google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 औरतनामा

औरतनामा















गर समझिए तो वाह औरत है,
न समझिए तो आह औरत है ||
देख ले जिसको वो निखार जाय,
इस कदर खुश निगाह औरत है ||
रंजो ग़म की उदास राहो में,
खूबसूरत पनाह औरत है ||
रोज-ओ-शब इसके दम से रौशन है,
मिस्ल-ए-मेहरो माह औरत है ||
इस जहाँ को सावरती है मगर,
अपने में खुद तबाह औरत है ||
तह नही पा सकेगा कोई मुकेश,
झील जैसी अथाह औरत है ||
- आचार्य मुकेश







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