google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 राधा की रुस्वाई है

राधा की रुस्वाई है


क्या रूठे हैं कृष्ण जो काली बदरी छाई है
बेध रही  हैं तेज हवाएँ या राधा की रुस्वाई है|
मन मेरा यूँ व्याकुल क्यों है ये कैसी घड़ी आई है
निष्ठां है विश्वास भी है फिर इतनी क्यों कठिनाई है|
स्वार्थी है बेबाक है पर ना ये मन  हरजाई है
मन की तृष्णा दूर करो बस इतनी अर्ज लगाई  है |
मान जाओ हे घनश्याम क्यों इतनी देर लगाई है
मुक्त करो किरणों को फिर से तुम्हे राधा की दुहाई है ||

-विंध्यवासिनी सिंह







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