google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 राजनीति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए

राजनीति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए

2019 का आम चुनाव आने वाला है, डुग -डुगी बज चुकी है। तमाम नेता अपने अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार कर रहे हैं।कहने को तो यह कोई नई बात नहीं है मगर यही तो खूबसूरती है लोकतंत्र की, कि प्रत्येक 5 साल बाद किसी भी नेता को जनता के सामने जाना ही पड़ता है। इतना ही नहीं उसे ना केवल अपने कार्यों का हिसाब देना पड़ता है बल्कि भविष्य की योजनाएं भी पेश करनी होती है। और इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था की खूबसूरती तब और बढ़ जाती है जब यह सारा कार्य बिना किसी हिंसा के होता है। देशभर में सामान्य तौर पर ऐसी स्थितियां है कि कई जगह पर प्रतिद्वंदी मजबूत है तो कहीं राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर स्थापित भारतीय जनता पार्टी बहुत मजबूत स्थिति में है, तो कहीं पर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस मजबूत है इतना ही नहीं  कई जगहों पर क्षेत्रीय दल भी काफी  मजबूत है। इन सबके बीच जब भी चुनावी मौसम आता है तो अनावश्यक हिंसा की खबरें आने लगती हैं। हालाँकि जिस राज्य में हिंसा होती है है वहां की राज्य सरकार इसको नियंत्रित करने की पूरी कोशिश करती है, लेकिन पश्चिम बंगाल का ऐसा राज्य है जहां अनियंत्रित  हिंसा होने की खबरें आती रहती हैं और ऐसा लगता है कि राज्य का पुलिस प्रशासन इस पर नियंत्रण पाने की कोशिश भी नहीं करता। वैसे पश्चिम बंगाल में यह स्थिति आज की नहीं है बल्कि कम्युनिस्टों के राज से ही हिंसा की राजनीति वहां चलती रही है। पश्चिम बंगाल के साथ केरल में भी हिंसा की राजनीति की खबर आती है और इन 2 राज्यों को छोड़ दिया जाए तो राज्य के चुनाव हो चाहे राष्ट्रीय स्तर के चुनाव हो इन दोनों जगहों के अलावा देशभर में सामान्यतः शांति से चुनाव संपन्न होते हैं। अगर आप पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाएं देखें तो आप आसानी से समझ सकते हैं कि किस प्रकार से यहाँ कि राजनीति में हिंसा ने अपनी जगह बना ली है।

राजनीतिक झड़पों का रक्तरंजित बंगाली इतिहास 
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर अगर आप एक नजर डालें तो साल 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी, वहीं साल 2015  में छोटी-बड़ी घटनाओं को मिला दिया जाये हिंसा के 131 मामले दर्ज किये गए और इन घटनाओं में 184 लोग हिंसा के शिकार हुए। 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। साल 2017  की बात करें तो 58 हिंसक घटनाये हुई जिनमें 9 लोगों की मौत हुई और लगभग 200 लोग घायल हुए। इसके साथ ही साल 2018 की रामनवमी के जुलूस के दौरान आसनसोल-रानीगंज में भड़की हिंसा को कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें 5 पांच लोग मारे गए और 5 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति हिंसा की बलि चढ़ गयी। ये तो हाल- फ़िलहाल साल के आंकड़े है और आप इतिहास देखें तो 60-70 के दशक से ही पश्चिम बंगाल की राजनीति हिंसा में लिप्त रही है।
बीजेपी की सक्रियता ने भी बढ़ाई है हिंसा 
इसमें कोई शक नहीं है कि शुरुआत से ही बंगाल में वामदल और तृणमूल का राज रहा है लेकिन कुछ सालों से जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी बंगाल की राजनीति में सक्रीय हुई है उससे वहां के पुरानी राजनीतिक पार्टियों की सुहा नहीं रहा है। बीजेपी वहां की राजनीतिक रूप से उपेक्षित हिन्दुओं की आवाज होने दावा कर रही है और यह जता रही है कि ममता सरकार मुसलमानों की पैरोकार है और अगर बीजेपी की सरकार आती है तो उपेक्षित हिन्दुओं को उनका अधिकार मिल सकेगा। वहीं ममता बनर्जी भी इसी तरह से मुसलमानों को डर दिखा रही हैं कि अगर बीजेपी बंगाल में कामयाब हो गयी तो मुसलमानों के लिए ठीक नहीं होगा और अपना पूरा जोर लगा रही हैं मुस्लिम तुस्टीकरण में। अहम् बात यह है कि इन दोनों गुटों में अक्सर इस बात को लेकर टकराहट बढ़ जाती है जिसका नतीजा अक्सर हिंसा के रूप में सामने आता है।

हाल फिलहाल भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में जोर लगाए हुए हैं और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में चोटी का जोर लगाए हुए हैं जाहिर तौर पर एक लेवल पर तनातनी स्वभाविक है। किंतु यह स्थिति हिंसा में बदल जाए इसे किसी भी स्थिति में जायज नहीं ठहराया जा सकता। अभी कुछ दिन पहले ही अमित शाह की काफिले पर पथराव हुए हैं और यह भी खबरें छपी हैं कि जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से इस संबंध में कानून व्यवस्था बनाए रखने का आग्रह किया वह उनसे भी झगड़ पड़ी। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता ही झगड़े की शुरुआत करते हैं। यह बिल्कुल ही अजीब तर्क है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता शुरुआत करते हैं चाहे कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता शुरुआत करते हैं चाहे खुद तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता इस चीज की शुरुआत करते हैं,बात हिंसा के शुरुआत कि नहीं बल्कि बात यह है कि इस हिंसा को नियंत्रित क्यों नहीं किया जाता है? अंततः  कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, राज्य सरकार को इसे निभाने में जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए और किसी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। ममता बनर्जी राज्य के मुख्यमंत्री हैं पुलिस प्रशासन पर उनका पूरा नियंत्रण है और वह अपनी जिम्मेदारी से भाग कैसे सकती है। एक तरफ  ममता बनर्जी सभी दलों को मिला कर लोकतांत्रिक फ्रंट का गठन कर रही है और  कहा जा रहा है कि देश की संभावित प्रधानमंत्री पद की दावेदार हो सकती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं मगर क्या वो देश को भी ऐसा ही माहौल देंगी जैसा अभी पश्चिम बंगाल में है। जब वो एक राज्य में हिंसा को रोक पाने में असमर्थ है तो वो किस प्रकार से इतने विशाल देश को हिंसा मुक्त रख पाएंगी?
कुल मिलाकर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होनी चाहिए, वह पश्चिम बंगाल हो,केरल हो चाहे उत्तर प्रदेश कोई भी अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता है। अगर कोई ऐसा करता है तो निसंदेह ही देश की जनता उसे 2019 के चुनाव में सबक सिखाएगी।   

-विंध्यवासिनी सिंह                                                          ,     

Post a Comment

0 Comments