google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 पीएम मोदी की भतीजी का स्नैचिंग मामला: शुरुआती अपराधों पर लगनी चाहिए रोक

पीएम मोदी की भतीजी का स्नैचिंग मामला: शुरुआती अपराधों पर लगनी चाहिए रोक

Pic: snatching (Image: hindustantimes)
हाल ही में दिल्ली में बड़ा चर्चित मामला हुआ जिसमें गुजरात से दिल्ली आयीं पीएम मोदी के भाई की लड़की के साथ स्नेचिंग की घटना हुई। पहले तो इस घटना को लेकर पुलिस ने गंभीरता नहीं दिखाई लेकिन जैसे ही पता चला कि यह मामला हाईप्रोफाइल है सैकड़ों पुलिसकर्मी युद्ध गति से इस मामले को सुलझाने पर लग गए। खबरों के मुताबिक 700 से अधिक पुलिसकर्मियों ने 200 से अधिक सीसीटीवी फुटेज खंगाल डालें और बड़ी जल्दी अपराधियों को धर दबोचा। जाहिर तौर पर यह मामला एक तरह से सराहनीय भी दिखता है कि पुलिस सक्रिय होकर बड़ी जल्दी अपराधियों को पकड़ लेती है, लेकिन दूसरी तरफ मामला संगीन भी दिखता है क्या वाकई हर मामले में पुलिस इतनी ही सक्रिय होती है?

अगर आप सिर्फ दिल्ली की बात करें तो इस साल सितम्बर तक स्नैचिंग के मामले में 4,762 केस दर्ज किया गया। वहीं दिल्ली पुलिस के मुताबिक सिर्फ 2,686 मामलों को सुलझाने में ही सफलता मिली है। आप समझ सकते हैं है कि देश की राजधानी में हालात ऐसे हैं तो फिर छोटे- मोटे शहरों की क्या स्थिति होगी? हालाँकि इस आंकड़े के विषय में दिल्ली पुलिस का कहना है कि स्नेचिंग में चुराए गए छोटे- मोटे सामानों को ठिकाने लगाना आसान होता है इसलिए चोर पकड़े नहीं जाते। अब ये तो स्नेचिंग की बात है लेकिन दिल्ली में बढ़ते अपराधों से आंख नहीं चुराया जा सकता। इसमें कोई शक नहीं है कि देश की बेहरीन पुलिस फ़ोर्स में शामिल दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे अपराध धड़ल्ले से जारी है।
इन आंकड़ों से अलग बड़ा सवाल यह भी उठता है कि इस तरह की घटनाएं इतनी ज्यादा कैसे हो रही हैं? जाहिर तौर पर यह समाज में उथल पुथल का ही परिणाम है। अगर आप ध्यान से देखें तो जो आरोपी पकड़े गए हैं उनको अपने द्वारा किये गए अपराध पर किसी बात का कोई पछतावा नहीं है। क्योंकि छोटी- मोटी चोरियां वह घर चलाने के लिए करते थे और स्नैचिंग के मामले में उन्हें पता है कि बहुत ज्यादा सजा नहीं होगी और वह छूट भी जाएंगे।

लेकिन सवाल यह उठता है कि छूटने के बाद ये अपराधी क्या करेंगे? क्या ये अपराध करना बंद कर देंगे?  पहली या दूसरी बार अपराध करने पर अगर अपराध के कारणों की पड़ताल ना की जाए तो सिर्फ सजा देने से अगली बार अपराध करने का चांस बढ़ जाता है। इतना ही नहीं छोटी वारदात के बाद हौसला बढ़ जाता है और बड़ी वारदात होती है और लगातार जारी रहता है।

इन सब में सबसे अहम् बात यह है कि पुलिस और दूसरी सामाजिक संस्थाएं  इस सन्दर्भ में क्या पहल कर रही हैं। क्या पुलिस का काम सिर्फ अपराधियों को पकड़ कर जेल भेजने तक ही सीमित है? पुलिस द्वारा छोटे- मोटेअपराधों के सन्दर्भ में निश्चित रूप से कुछ दीर्घकालीन कानून लाए जाने चाहिए ताकि समाज का स्ट्रक्चर बेहतर हो सके। इस तरह से सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी इस दिशा में ठोस कदम उठाये जाने की जरुरत है। उनके द्वारा यह जानना और पता लगाया जाना चाहिए कि क्यों आसानी से लोग अपराध का रास्ता चुन लेते हैं और इसको रोकने के लिए क्या जरुरी कदम उठाया जाये। इसके बाद संभवत इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हो सकेगी! आप क्या कहते हैं?

-विंध्यवासिनी सिंह 


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