सिंह


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