google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 महिलाओं के साथ होने वाले अपराध के लिए कितना जिम्मेदार है समाज? Social Responsibility In Women Violence

महिलाओं के साथ होने वाले अपराध के लिए कितना जिम्मेदार है समाज? Social Responsibility In Women Violence




 एक मल्टीनेशनल रिसर्च संथान थॉमसन रॉयटर्स फ़ाउंडेशन ने  अपने सर्वे में ये बात कही है कि  “सांस्कृतिक परंपराएं, यौन हिंसा और मानव तस्करी” के आधार पर भारत महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश है. वहीं यह सर्वे कितना सही है और कितना गलत इस लम्बी चर्चा का विषय हो सकता है लेकिन अभी 27 जून को मध्य प्रदेश के मंदसौर में 7 साल की बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई है उसके बाद किसी चर्चा की गुंजाइस नहीं बचती. और यही घटना क्यों सुबह से लेकर शाम तक अख़बारों, न्यूज चैनलों और समाचार के हर माध्यमों से आपको महिलाओं व बच्चियों के यौन शोषण व उत्त्पीडन, धर्म, जाति और अंधविश्वासी परंपराओं के नाम पर ग़रीबों और दलितों पर अत्याचार की खबरें मिलती रहती हैं. लेकिन कुछ घटनाएं जब मानवता की सीमा को पार कर जाती हैं तब लोगों का धयान उस पर जाता है. ऐसे ही जब दरिंदगी की मिशाल देते हुए 'निर्भया कांड' हुआ तो सारा देश जाग गया और सबका खून उबल पड़ा. देश के हर कोने से अपराधियों के लिए सजा की मांग हुई और बेटियों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा किया गया. वहीं सरकार ने भी 2013 में आनन -फानन में कई सारी योजनाएं बना डाली जिसमें 600 ऐसे केंद्र का निर्माण शामिल था जिसमें  एक ही छत के नीचे पीड़ित महिला को चिकित्सा, कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराया जा सके यहाँ तक कि निर्भया फंड के नाम पर 100 करोड़ का प्रावधान भी पेश किया गया जो कि अब बढ़ कर 300 करोड़ तक हो चूका है. हालाँकि इन सबका कोई असर नजर नहीं आ रहा है. अगर हम 2015  के अपराध के आंकड़ों पर नजर डालें तो 34,000 से ज्यादा सिर्फ बलात्कार के मामले सामने आये वहीं 2016 में यह आंकड़ा बढ़ कर 34,600 को भी पार कर गया. और अभी भी इसका बढ़ना जारी है. 


हमारी संस्कृति 
यह कहना गलत नहीं होगा कि दुनिआ भर में भारत केवल ऐसा देश है जहाँ औरतों की पूजा होती है. पुरुष देवताओं के साथ ही महिला देवियों की भी उपासना की जाती है. नवरात्रों में मानव कन्याओं के पैर पूजे जाते है और उन्हें देवी के स्थान पर बैठाया जाता है. रक्षाबंधन के त्यौहार पर अपना भाई या बहन ना होने पर गली - मोहल्ले के लड़के लड़कियों से राखी बांधना या बंधवाना सहज बात है. जहाँ घरों में औरतों को सम्मान और सुरक्षा देने का पाठ पढ़ाया जाता है.


कहाँ से आते हैं ये दरिंदे
ये सवाल बिलकुल वाजिब है कि जब चारों तरफ इतना अच्छा माहौल है तो फिर वो लोग कहाँ से आते हैं जो गणपति विसर्जन के दौरान  झुण्ड बना कर किसी लड़की को घेर लेते हैं, बस या ट्रेन में खड़ी महिला को पीछे से छेड़ते हैं. चौराहो पर खड़े हो कर महिलाओं पर फब्तियां कस्ते हैं और मौका मिलते ही किसी मासूम के साथ हैवानियत करने से भी पीछे नहीं हटते. इस तरह के लोगों के हौसलें इतने बुलंद कैसे हो जाते हैं कि ये कुछ भी करने से पहले हिचकते नहीं. ये किसी और दुनिया या ग्रह से तो नहीं आते हैं न बल्कि ये हमारे ही समाज का हिस्सा होते हैं.


कितना जिम्मेदार है समाज 
कुछ समय पहले किसी मुहल्ले के बुजुर्ग सभी के चाचा, दादा या काका हुआ करते थे. उस महल्ले की लड़कियां सभी की बहन और बेटी हुआ करती थी. किसी लड़की को अकेले देखने पर लोग हक से पूछ देते थे कि यहाँ क्या कर रही हो. वैसे ही किसी मुहल्ले वाले को कहीं देखने पर किसी लड़की या लड़के के मन में यह डर होता था कि वो हमें देख रहे हैं. मगर यह नजारा अब देखने को नहीं मिलता. मोहल्ला तो दूर अपनी बिल्डिंग के लोगों को भी अब लोग नहीं पहचानते है. एक दूसरे से अजनबी होते जा रहे हैं लोग. अगर रोड पर कुछ मनचले आवारगर्दी करते नजर आते हैं तो लोग मुँह फेर कर वहां से जल्दी से निकल लेते हैं. फिर क्या हक है हमें ऐसी घटनाओं पर छाती पीटने और सरकार या पुलिस को दोष देने का. जहाँ तक मेरा मानना है तो इन सब घटनाओं के पीछे सबसे अधिक समाज का रोल है. कोई छोटी स्कूली बच्ची कहीं अकेली जा रही है तो उसे टोकना किसी की जरुरत नहीं है, कोई लड़की अकेली बस स्टैंड पर खड़ी है तो उसे सुरक्षित महसूस कराना किसी की जिम्मेदारी नहीं है. फिर हम कितना भी कैंडल मार्च कर लें , शोसल मिडिया का डीपी काली कर लें उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. शुरू से ही समाज में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग रहे हैं लेकिन जब अच्छे लोग शिथिल पड़ जाते हैं अपने कर्तब्य को भूलने लग जाते हैं तब बड़ी आसानी से बुरे लोग उभर जाते हैं . याद रखिये अभी भी अपराधी गिने -चुने हैं और भले और सभ्य लोगों की संख्या ज्यादा है बस कमी है तो उनके  जगाने और अपने कर्तब्य को समझने की. ये समस्या हमारी है तो उपाय भी हमे ही सोचना होगा. 


- विंध्यवासिनी सिंह 



 




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1 Comments

  1. सौ फीसदी सही कहा आपने.. इसके लिए आज का समाज ही जिम्मेदार है

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