google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 प्रतिकार से शांति की ओर

प्रतिकार से शांति की ओर




भले की सर्वोच्च आदर्श अप्रतिकार हो, किंतु यदि हम प्रतिकार नहीं कर सकते, तो उस तक नहीं पहुंच सकते। जब हम 'अप्रतिकार' की बात करते हैं, तब हमें यह ध्यानपूर्वक सोच लेना चाहिए कि हममें प्रतिकार की शक्ति है भी या नहीं। शक्तिशाली होते हुए भी यदि हम प्रतिकार न करें, तो वास्तव में हम एक महान कार्य करते हैं, परंतु यदि हम प्रतिकार कर ही नहीं सकते हों और फिर भ्रमवश सोचते रहें कि हम उच्च प्रेम की प्रेरणा से ऐसा कर रहे हैं, तो यह पहले के ठीक विपरीत होगा। अपने विपक्ष में शक्तिशाली सेना को खड़ी देखकर अर्जुन बुजदिल हो गया, उसके 'प्रेम' ने उसे अपने देश तथा राजा के प्रति अपने कर्त्तव्य को भुला दिया। इसीलिए तो भगवान श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि तू ढोंगी है, 'एक ज्ञानी के सदृश्य तू बातें तो करता है, परंतु तेरे कर्म कायर जैसे हैं। इसलिए तू उठ, खड़ा हो और युद्ध कर।' यह है कर्मयोग का असली भाग। कर्मयोगी समझता है कि सर्वोच्च आदर्श 'अप्रतिकार' है। वह यह भी जानता है कि जिसे हम 'अन्याय का प्रतिकार' कहते हैं, वह इस उच्चतम शक्ति की प्राप्ति के मार्ग में एक सीढ़ी है। इस सर्वोच्च आदर्श को प्राप्त करने से पहले अन्याय का प्रतिकार करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। पहले वह कार्य करे, युद्ध करे। जब उसमें प्रतिकार की शक्ति आ जाएगी, तभी अप्रतिकार उसके लिए एक गुण स्वरूप होगा।  एक बार एक अकर्मण्य व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई। उसने मुझसे प्रश्न किया, 'भगवान की प्राप्ति के लिए मुझे क्या करना चाहिए?' मैंने उससे पूछा, 'तुम झूठ बोल सकते हो?' उसने उत्तर दिया, 'नहीं।' मैंने कहा, 'तब तुम पहले झूठ बोलना सीखो। जड़वत जीवन से झूठ बोलना कहीं अच्छा है।' मैं उससे मजाक ही कर रहा था, लेकिन मेरा मतलब यह था कि संपूर्ण निष्क्रिय अवस्था या शांतभाव प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कर्मशीलता से ही होकर जाना होगा। आलस्य का प्रत्येक दशा में त्याग करना चाहिए। 

- स्वामी विवेकानंद



Post a Comment

0 Comments