google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 स्वयं करें अपना उद्धार-: विवेकानंद की जयंती (12 जनवरी)

स्वयं करें अपना उद्धार-: विवेकानंद की जयंती (12 जनवरी)



जो व्यक्ति डर और हीन भावना से दूर रहकर स्वयं को नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अनंत आत्मा समझता है, वह अपने साहसपूर्ण कर्म से अपने सभी संकटों पर विजय पा लेता है। वह अपना उद्धार स्वयं करता है। स्वामी विवेकानंद का चिंतन... जीवन एक खेल का मैदान है, खेल चाहे जितना भी जंगली क्यों न हो। हम पर चाहे जितने थपेड़े लगें, चाहे जितने धक्के लगें, किंतु हमारी आत्मा को कभी कोई चोट नहीं पहुंच सकती। हम वही (ईश्वरीय) अनंत आत्मा हैं। एक वेदांती गीत गाता था, जिसका भावार्थ है- 'मुझे कभी न संशय था, न डर। मृत्यु मुझे कभी न छू पाई। मैं तो अजन्मा हूं। मैं ही सब कुछ हूं। फिर मेरा शत्रु कौन? मैं सच्चिदानंद स्वरूप हूं। सोहम... सोहम...(मैं वही हूं... वही हूं)। काम, क्रोध, ईष्र्या, कुविचार आदि ने मुझे कभी स्पर्श नहीं किया, क्योंकि मैं सच्चिदानंद स्वरूप हूं। सोहम.. सोहम...।सभी दुखों पर विजय पाने का यही एक अमोघ उपाय है। यही वह अमृत है, जो मृत्यु को जीत लेता है। हमें गाना चाहिए - 'सोहम-सोहम। मुझे न भय है, न संशय। मैं जाति, लिंग, वर्ण सबके अतीत हूं। कोई संप्रदाय मुझे बांध नहीं सकता, कोई पंथ मुझे अपना नहीं सकता, क्योंकि सब पंथों में मैं ही अनुस्यूत हूं। अनेक बार मृत्यु से मेरा सामना हुआ। भूखा रहा। लगातार कई दिनों तक मुझे अन्न का एक दाना नहीं मिला। पैर फटे, थक कर चूर हुआ।

मैं पेड़ के नीचे बैठ जाता। लगता, जैसे अब प्राण निकले। बोलना क्या, मैं विचार तक नहीं कर सकता था। ...लेकिन अंत में मेरा मन इस विचार पर लौट आता, 'मुझे डर कहां? मैं आत्मा हूं। मुझे न भूख लगती है न प्यास। सोहम...सोहम। उठ खड़ा हो, चल और बीच में ठहर मत। ऐसा विचार आने पर मैं नव-चैतन्य पा उठ खड़ा होता और यह देखो, तुम लोगों के सामने आज जीता-जागता खड़ा हूं। इसीलिए मैं कहता हूं कि जब-जब अंधकार का आक्रमण हो, तो अपनी आत्मा का प्रतिष्ठापन करो। जीवन में जो कुछ भी प्रतिकूल है, वह नष्ट हो जाएगा। क्योंकि आखिर यह सब स्वप्न ही है। विपत्तियां पर्वत जैसी भले ही हों, सब कुछ भयावह और अंधकारमय भले ही दिखे, पर जान लो, सारी परेशानियां माया हैं। डरो मत, ये भाग जाएंगी। इन्हें कुचलो, तो ये लुप्त हो जाती हैं। इन्हें ठुकराओ तो ये मर जाती हैं। डरो मत। कितनी बार असफलता मिलेगी, यह न सोचो। चिंता न करो। काल अनंत है। आगे बढ़ो, पुन:-पुन: अपनी आत्मा का प्रतिष्ठान करो। अंधकार तोड़कर प्रकाश अवश्य बाहर आएगा। ऐसी विषम स्थिति में तुम चाहे किसी की भी प्रार्थना करो, कौन तुम्हें आकर सहायता देगा? जिसने स्वयं मृत्यु से छुटकारा नहींपाया, उससे तुम किस प्रकार सहायता की आशा कर सकते हो? अपना उद्धार स्वयं करो। कोई दूसरा तुम्हें मदद नहीं पहुंचाएगा, क्योंकि तुम स्वयं अपने सबसे बड़े शत्रु हो और सबसे बड़े मित्र भी। उठ खड़े हो, डरो मत। दुख और दुर्बलता के अंधकार के बीच आत्मा को प्रकाशित होने दो, भले ही वह प्रकाश आरंभ में अस्पष्ट और फीका हो।

तुम्हें साहस मिलेगा और अंत में तुम सिंह के समान गरज उठोगे- मैं वह हूं, मैं वह हूं - सोहम-सोहम। जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह क्षुद्र (छोटा)है, वह भूल कर रहा है, क्योंकि सत्ता केवल आत्मा की है और हम आत्मा हैं, जो कभी नष्ट नहींहोती, जिसे कोई दुख नहींहोता। हम शक्तिमान हैं। सूर्य इसीलिए सूर्य है, क्योंकि हम उसे सूर्य कहते हैं। जब मैं कहता हूं कि दुनिया विद्यमान है, तब उसे अस्तित्व प्राप्त होता है। हमारे बिना ये सब नहींरह सकते, क्योंकि हम सत, चित और आनंद स्वरूप हैं। इसलिए डरो मत, यह कभी मत सोचो कि हम कमजोर हैं। यह सच नहीं है।

 बात तब की है जब स्वामी विवेकानंद इतने विख्यात नहीं हुए थे। उन्हें अच्छी पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था। एक बार वे देश में ही कहीं प्रवास पर थे। उनके गुरुभाई उन्हें एक बड़े पुस्तकालय से अच्छी-अच्छी पुस्तकेें लाकर देते थे। स्वामी जी की पढ़ने की गति बहुत तेज थी। मोटी-मोटी कई किताबें एक ही दिन में पढ़कर अगले दिन वापस कर देते। उस पुस्तकालय का अधीक्षक बड़ा हैरान हो गया। उसने स्वामी जी के गुरु भाई से कहा, 'आप इतनी सारी किताबें क्यों ले जाते हैं, जब आपको इन्हें पढ़ना ही नहीं है? रोज इतना वजन उठाने की क्या जरूरत है? स्वामी जी के गुरु भाई ने कहा, 'मैं अपने गुरुभाई विवेकानंद के लिए ये पुस्तकेें ले जाता हूं। वे इन सब पुस्तकों को पूरी गंभीरता से पढ़ते हैं। अधीक्षक को विश्वास ही नहीं हुआ। उसने कहा, 'अगर ऐसा है तो मैं उनसे मिलना चाहूंगा।अगले दिन स्वामी जी उससे मिले और कहा, 'महाशय, आप हैरान न हों। मैंने न केवल उन किताबों को पढ़ा है, बल्कि उन्हें याद भी कर लिया हैं।स्वामी विवेकानंद ने जब उन किताबों के कई महत्वपूर्ण अंश सुना दिए, तो पुस्तकालय अधीक्षक चकित रह गया। उसने उनकी याददाश्त का रहस्य पूछा। स्वामी जी बोले, 'मन को एकाग्र करके पढ़ा जाए तो वह दिमाग में अंकित हो जाता है। एकाग्रता का अभ्यास करके आप जल्दी पढ़ना भी सीख सकते हैं। कथा-मर्म : पूर्ण एकाग्रता से कार्य करने पर हम उसे शीघ्रता और गुणवत्ता से करते हैं और अभ्यास से सब कुछ संभव है।


साभार -jagran.com


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