पांच राज्यों के चुनाव ने तोड़े कई भ्रम तो, गढ़े नए समीकरण- Assembly Election 2017 Results Analysis



पांच राज्यों में चुनाव के संपन्न होने के साथ ही पिछले कुछ दिनों से चल रही उठापटक भी शांत हो रही है. अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्री के नामों की घोषणा हो चुकी है तो वहीँ कुछ ने सपथ भी ग्रहण कर लिया है. लेकिन इन सब के बीच हम एक नजर डालेंगे पांचों राज्यों के परिणामों और विभिन्न पार्टियों के नीतियों पर.

उत्तरप्रदेश - अभी -अभी संपन्न हुए चुनाव में भाजपा ने वैसे तो पंजाब को छोड़कर बाकि चारों राज्यों  में सरकार बना ली है किन्तु उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के अलग ही मायने हैं. सबसे बड़े राज्य होने के साथ -साथ केंद्र की राजनीति में भी इस राज्य का अहम् रोल रहता है. तमाम एग्जिट पोल ये दावा तो कर रहे थे कि यूपी में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी मगर किसी को भी ये अंदाजा नहीं था कि भाजपा को 300प्लस सीटें मिलेंगी. वहीँ अगर इस अप्रत्याशित जीत की बिन्दुयों पर नजर डालेंगे तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी.

मोदी लहर हावी रही-  उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस बात को लेकर शुरू से बातों का बाजार गर्म था कि बीजेपी में मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा. क्योंकि विरोधी पार्टियों में पहले से ही निश्चित था कि यही सीएम बनेंगे. एक बसपा की मुखिया मायावती थीं तो दूसरी तरफ सपा से युवा चेहरा अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी ठोक रहे थे. इन दोनों को लोगों ने पहले भी आज़मा लिया है, वहीँ मोदी का जादू लोगों के दिमाग पर हावी था.  इसी का फायदा  उठाते हुए बीजेपी ने यहाँ प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर चुनाव में उतरना उचित समझा क्योंकी उनकी लोकप्रियता अभी भी सबसे अधिक है और साफ -सुथरे छवि के नेता हैं. एक और बात  उत्तरप्रदेश  के हर क्षेत्र के अलग -अलग नेता होने से किसी एक नाम की घोषणा से वो अन्य की नाराजगी लेने से बचना चाहती थी. वहीँ वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए तमाम राजनीतिक दाव भी यहाँ काम आये मसलन कब्रिस्तान -शमशान, दिवाली -रमजान वगैरह.  इसके साथ ही पीएम  मोदी की धुएंदार रैलियां और उन रैलियों में जम कर अखिलेश शासन की बखिया उधेड़ना भी अहम् रहा. ज्ञात हो कि सपा के शासन कल में गुंडा राज अपने चरम पर था, औरतों के प्रति बढ़ते अपराध भी चिंता का विषय था. इन सब मुद्दों पर पीएम मोदी खूब गरजे और लोगों को एहसास दिलाया कि उत्तर प्रदेश कि हालात में सुधार तभी आ सकता है जब बीजेपी कि सरकार बनेगी. खैर ये तो बीजेपी का पक्ष है किन्तु अन्य पार्टियों ने भी बहुत सारी गलती कर बीजेपी कि रह को और आसान बना दिया.
  
 सत्ता विरोधी लहर- समाजवादी पार्टी के शासन को लेकर जनता में जबरदस्त उबाल था, दंगे और अपराध तो वजह थे ही साथ ही में सपा के खिलाफ एंटी यादव माहौल भी था. तमाम सरकारी नौकरियों और भर्तियों में  जिस तरह से यादव को ठूस- ठूस कर भरा जा रहा था उससे अन्य जातियों में बेहद नाराजगी थी. और तो और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास विकास के नाम पर गिनाने को आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे और स्टेट हाईवे के सिवाय कुछ नहीं था. जबकि आम जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग धंधे के क्षेत्र में विकास चाहिए जहाँ अखिलेश सरकार खरा नहीं उतर पाई. इसके साथ ही कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर सपा जिस मुस्लिम वोट की आस लगाए बैठी थी तो इनका ये दाव भी उल्टा पड़ गया. क्योंकि बसपा पहले 100 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतर कर मुस्लिम समीकरण बिगाड़ चुकी थी और इसके उलट गैर यादव और हिन्दू वोट एकत्र हो गए जिसका फायदा बीजेपी को मिला. सपा का पारिवारिक कलह भी एकअहम् वजह है अखिलेश के हाथ से सत्ता जाने का क्योंकि अंत तक मुसलमान जो कि सपा के कोर वोटर्स कहे जाते हैं असमंजस में थे कि किसे वोट देना है. और इस तरह मुस्लिम वोटों का एक मुश्त सपा के पक्ष में न गिरना भी बीजेपी कि जीत की मुख्य वजह बनी.

बिना तैयारी के मायावती - आम तौर पर कम सक्रीय रहने वाली बसपा इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में सबसे पहले अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया था. जिसमे 101  सिर्फ मुस्लिम प्रत्यासी थे. इसके बावजूद भी वो करिश्मा नहीं कर पायी जिसकी उसे उम्मीद थी. बसपा की इस हर की वजह उसकी सोशल इंजिनयरिंग बताई जा रही है जिसमें बसपा पूरी तरह से फेल हो गयी. आप बसपा के मत प्रतिसत जो की 22 प्रतिशत है को देखें तो सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि उसके कोर वोटर्स कहीं नहीं गए बल्कि बसपा को ही वोट दिए हैं मगर अन्य जातियों को साथ न लाना इस बार उसको महंगा पड़ गया. सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम और दलित वोट के सहारे सत्ता में वापिस आने का माया का सपना चकनाचूर हो गया. अत्यधिक मुस्लिम प्रत्यासी उतारने से मुस्लिम वोटों का बिखराव भी भाजपा के लिए सत्ता में आने का अहम् कारण बना. 
और जब उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार है  तो उसके कंधो पर वो जिम्मेदारियां भी है जिनका वादा पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान किया था. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री 'योगी आदित्यनाथ' के सामने भी कम चुनौतियाँ नहीं है क्योंकि अपनी हिंदुत्ववादी और मुस्लिम विरोधी छवि के साथ प्रदेश में सामंजस्य बिठाना और विकास करना काफी चुनौतीपूर्ण रहेगा.


गोवा- गोवा विधान सभा चुनाव में भी मुकाबला त्रिकोणीय था ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था लेकिन परिणाम आने पर पता चला कि आम आदमी पार्टी तो रेस में थी ही नहीं और मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही था. गोवा में भाजपा की दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही थी क्योंकि वहां बीजेपी की सरकार थी और मनोहर पर्रिकर जैसा नेता भी लेकिन बावजूद इसके बीजेपी खास  कमाल नहीं कर पायी.  बीजेपी को जहाँ 13 सीटें मिलीं वहीँ कांग्रेस ने 17  सीटें अपने हक़ में की और आम आदमी पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पायी. अगर हम बीजेपी के सन्दर्भ में बात करें तो गोवा में  2012 में मनोहर पर्रिकर की अगुवाई में बीजेपी ने बहुमत की सरकार बनाई थी और मुख्यमंत्री के तौर पर पर्रिकर को लोगों ने खूब पसंद भी किया, लेकिन वहीँ जब उन्हें केंद्र में जिम्मेदारी सौंपी गयी तो उनकी जगह गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर को बनाया गया. चुनावी नतीजों से स्पष्ट है कि गोवा कि जनता ने लक्ष्मीकांत पारसेकर को पसंद नहीं किया. पारसेकर से लोगों की नाराजगी की वजह ये मानी जाती है कि उनकी छवि  साफ सुथरी नहीं है उन पर कई तरह के भ्रस्टाचार के आरोप हैं और तो और उन्होंने अपने क्षेत्र के युवाओं के लिए भी कुछ काम नहीं किया ऐसे में जनता के बीच पारसेकर के लिए बेहद निराशा थी और वो चुनाव में अपनी सीट तक नहीं बचा पाए. और इन सब के बीच एक बार फिर लोगों का झुकाव कांग्रेस की तरफ होता दिखा. 2014 की हार के बाद खुद को फिर से जिंदा करने की कोशिश में जुटी कांग्रेस गोवा में अपने सहयोगी दल एनसीपी के अलग होने से भी खाशी मुश्किलों में थी. गौरतलब है कि एऩसीपी ने 17 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था. जाहिर तौर पर इन सभी उलझनों से कांग्रेस की सीटें कुछ कम रह गयीं. 
 वहीँ कांग्रेस से  कम सीटों के बावजूद बीजेपी अन्य दलों के सहयोग से गोवा में सरकार बना ली है और एक बार फिर पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने गोवा के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है. खास बात यह रही कि गोवा में सरकार बनाने के लिए बीजेपी को समर्थन देने वाले 9 में से 7 विधायकों को मंत्री बनाया गया है कुल 9 विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जिनमें महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के 2, गोवा फॉरवर्ड पार्टी के 3, बीजेपी के 2 और 2 निर्दलीय विधायक शामिल हैं. 
अब जब बीजेपी की सरकार है और मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री तो देखना होगा कि क्या वो अपना जादू फिर से कायम  कर पाते हैं. इसके साथ ही गोवा के युवाओं के लिए रोजगार उपलब्ध करना  भी एक बड़ी चुनौती होगी बीजेपी के लिए.


उत्तराखंड- कांग्रेस शासित इस राज्य में अब बीजेपी की सरकार है और मुख्यमंत्री है 'त्रिवेंद्र सिंह रावत'.  उत्तराखंड राज्य का यह रिकार्ड रहा है सत्ता परिवर्तन का यानि कि अगले चुनाव में सरकार बदल जाने की लेकिन कांग्रेस इस रिकार्ड को तोड़ने की पुरजोर कोशिश करते दिखी मगर नाकामयाब होकर सत्ता से बाहर हो गयी है. अगर हम कांग्रेस के हारने की वजहों पर गौर करें तो तमाम ऐसे कारण है -जैसे  उत्तराखंड में कांग्रेस शासित हरीश रावत सरकार लगातार विवादों में रही और खुद मुख्यमंत्री रावत भी  भ्रष्टाचार के आरोप में घिरते नजर  आये. कुछ दिनों पहले ही बागी विधायकों की वजह से राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया था. वहीँ रावत सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल होना भी कांग्रेस के हार की अहम् वजह बनी. वहीँ अगर हम उत्तराखंड में विकास की बात करें तो मुख्यरूप से  इस राज्य में आमदनी का श्रोत पर्यटन है मगर इस क्षेत्र में विशेष ध्यान नहीं दिया गया. अन्य राज्यों के अपेक्षा उत्तराखंड में विकास की गति धीमा होना भी लोगों को नागवार गुजरा और सत्ता परिवर्तन के लिए लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ वोटिंग की.

उत्तराखंड में बीजेपी को मिली बड़ी जीत के बारे में बात करें तो बीजेपी के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह ने इस राज्य में अपनी सरकार लाने के लिये एड़ी से चोटी का जोर लगा दिया था. केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के साथ ही अमित शाह ने इस राज्य पर अपनी नजरें गड़ा दी थीं और उत्तराखंड कांग्रेस में सेंधमारी करनी शुरू कर दी थी.  यशपाल आर्य और विजय बहुगुणा जैसे कांग्रेस के पुराने और दिग्गज नेताओं को बीजेपी में शामिल कराना इसी मुहीम का हिस्सा था . तो वहीँ चुनाव के दौरान लगातार  रावत सरकार और कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए प्रदेश में ऐसा माहौल बनाया गया कि कांग्रेस सिर्फ भष्टों की पार्टी है. यहाँ तक की हरीश रावत भी कई सारे घोटालों में जुड़े हैं और इस बात को  बीजेपी के बड़े नेताओं और खुद प्रधानमंत्री मोदी ने भी  चुनाव प्रचार के दौरान खूब उछाला. और सबसे अहम् बात बीजेपी लोगों को विश्वास दिलाने में कामयाब रही कि अगर बीजेपी की सरकार आती है तो राज्य में पर्यटन के विकास पर ध्यान दिया जायेगा जिससे यहाँ रोजगार बढ़ेगा. लोगों ने इस बात को महसूस किया और इसका परिणाम है कि बीजेपी दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज है. लेकिन बीजेपी के लिये भी चुनौतियाँ वही हैं पहाड़ी लोगों के लिए बेहतर रोजगार और अगर ऐसा नहीं हुआ तो उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन का रिकार्ड चलता रहेगा.

मणिपुर - ऐसा माना जाता रहा है कि पुर्वोत्तर के राज्यों में भाजपा का कोई आधार नहीं है मगर इस बार के चुनाव में ये भ्रम भी टूट गए क्योंकि 60 सीटों वाले विधानसभा में बीजेपी को 21  सीटें मिली हैं.  हालाँकि 28 सीटों पर जीत दर्ज कर कांग्रेस ने लीड जरूर बनायी है मगर अन्य दलों के समर्थन से बीजेपी ने सरकार बना ली है और मुख्यमंत्री का ताज सजा है 'एन. बिरेन सिंह' के सर पर. ज्ञात हो कि मणिपुर में लगातार 15 सालों से कांग्रेस का शासन था और इस दरम्यान इस राज्य में बहुत सारे दंगे और आपराधिक घटनाएं हुईं. इसलिए ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि मणिपुर में मोदी लहर के साथ ही साथ सत्ता परिवर्तन की लहर भी थी. और जो दूसरे वजह हैं उनमें लगभग 3 महीनों तक चली आर्थिक नाकेबंदी ने कांग्रेस की हार में अहम् भूमिका निभाई तो मुख्यमंत्री इबोबी सिंह का अपने विधायकों के साथ सामंजस्य न बिठाना भी है.  क्योंकि कुछ दिन पहले ही इनके 25 विधायक नाराज हो गए थे.
वहीँ अगर बीजेपी के सन्दर्भ में बात करें तो बीजेपी के लिए मणिपुर का चुनाव जीतना
इसलिए अहम् था कि पूर्वोत्तर के राज्यों में उसकी पैठ और गहरी हो सके.इसके लिए खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सभाएं की. और प्रधानमंत्री के बात करने का अंदाज ऐसा है कि सहज ही लोग उनसे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. इसके साथ ही मणिपुर कि बेसिक जरूरते जैसे पेयजल, सड़क और रोजगार के समाधान के अस्वाशन ने लोगों के ऊपर असर किया.
वहीँ इस बार के चुनाव में चर्चा का केंद्र रहीं सामजिक कार्यकर्त्ता इरोम शर्मीला ने भी चुनाव में उतरने का निर्णय लिया था लेकिन शायद मणिपुर की जनता को इरोम आकर्षित नहीं कर पायीं  और चुनाव नतीजे उनके पक्ष में ना के बराबर ही गए.


  पंजाब -  पांच राज्यों में हुए चुनाव में केवल पंजाब ही ऐसा अकेला राज्य है जहाँ परिणाम कांग्रेस के  लिए सकारात्मक रहे हैं और इस राज्य में उसकी सरकार बानी है. इससे पहले पंजाब में शियद और भाजपा की गठबंधन की सरकार थी जिसके प्रति लोगों में जबरदस्त उबाल था और इसका फायदा मिला कांग्रेस को. हालाँकि आम आदमी पार्टी की एंट्री से कांग्रेस का खेल बिगड़ता प्रतीत हो रहा था मगर नतीजे आने पर पता चला कि पंजाब में आम आदमी पार्टी कि सिर्फ हवा थी हकीकत नहीं. वहीँ कांग्रेस में कैपटन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री का फेस बनाया और साथ ही बीजेपी का दामन छोड़ चुके 'नवजोत सिंह सिद्धू' को भी पार्टी में शामिल कर उनकी लोकप्रियता का भरपूर फायदा उठाया. 
वहीँ अगर हम अकालियों की बात करें तो पंजाब में बीजेपी उनकी सहयोगी पार्ट है जबकि पूरा दबदबा इनका रहता था इसलिए पंजाब में बीजेपी की हार ना कह कर शियद की हार कहना ज्यादा उचित होगा. वैसे भी इनके पुरे कार्यकाल के दौरान पंजाब को बर्बाद करने का आरोप लगता रहा है. आज जो पूरा पंजाब नशे की आगोश में है इनकी ही देन है क्योंकि की इन्होंने जानबूझ कर नशे की कारोबार को फलने -फूलने दिया. वहीँ ऐसा आरोप लगता रहा है कि बादलों ने राजनीति को अपना फैमिली बिज़नस बना रखा था.ये सारी बातें इनके खिलाफ वोटिंग में अहम् रोल निभाई. तो वहीँ अगर आम आदमी पार्टी की बात करें तो शुरू- शुरू में इन्होंने खूब माहौल बनाया मगर दिल्ली में इस पार्टी द्वारा कुछ खास काम ना कर पाने की वजह से शायद लोगों का विश्वास जीत पाने में सफल नहीं हो सके.तो वहीँ पंजाब के लोगों ने कैप्टन अमरिंदर के हाथों में सत्ता सौंप कर उनके अनुभव का फायदा उठाना उचित समझा.
हालाँकि कैप्टन के लिए भी ये ताज काँटों के ताज के समान ही है क्योंकि जिस तरह से नशा वहां की वादियों में घुल गया है उसे साफ करना इतना आसान नहीं होगा. इसके साथ ही भरी मात्रा में बेरोजगार युवकों के लिए रोजगार का प्रबंधन भी अहम् समस्या है. 

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