google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 इतिहास में फंसे रहना हमारी सबसे बड़ी गलती

इतिहास में फंसे रहना हमारी सबसे बड़ी गलती



Gandhi and Godse
भारत जैसी सभ्यता किसी भी देश की नहीं रही है। जितनी प्राचीन यह सभ्यता है उतनी ही प्राचीन समाज को चलाने की इसकी प्रणाली में तमाम तरह के ज्ञान भारत ने विश्व को दिया है।  तमाम तरह की नवरचना भी भारतीयों ने ही की पर क्या कभी आपने सोचा है कि बावजूद इन सबके हम हजारों साल तक गुलाम क्यों रहे? और आजाद होने के बाद भी तकरीबन 70 साल बाद भी हम आज विकासशील या कहें कि पिछड़े देशों में क्यों गिने जाते हैं? इसके पीछे कोई बहुत बड़ा लॉजिक नहीं है बल्कि एक घटना को जो आजादी के तुरंत बाद घटी उस पर हो रही वर्तमान चर्चा से समझ सकते हैं। देश आजाद हुआ उस की आजादी में महात्मा गांधी सहित तमाम स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया और निश्चित रूप से यह सभी के समग्र प्रयास का नतीजा था, पर आजादी के बाद ही देश दो टुकड़ों में बंट गया भारत और पाकिस्तान के रूप में। 


 उस समय के महान राजनेता महात्मा गांधी की मौजूदगी में यह बंटवारा हुआ। बंटवारा होना कोई बड़ी बात नहीं थी क्योंकि तमाम देश बंटते रहे हैं और जुड़ते  रहे हैं, किंतु महात्मा गांधी के तमाम गुणों के बावजूद उस वक्त की उनकी चुप्पी लोगों को अखरती रही है।

 चुप्पी का अभिप्राय यह है कि जब भारत-पाकिस्तान बंटने की कगार पर आ गए तब महात्मा गांधी जैसे बड़े नेता ने इसे वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं किया। यहाँ तक कि उनका बयान आया की उनकी लाश पर बंटवारा होगा। 

इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान साइड में  जो हिंदू लोग थे वह कंफ्यूज हो गए कि बंटवारा नहीं होगा, क्योंकि वो लोग महात्मा गांधी पर अगाध श्रद्धा रखते थे। हालाँकि बंटवारा हुआ और विश्व के इतिहास में सबसे बड़ा संप्रदायिक दंगा भी हुआ। लाखों लोग काट डाले गए और उस दंगे के फल स्वरुप आज तक भारत पाकिस्तान की दुश्मनी जगजाहिर है।

People during 1947 voilence 

 जिस प्रकार 84 के दंगों के लिए कांग्रेस जिम्मेदार समझी जाती है, तमाम राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी साबित करते हैं, किंतु 1947 में हुए इतने बड़े भीषण दंगे की नैतिक जिम्मेदारी शायद ही किसी ने ली हो। जाहिर तौर पर महात्मा गांधी ही उस समय में सबसे बड़े थे और उनके प्रभाव में रहते आक्रोष उत्पन्न हुआ और यह आक्रोश सामाजिक आक्रोश था। रिचर्ड एटनबरो की पिक्चर में भी गांधी के खिलाफ इस आक्रोश को दिखाया गया है कि किस प्रकार कई समूह गांधी से नाराज थे। नाराज ही नहीं थे वह उनकी हत्या कर देना चाहते थे।

 अगर आप बंटवारे के बाद पाकिस्तान छोड़कर दिल्ली इत्यादि शहरों में रिफ्यूजी बने उन लोगों से बात करेंगे तो  आपको अंदाजा हो जाएगा कि महात्मा गांधी के प्रति उनका नजरिया कैसा है?


इतना बड़ा निर्णय जो कि भीषण हिंसा में बदल गया इसके बाद लोगों के मन में आक्रोश उत्पन्न होना लाज़मी है, लेकिन इस आक्रोश में किसी की हत्या कर दी जाये इसे भी जायज नहीं ठहराया जाना चाहिए। नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या कर दी गयी, इस हत्या की निंदा होनी चाहिए जो आज भी हो रही है और आगे भी यह क्रिटिसाइज की जाती रहेगी।

महात्मा गांधी ने निश्चित रूप से हमारे देश को बहुत कुछ दिया, लेकिन इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि उनकी आलोचना नहीं की जा सकती। कई हलकों में उनकी आलोचना हुई भी है लेकिन उनकी हत्या को किसी भी सभ्य समाज में जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

 इसके साथ ही  नाथूराम गोडसे के इस कृत्य का भी महिमामंडन नहीं किया जा सकता है, पर इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम इतिहास में डूबे रहकर वर्तमान को किस प्रकार सुधार सकते हैं?

महात्मा गांधी की हम कितनी भी प्रशंसा कर लें उससे क्या हमारा वर्तमान बदल जाएगा? हम नाथूराम गोडसे की चाहे जितनी बुराई कर लें उससे क्या हमारा वर्तमान बदल जाएगा? अगर बदलना होता तो भारत में सबसे ज्यादा भगवान के अवतार हुए हैं, सभी धर्मों के यहां प्रवर्तक रहे हैं, और एक से बढ़कर एक सामाजिक धार्मिक राजनीतिक नेतृत्व यहाँ  रहा है, एक से बढ़कर एक साहित्य यहां सृजित हुआ है, पर हम हैं तीसरी दुनिया के देश! यह एक सच्चाई है और इस सच को कोई नकार नहीं सकता, और इसका सिर्फ और सिर्फ कारण यही है कि हम इतिहास में डूब कर उस में खो जाते हैं और वर्तमान को सुधारने के प्रति चिंतित नहीं होते हैं।

Modi in press conference

हमें नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी से आगे बढ़कर अपने वर्तमान को ध्यान में रखना चाहिए  और उसी के अनुरूप कार्य भी करना चाहिए। आखिर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो बहुत कम मुद्दों पर अपना बयान देते हैं उन तक को नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी की इस हालिया  मुद्दे पर कठोर बयान देना पड़ा। ऐसा कतई नहीं है कि इतिहास की चर्चा नहीं होनी चाहिए। लेकिन इतिहास में हम इस कदर खो जाते हैं कि वर्तमान को भूल जाते हैं और इतिहास के बल पर ही हम राजनीति और समाज को राह दिखाना चाहते हैं जो किसी भी प्रकार से व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता है।

हमारे जीवन में ऐतिहासिक घटनाओं का अहम् स्थान है और उन ऐतिहासिक घटनाओं से हमें सीखना भी चाहिए। उसके नायक और खलनायकों को ईमानदारी से अध्ययन भी करना चाहिए, पर क्या हमें उसमें डूब जाना चाहिए? यह एक ऐसा प्रश्न है जो प्रत्येक भारतीय को खुद से पूछना चाहिए कि हम क्यों महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे जैसे पुराने मुद्दों को बार-बार उभारते हैं? इतना ही नहीं पूरा देश उसी चर्चा में मशगूल भी हो जाता है। इतिहास को शांत चित  के अध्ययन करना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए।


उसमें से वह कुछ सीखता है यह उसका अपना अधिकार है। अगर कोई नाथूराम गोडसे के किसी कृत्य को अपनी दृष्टि से देखता है तो क्या उसका अधिकार छीन सकते हैं? उसी प्रकार से अगर महात्मा गांधी की नीतियों को जो लोग पूजते हैं, उनका भी आदर सम्मान किया जाना चाहिए। इससे होगा यह कि अगर दोनों पक्षों को संवेदनशील होकर नहीं देखेंगे तो मात्र एक अध्ययन का मुद्दा रहेगा। किंतु अगर इन तमाम पक्षों को आप भावनात्मक रूप से  देखेंगे तो यह अध्ययन के मुद्दे से बढ़कर चर्चा का मुद्दा हो जाएगा, विवाद का मुद्दा हो जाएगा। जो निश्चित रूप से यह आपके वर्तमान को मटियामेट कर देगा। अगर ऐसा नहीं है तो एक बार पुनः भारतीय इतिहास को शुरू से देख लीजिए।

-विंध्यवासिनी सिंह 


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