google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 जनसँख्या नियंत्रण: असम से सीख लेने की जरुरत

जनसँख्या नियंत्रण: असम से सीख लेने की जरुरत

Pic: malhaarmedia
वर्ल्ड  पापुलेशन  प्रॉस्पेक्टस  2017 की रिपोर्ट में इस बात का अनुमान स्पष्ट तौर पर लगाया गया था कि अगले 7 सालों में भारत आबादी के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ देगा। बता दें कि मौजूदा समय में चीन की आबादी 1।4 अरब है तो वहीं भारत की आबादी 1।3 अरब है। हालाँकि की क्षेत्रफल के मामले में चीन भारत से बड़ा है। इतना ही नहीं विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की आबादी साल 2050 तक 1.66 अरब के आंकड़े छू जाएगा।  

निश्चित तौर पर किसी भी विकासशील देश के लिए बढ़ती जनसंख्या परेशानी खड़ा करने वाली बात होती है। क्योंकि इस समय देश में संसाधनों की संख्या बेहद कम होती है और उपभोग करने वालों की संख्या बढ़ती जाती है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि  ऐसे देश की स्थिति क्या होगी?  इसी संदर्भ में जनसँख्या को लेकर  असम सरकार ने एक बेहद सकारात्मक कदम उठाते हुए दो से अधिक बच्चे वाले परिवार को सरकारी नौकरी से वंचित करने का आदेश जारी किया है। हालांकि इस आदेश के कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलू हो सकते हैं मगर इसमें कोई शक नहीं है कि  बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की  जरूरत है। बता दें कि इस समय असम की जनसंख्या 3 करोड़ 11 लाख 69 हज़ार के आसपास है।

जनसँख्या बृद्धि के घातक परिणाम
 कहा जाता है कि भारत युवाओं का देश है और यहां विश्व के मुकाबले सबसे अधिक युवा हैं। लेकिन अगर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और आर्थिक मामलों में पर्याप्त उपलब्धता ना हो तो एक बड़ी युवा की फौज अभिशाप के रूप धारण कर सकती है। जी हां आपके पास भले ही युवाओं की फौज हो लेकिन युवाओं को करने के लिए कोई काम ना हो, रोजगार के अवसर उपलब्ध ना हो तो ये अनावश्यक बोझ बन जायेंगे। सीधे शब्दों में कहा जाये तो अगर शक्ति से नियम बनाकर जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण नहीं किया गया तो निसंदेह बेरोजगारी, गरीबी, स्वास्थ्य के मामले इतने ज्यादा बिगड़ जाएंगे की बाद में इन्हे संभालना बेहद मुश्किल काम होगा। 

यह कोई कहने वाली बात नहीं है कि बढ़ती जनसँख्या से परिणाम बेहद घातक आने वाले हैं बल्कि यह लोग अब महसूस कर रहे हैं। जब संसाधन कम हों और जनसँख्या बढ़ा रही हो तो ऐसे में लोगों के रहन सहन पर तो बुरा असर पड़ता ही है साथ ही उसका मस्तिष्क भी इससे बुरी तरह से प्रभावित होता है। आप जब घर से बाहर निकलते हैं तो 15 मिनट के रस्ते का सफर आप 1  घंटे में तय करते हैं, किसी भी कम के लिए घंटो लाइन लगाना और हर जगह अनावश्यक भीड़ आपके दिमाग को परेशान करता है।  
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बढ़ती जनसँख्या को रोकने के लिए 'राष्ट्रिय नीति' की आवश्यकता
इंदिरा गांधी के शासन काल में लागू हुए 21 महीने के आपातकाल को भला कोई कैसे भूल सकता है। इस आपातकाल के दौरान संजय गाँधी के द्वारा चलाये गए 'नसबंदी अभियान' को भी भुलाया नहीं जा सकता। कैसे जबरन नसबंदी के नाम पर उन युवाओं की भी नसबंदी की गयी जिनकी न तो शादी हुई थी और ना ही जिनके बच्चे थे। हालाँकि उस समय इन अभियान का मकसद सर जनसँख्या नियंत्रण ही था लेकिन जनमानस में इसका बहुत ही गलत सन्देश गया और इसके बाद इंदिरा गाँधी की सत्ता को लोगों ने उखाड़ फेंका। शायद उसी का परिणाम है कि आज तक कोई भी राजनीतिक पार्टी जनसँख्या नियंत्रण को लेकर कोई ठोस कदम उठाना तो दूर इसके बारे में बोलती तक नहीं है। 

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर ही अपने भाषणों में बढ़ती जनसँख्या को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं और लोगों को इसके लिए जागरूक करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के ये विचार बेहद सकरात्मक हैं और लोगों को उनसे उम्मीद भी है कि वो इस दिशा में कोई सकरात्मक कदम उठाएंगे। बढ़ती जनसँख्या को रोकने के लिए एक 'राष्ट्रिय नीति' की सख्त आवश्यकता है जो धर्म ,जाती और संप्रदाय से ऊपर हो हो। इसके लिए ऐसा नहीं कहा जा रहा है कि जबरन किसी कि नसबंदी कर दी जाये मगर इस समस्या को हल्के में लेना भी गलत है। सर्वप्रथम इसके लिए देशव्यापी 'जन जागरूकता' अभियान चलाना चाहिए और लोगों के दिमाग में यह बात डालनी चाहिए कि ज्यादा बच्चे देश के साथ उनके लिए भी मुशीबत बन जायेंगे। 

इसके बाद धीरे धीरे नियमों को सख्त किये जाने की आवश्यकता है। आप देखेंगे कि कुछ राज्य जैसे: बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड में जनसंख्या वृद्धि की दर 3.5 प्रतिशत के ऊपर है जबकि दक्षिण भारत में 1.7 से 2.1 प्रतिशत के आसपास है। वहीं केरल और तमिलनाडु में तो जनसँख्या वृद्धि ऋणात्मक हो गयी है। ऐसे में तेजी से जनसँख्या बढ़ा रहे राज्यों पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है जबकि जो राज्य आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।
जनसँख्या विस्फोट को लेकर पहले ही बहुत देर हो चुकी है ऐसे में इस समस्या के विकराल रूप धारण करने का इंतजार करना मूर्खतापूर्ण होगा।

-विंध्यवासिनी सिंह 






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