google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 बचकानी राजनीति से जनता को क्या संदेश दे रहे हैं 'बीजेपी और शिवसेना'

बचकानी राजनीति से जनता को क्या संदेश दे रहे हैं 'बीजेपी और शिवसेना'

जब 24 अक्टूबर को महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के परिणाम आये तब लोग यह उम्मीद लगा रहे थे कि हरियाणा में बीजेपी की दोबारा सरकार नहीं बन पाएगी क्योंकि वहां मनोहर लाल खट्टर को बहुमत नहीं मिला था। लेकिन यहाँ बीजेपी ने जेजेपी के साथ मिलकर एक बार पुनः हरियाणा में सरकार बना लिया।

इसके उलट महाराष्ट्र के बारे में लोग निश्चिंत थे कि वहां सरकार बन जाएगी क्योंकि जनता ने भाजपा और शिवसेना गठबंधन को बहुमत से अधिक यानी कुल 163 सीटें हैं प्रदान की है।

पर शायद इसी को राजनीति कहते हैं क्योंकि हरियाणा में जहां बीजेपी के लिए सरकार गठित करना मुश्किल लग रहा था तो वहां सरकार गठित हो गई और एक स्थाई रूप में चलती हुई नजर आ रही है। जबकि महाराष्ट्र में  सरकार गठित होने की संभावना थी तो वहां 50-50 का मैच चल रहा है। इसी मामले में असदुद्दीन ओवैसी ने  तंज कसते हुए कहा है कि 'मार्केट में नया 50-50 बिस्किट आया है'। 
Maharashtra Govt Bjp Shiv Sene (Pic: jansatta)

गौरतलब है कि शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी दोनों महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई लड़ रहे हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जहां खुद को ही 5 साल मुख्यमंत्री बनाए रखने पर अड़े हुए हैं वहीं शिवसेना भारतीय जनता पार्टी की इस मजबूरी को बखूबी समझ रही है।  

शिवसेना यह जानती है कि उसके साथ सरकार बनाने के अतिरिक्त भाजपा के पास कोई चारा नहीं है और इसीलिए वह ढाई साल के लिए अपना मुख्यमंत्री मांग रही है। वह यह कहने से नहीं चूक रही है कि चुनाव के पहले खुद अमित शाह ने 50-50 सत्ता की साझेदारी का वादा किया था।

इस बीच शिवसेना के संजय राउत कभी शरद पवार से मिलते हैं तो कभी कांग्रेसी नेता सोनिया गांधी से शिवसेना को समर्थन देने का पत्र लिखते हैं. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि महाराष्ट्र में  राजनीतिक सरगर्मियां कभी बढ़ जा रही हैं तो कभी घट जा रही हैं।

प्रश्न उठता है कि पिछले ढाई दशकों से अधिक समय से जब दोनों दल एक हैं तो फिर उनके अंदर इतनी बेसिक समझ क्यों नहीं है? संयुक्त रूप से सरकार बनाने का जनादेश मिलने के बाद इस तरह  बच्चों की माफिक लड़ रहे हैं! इसी लड़ाई को शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता ने बचकाना बताते हुए कहा है कि 'एनसीपी' विपक्ष में बैठने को ज्यादा महत्वपूर्ण समझती है।

मौजूदा समय में महाराष्ट्र की राजनीति में आये इस द्वन्द के  कारणों की पड़ताल करेंगे तो आपको दो कारण मुख्य रूप से नजर आएंगे।

पहला फैक्टर बीजेपी की बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा है और उसमें भी देवेंद्र फडणवीस की वह राजनीति है जिसके तहत उन्होंने महाराष्ट्र में प्रधानमंत्री मोदी की तर्ज पर खुद को स्थापित करने की कोशिश की है। इसके तहत महाराष्ट्र बीजेपी के कई नेताओं को उन्होंने किनारे तक लगाया है जिसका नतीजा यह है की इस मामले में कोई बड़ा नेता अपना मुँह नहीं खोल रहा है।

राजनीति के एक्सपर्ट इसी को कारण बता रहे हैं कि बीजेपी की सीटें पिछले चुनाव के मुकाबले  इस बार कम आई हैं। इसका नतीजा यह निकला है कि बीजेपी थोड़ी कमजोर हुई और शिवसेना को सौदेबाजी करने का मौका मिल गया। ज्ञात हो कि पिछली बार बेहद मजबूरी में और विवश होकर शिवसेना बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हुई थी।

दूसरा बड़ा कारण शिवसेना की कमान अपने हाथ में रखने वाला ठाकरे परिवार है जिसके नए खिलाड़ी आदित्य ठाकरे मैदान में आए हैं। इस बार शिवसेना यह समझ रही है कि किसी न किसी प्रकार बीजेपी पर दबाव बनाकर आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री पद पर आसीन किया जाए। इसके पीछे दो कारण नजर आते हैं एक ठाकरे परिवार के वर्चस्व को शिवसेना हमेशा कायम रखना चाहती है तो दूसरी ओर एक पिता के तौर पर कहीं ना कहीं उद्धव ठाकरे के मन में अपने बेटे के लिए लालच भी है। 

वह शायद यह नहीं समझ रहे हैं कि अभी आदित्य ठाकरे राजनीति में ठीक से एंटर भी नहीं हुए हैं और उनके पास अभी लंबा समय है। वहीं  शिवसेना की मजबूरी यह है कि बीजेपी जिस  प्रकार राज्य में लगातार छोटे भाई की स्थिति से निकलकर बड़े भाई की भूमिका में आई है वह शिवसेना की राजनीति के लिए ठीक नहीं है. तो वहीं  दूसरी तरफ  शिवसेना के नीति -निर्माता यह खतरा भी देख रहे हैं कि बीजेपी को आज काबू नहीं किया गया तो वह बाद में काबू में नहीं आएगी। 
Maharashtra Govt Bjp Shiv Sene (Pic: indianexpress)

एक तरह से यह वर्चस्व की लड़ाई है क्योंकि 2 लोकसभा चुनावों और 2 विधानसभा चुनावों में शिवसेना की स्थिति बीजेपी के मुकाबले लगातार कमजोर हुई है. जिसके चलते वह खुद को बड़ा भाई ना सही लेकिन कम से कम बराबरी पर जरूर लाना चाहती है। इसी प्रयास के लिए ये सारी राजनीतिक बचकानियाँ की जा रही है।

हालांकि विशेषज्ञ बता रहे हैं कि अंततः सरकार बीजेपी और शिवसेना की ही बनेगी और अगर वास्तव में दोनों दलों को यही करना है तो फिर इस तरह की  खींचतान का क्या लाभ है? यह दोनों पार्टियों के नेताओं को अवश्य सोचना चाहिए कि जनता के बीच निश्चित रूप से इसे लेकर बेहतर संदेश नहीं जा रहा है।

-विंध्यवासिनी सिंह 

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