google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण - New Angle In Up Politics

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण - New Angle In Up Politics



कहते है राजनीति में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, सच भी है क्योंकि यहाँ समीकरण पल-पल बदलते रहते हैं. कल तक जो पार्टी हासिये पर रहती है वो आज अचानक लीड करने लगती है. और इसका ताजा उदाहरण आपको यूपी इलेक्शन में देखने को मिल जायेगा. उत्तरप्रदेश की  राजनीति में पिछले 2  महीने काफी उठापटक भरे रहे, किसी के लिए भी कह पाना मुश्किल था कि कौन आ रहा है सत्ता है. उत्तरप्रदेश में मुख्य रूप से 4 पार्टियां सक्रीय हैं जिनमें कांग्रेस की गिनती ना के बराबर ही है और अब  बचीं बसपा, सपा, और भाजपा.  इन तीनों पार्टियों के लिए यह चुनाव जीतना  बहुत महत्त्व रखता है,क्योंकि जहाँ बसपा को पुनः राजनीति में वापसी करनी है तो अखिलेश को अपनी असली लोकप्रियता और योग्यता दिखानी है. भाजपा भी 2019  में होने वाले लोकसभा के मद्देनजर चाहेगी सत्ता में आना. मगर उत्तर प्रदेश में चुनावी स्थिति क्या है डालते हैं एक नज़र.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण - New Angle In Up Politics , Mayawati


कछुए की चाल चलते हुए रेस में सबसे आगे हैं 'माया' -  तमाम रानजीतिक विश्लेषक ये दावा कर रहे थे कि अगर इस बार बसपा सत्ता में नहीं आयी तो फिर मायावती का राजनैतिक करियर ख़त्म हो जायेगा. और देखा जाये तो कुछ गलत भी नहीं कह रहे थे, क्योंकि पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से मायावती का चार्म लोगों के दिल से ख़त्म हो रहा था उससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था. मगर तभी किस्मत ने साथ दिया और सपा में हुए कलह का फायदा उठाते हुए मायावती ने 100 के लगभग 'मुस्लिम कैंडिडेट' चुनाव में उतार दिए. इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है कि मायावती ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा सबसे पहले की. चूँकि कोर मुस्लिम वोट सपा को जाता है और सपा में हुए कलह को लेकर मुस्लिम वोटर असमंजस में थे, वहीँ जाने-अनजाने अखिलेश के मुश्लिम विरोधी होने की हवा भी उड़ाई गयी, क्योंकि की मुख़्तार अंसारी और उसके भाई की पार्टी का सपा में विलय का उन्होंने पुरजोर विरोध किया. अब जो मुसलमान समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें वो अब बसपा कि ओर रुख करने लगे और जो बसपा के मुस्लिम कैंडिडेट हैं  वो अपनी जड़ जमाना शुरू कर चुके थे. हालाँकि बसपा पर मुस्लिमों का पूरा विश्वास नहीं है, क्योंकि एक बार पहले भी बसपा ने भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार बनायीं थी. और मुसलमान नहीं चाहते कि किसी भी कीमत पर भाजपा शासन में आये. और इस बात को समझते हुए मायावती लगातार ये बयान दे रही हैं कि किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ गठबंधन की सरकार नहीं बनेगी भले ही वो विपक्ष में बैठना स्वीकार करेंगी. कुल मिलाकर जो मुस्लिम कैंडिडेट हैं वो अपने इलाके में मुस्लिम वोटों को प्रभावित तो जरूर ही करेंगे और  बसपा  के मुस्लिम वोटों का पलड़ा भारी इसलिए भी लग रहा है कि लगभग सभी बड़े मुश्लिम नेता और इमाम साफ तौर पर सन्देश दे रहे हैं कि सारे मुश्लिम भाई बसपा को वोट दें. चुकी दलित वोट तो कहीं जाना नहीं है और मुस्लिम वोट भी जुड़ रहे हैं इसलिए ये कहने में जरा भी संदेह नहीं है कि बसपा उत्तर प्रदेश के चुनाव में लीड कर रही है.

अखिलेश की 'छवि' तो चमकी लेकिन सपा 'धूमिल' हो गयी -
 अपने मुख्यमंत्री के साढ़े चार साल के कार्यकाल में अखेलश यादव  'बबुआ' मुख्यमंत्री की छवि से लड़ते रहे और इससे उबरने की कोशिश में ही लगे रहे कि ये कुर्सी उन्हें उपहार में नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर मिली है. इसका असर ये हुआ कि जब टिकट बंटवारे का समय आया तो अखिलेश ने जम कर विरोध दर्शाया और नतीजा मुलायम के बायें हाँथ कहे जाने वाले शिवपाल यादव के साथ तनातनी. इस पूरी लड़ाई में अखिलेश कहीं भी कमजोर नहीं पड़े और 200 से ज्यादा विधायकों को अपने साथ कर पार्टी में अपनी स्वीकार्यता साबित किया और शिवपाल यादव को हाशिये पर ला खड़ा किये. हर वर्ग के युवाओं में खासे लोकप्रिय अखिलेश ये बात अच्छे से जानते थे कि उनकी पार्टी मुस्लिम  तुष्टिकरण के लिए बदनाम है ऐसे में अखिलेश ने यह सन्देश देने की भरपूर कोशिश की कि उनकी छवि मुस्लिमवादी नहीं है और इसके लिए उन्होंने कुछ मुस्लिम नेताओं को किनारे भी किया. और ये बात मुस्लिमों को नागवार गुजरी क्योंकि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने हमेशा ही मुस्लिमों के पक्ष में बात की है. वो जानते है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जातीवाद और संप्रदायवाद को बढ़ावा देकर ही चुनाव जीता जा सकता है. अपने इस एजेंडे के तहत वो कई बार सार्वजानिक मंच से मुस्लिम तुष्टिकरण करने से भी परहेज नहीं किये.यहाँ तक कि कारसेवकों पर गोली मुस्लिमों को संतुष्ट करने के लिए चलवाने की बात तक कर दी. मुलायम सिंह यादव एक सधे हुए राजनीतिज्ञ हैं इसमें कोई शक ही नहीं किन्तु बाप- बेटे की तकरार से मुस्लिम पकड़ कमजोर हुयी है और ज्यादातर मुस्लिम नेताओं का सपा पर से विश्वास डगमगाया है. दूसरी तरफ अखिलेश यादव मुस्लिम वोट साधने के लिए कांग्रेस से हाथ तो मिलाया ही यहाँ तक की कांग्रेस को उसके औकात से ज्यादा सीट तक दे डाली.  लेकिन उतना आसान नहीं है कांग्रेस के लिए मुस्लिम वोट खींचना क्योंकि जहां तक मुस्लिमों का सवाल है वो कांग्रेस जैसी डूबती नाव की सवारी कभी नहीं करनी चाहेंगे. ऐसे में इस गठबंधन का कोई खास असर होते नहीं दिख रहा है.
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बिना  तैयारी के भाजपा
- जैसे -जैसे चुनाव संपन्न हो रहे हैं वैसे -वैसे भाजपा के लिए ख़बरें अच्छी नहीं आ रही हैं. हालाँकि  कहा जा रहा था की यूपी चुनाव की तैयारी भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह ने एक साल पहले से शुरू कर दी थी. ये सच भी है अमित शाह ने एड़ी से चोटी लगा दी  थी तोड़ -फोड़ करके दूसरे पार्टियों से नेताओं को बहका कर अपनी पार्टी में लाने के लिए. और उनको सफलता भी मिली मगर उनका ये दाव उन्ही के गले का फ़ांस बन गया है, टिकट मिलने की शर्त पर आये ये दलबदलू नेता भाजपा के कोर कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय नेताओं की नाराजगी की कारन बने. अपने नेता को टिकट नहीं मिलने पर कार्यकर्त्ता असंतुष्ट हो कर अपनी ही पार्टी के खिलाफ भीतरघात करने लगे हैं. अब जब ग्राउंड लेबल पर कार्यकर्ता ही उदासीन रहेंगे तो फिर कैसे पार होगी चुनावी नैया. दूसरी तरफ किसी भी बड़े चेहरे को जगह देना तो दूर उसे चुनावी परिदृश्य से गायब रखने की कौन सी रणनीति अमित शाह ने बनाई ये तो वही बता सकते हैं. क्योंकि इसका फायदा कम नुकसान ज्यादा दिखाई दे रहा है. वहीँ 2014 के लोकसभा की तरह पार्टी विकास और अच्छे दिन की बाते न करते हुए सिर्फ अखिलेश सरकार की कमियां गिनाने में रह जा रही है. पार्टी भूल गयी की यही कीचड़ उछालने की रणनीति बिहार चुनाव में हार का कारन बानी थी. तो वहीँ दूसरी तरफ सपा की टकराहट से मुसलमानों के वोट में बिखराव की उम्मीद लगाए भाजपा के लिए स्थिति अपने पक्ष में नहीं लग रही है, क्योंकि सपा का मुस्लिम वोट बैंक टुटा जरूर है लेकिन वो बसपा के वोट बैंक में कन्वर्ट हो गया है ऐसे में लगभग चुनावी रेस से बहार हो चुकी बसपा बहुमत की दावेदारी ठोक रही है. जिस लहर की उम्मीद लगाए बैठे थे बीजेपी के समर्थक अंततः वो लहर इस चुनाव में कहीं भी देखने को नहीं मिल रही है. अब चाहें अमित शाह माने या ना माने इस स्थिति के जिम्मेदार वो ही हैं.

दोनों तरफ के विकल्प खोले रखेगी कांग्रेस- इन चुनाव में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं हैं, वो जानती थी कि अकेले चुनाव लड़ने का मतलब अपनी बची-खुची इज्जत भी गवाने जैसा  है. इसलिए अकलमंदी दिखाते हुए कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन कर चुनावी परिदृश्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है. और अगर कहीं गलती से सपा के साथ बात नहीं बनी तो जबरदस्त ढंग से वापसी कर रही मायावती को समर्थन कर कुछ सीटों की कमी को पूरा करते हुए सरकार का हिस्सा बन जायेंगे. इस बात का संकेत देते हुए राहुल गाँधी ने खुले मंच से मायावती की तारीफ की थी तभी से इस बात के चर्चे शुरू हो गए थे की कांग्रेस दोनों ही विकल्प खुले रखना चाहती है. 

अब आलम ये है की मायावती 300  प्लस सीटों का दावा कर रही हैं और बीजेपी अपने सारे हथकंडे मसलन कब्रिस्तान और श्मशान के मुद्दे भी उठाने से नहीं चूक रही है तो वहीँ अखिलेश बार -बार यह कह कर अपनी जीत पर अविस्वास प्रकट कर रहे हैं कि मायावती बीजेपी से मिल जाएँगी और सरकार बना लेंगी. लगभग आधे चुनाव हो चुके हैं उत्तर प्रदेश में और देखना दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है.


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