google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 कैसे खत्‍म होगा जब किसी को मालूम ही नहीं है कि क्यों फैल रहा है नक्सलवाद?

कैसे खत्‍म होगा जब किसी को मालूम ही नहीं है कि क्यों फैल रहा है नक्सलवाद?

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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की दरभा घाटी में 25 मई को नक्सलियों ने 29 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। इस हमले के बाद से देश भर की मीडिया और आम लोगों के बीच नक्सलवाद की समस्या, उसकी जड़ और उसे खत्म करने के तरीके जैसे मुद्दों को लेकर चर्चा हो रही है। कोई इसकी वजह घोर गरीबी बता रहा है तो कोई नक्सल प्रभावित इलाकों में हो रहे खनन को दोषी मानता है।  कई लोग सलवा जुडूम को नक्सली आतंक के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं तो वहीं कुछ यह भी कहते हैं कि सरकार आदिवासियों से उनके जंगल छीनकर उन्हें बेदखल करना चाहती है, जिसकी वजह से नक्सलवाद के बीज पनप रहे हैं। लेकिन ध्यान से देखा जाए तो इनमें से कोई भी कारण अंतिम तौर पर इस विकराल होती समस्या के बारे में सही नहीं लगता है। यह भी सच है कि सरकार ने अपनी तरफ से नक्सलवाद को लेकर विस्तृत स्टडी कर रिपोर्ट नहीं तैयार करवाई है, जिससे इस समस्या की असली वजह और उससे निपटने के उपाय तलाशे जा सकें। 

 माइनिंग

 नक्सलवाद को सैद्धांतिक समर्थन देने वाले लोग अक्सर दावा करते हैं कि आदिवासियों को जंगलों से बेघर कर वहां खनन किया जा रहा है। आदिवासियों को हटाकर सरकारी एजेंसियां और प्राइवेट कंपनियां खनिज पदार्थ निकाल रही हैं और उसके बदले आदिवासियों और स्थानीय निवासियों को उचित मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा है। और इसके चलते नक्सलवाद को खाद पानी मिल रहा है। केंद्रीय मंत्री किशोर चंद्र देव ने भी माइनिंग को नक्सलवाद की जड़ बताया है। लेकिन इस दावे का बारीकी से अध्ययन करें तो यह पूरी तरह से सही नहीं लगता है। सच यह है कि बस्तर के इलाके में माइनिंग का बहुत ज्यादा काम नहीं हो रहा है। दंतेवाड़ा जिले में मौजूद नेशनल मिनरल्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की बैलाडिला खान से 1977 से लोहा निकाला जा रहा है। यहां 14 पहाड़ियों पर लौह अयस्क (आयरन ओर) होने की पहचान की गई है। लेकिन अभी सिर्फ चार जगहों पर ही खनन का काम हो रहा है। एस्सार की बैलाडिला से विशाखापट्टनम तक जाने वाली ओर सप्लाई करने वाली पाइपलाइन लंबे समय से बंद है। इस पाइपलाइन को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया था। आरोप है कि नक्सलियों ने निजी कंपनी से लंबे समय तक 'प्रोटेक्शन मनी' उगाही। भिलाई में मौजूद सेल के मशहूर स्टील प्लांट को भी आने वाले कुछ सालों में बंद करना पड़ सकता है। भिलाई प्लांट को दल्ली-रझड़ा से आयरन ओर मिलता है। लेकिन दल्ली-रझड़ा में मौजूद आयरन ओर 4-5 सालों में खत्म हो जाएगा। इसी को देखते हुए भिलाई प्लांट को रोघाट से आयरन ओर सप्लाई करने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए रोघाट से दल्ली-रझड़ा तक 95 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बनाने का प्रस्ताव है ताकि घने जंगलों के बीच से आयरन ओर निकालकर भिलाई प्लांट तक पहुंचाया जा सके। लेकिन नक्सली गतिविधियों और धमकियों के चलते इस प्रोजेक्ट पर काम रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है। छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य उड़ीसा में खनन को लेकर काफी हो हल्ला हो चुका है। देश में सबसे ज्यादा खनन उड़ीसा में ही होता है। लेकिन पॉस्को और वेदांता जिन इलाकों में खनन कर रहे हैं, वे माओवादी हिंसा से प्रभावित नहीं है। पिछले साल क्रिस्टियन होल्शर, जैसन मिकलियन और कृष्णा चैतन्य ने नक्सली हिंसा से प्रभावित एक स्टडी कर माइनिंग और हिंसा के बीच रिश्ते की पहचान करने की कोशिश की थी। लेकिन उनकी रिपोर्ट में जिन जिलों में माइनिंग हो रही है, वहां माओवादी हिंसा से उसका सीधा कोई रिश्ता नहीं पाया गया। 

 विस्थापन 
 क्या विस्थापन और जंगल-जमीन छिने जाने से आदिवासी नक्सलवाद के रास्ते पर चल रहे हैं? देश की कुल आबादी के महज 8 फीसदी लोग आदिवासी हैं। लेकिन देश में विस्थापित किए गए 40 फीसदी लोग आदिवासी समाज से आते हैं। आदिवासी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के लिए जंगलों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में उन्हें जंगलों से हटाने पर उनके भीतर डर पैदा होना लाजिमी है। लेकिन देश में ऐसे कई आदिवासी हैं, जो जंगल छिन जाने के बावजूद नक्सलवाद के रास्ते पर नहीं चल रहे हैं। ऐसे में यह तर्क भी पूरी तरह से नक्सलवाद की समस्या की असली वजह नहीं बता पाता है। 

 गरीबी

 देश में सरकारी और गैर सरकारी आंकड़ों को देखने से साफ हो जाता है कि आदिवासी समाज देश का सबसे गरीब तबका है। कई अध्ययनों में यह तर्क दिया गया है कि गरीब लोगों को आसानी से बरगलाया जा सकता है और उसे नक्सलवाद की ओर धकेला जा सकता है। क्रिस्टियन होल्शर, जैसन मिकलियन और कृष्णा चैतन्य की स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी गरीब समाज से नक्सली लोगों को भर्ती करते हैं और अपना कैडर बनाते हैं। पिछले साल प्रकाशित अर्थशास्त्री देवेश कपूर, किशोर गवांडे और शंकर सत्यनाथ की रिसर्च रिपोर्ट में जंगल से मिलने वाले उत्पाद (एमएफपी) में कमी की वजह से आदिवासी हिंसा का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। इस तर्क में भी दम नहीं दिखता है। इसे समझने के लिए छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले का उदाहरण लेना चाहिए। झाबुआ में भी कमोबेश वैसे ही हालात हैं, जैसे छत्तीसगढ़ के बस्तर में हैं। लेकिन यहां नक्सलवाद की समस्या नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार की मानव विकास रिपोर्ट पर भी गौर करने लायक है। इस रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से में मौजूद 62 फीसदी गांवों में लोग जंगल से मिलने वाले उत्पादों के जरिए जिंदगी जी रहे हैं। यहां नक्सलवाद की समस्या न के बराबर है। वहीं, राज्य के दक्षिणी हिस्से में सिर्फ 55.3 फीसदी गांव जीवन जीने के लिए जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर हैं और यह इलाका नक्सलवाद की चपेट में है। नंदिनी सुंदर नक्सलियों के खिलाफ सरकार की ओर से चलाए जाने वाले अभियानों का मुखर विरोध करती रही हैं। नंदिनी के मुताबिक, 'नक्सलवाद और घोर गरीबी के बीच गहरा रिश्ता है, (लेकिन) कोई सीधी कड़ी दोनों बातों को जोड़ती नहीं है।' साफ है कि सुंदर भी नक्सलवाद के लिए गरीबी को एक आशय भर मानती हैं, असली वजह नहीं। यहां कोबाड घांडी की मिसाल पर भी गौर करने लायक है। दून स्कूल से पढ़े लिखे और मुंबई जैसे मेट्रोपॉलिटन शहर के वर्ली इलाके के एक अपार्टमेंट में अच्छी खासी जिंदगी गुजारने वाले कोबाड नक्सली नेता हैं। उनके पिता ग्लैक्सो कंपनी में शीर्ष पद पर रह चुके हैं। महाबलेश्वर में एक बड़े होटल में कोबाड की हिस्सेदारी है और पंचगनी में उनका आलीशान बंगला है। इससे पता चलता है कि कई लोग नक्सली गरीबी या प्रताड़ना की वजह से नहीं बनते। वे नक्सली इसलिए बनते हैं क्योंकि वे ऐसी हिंसक विचारधारा में यकीन रखते हैं। 

 सलवा जुडूम

 दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले के बाद नक्सलियों की तरफ से भेजी गई चिट्ठी में कहा गया था कि उनके निशाने पर सलवा जुडूम शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा थे। मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी मानवाधिकारों के उल्लंघन को नक्सली हिंसा बढ़ने की वजह मानते हैं। सलवा जुडूम के बारे में गुहा लिखते हैं, 'जिन आदिवासियों ने सलवा जुडूम में शामिल होने से इनकार कर दिया उनके घर जला दिए गए, उनके घरों की महिलाओं के साथ रेप किया गया और अनाज के गोदामों को लूटा गया। इसके जवाब में नक्सलियों ने ज्यादा हिंसा की।' लेकिन वे इस बात पर कुछ नहीं कहते हैं कि सलवा जुडूम के चलते नक्सली हिंसा हो रही है या नक्सली हिंसा की वजह से सलवा जुडूम वजूद में आया। यहां महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की मिसाल अहम है। महाराष्ट्र के इस जिले में नक्सलवाद तेजी से फैल रहा है। लेकिन यहां आज तक सलवा जुडूम का एक भी कैंप स्थापित नहीं किया गया है। आंध्र प्रदेश पुलिस पर भी सलवा जुडूम की तरह अत्याचार के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन वहां हिंसा बढ़ी नहीं बल्कि घटी है। 

 तुरंत इंसाफ और जरूरी चीजें दो 

 मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर का मानना है कि माओवादी अपने इलाकों में इसलिए कामयाब हैं क्योंकि वे लोगों को उनके लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं और तुरंत इंसाफ देते हैं। इन इलाकों में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। ऐेसे में नक्सली हिंसा प्रभावित इलाकों में सरकारी योजनाओं को सही तरीके से अमल करने और फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था जैसे उपाय किए जा सकते हैं। 

 हमें यह भी नहीं पता कि समस्या घट रही है या बढ़ रही है

 नक्सली समस्या से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लंबे समय से कमर कस रही हैं। लेकिन दिक्कत इस बात की है कि किसी को यह सही-सही नहीं पता है कि नक्सली समस्या घट रही है या बढ़ रही है। 2011-2012 की गृह मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि नौ राज्यों के 83 जिले माओवादी हिंसा की चपेट में हैं। 2009 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि देश के 20 राज्यों के 223 जिले माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं। नवंबर, 2003 में तत्कालीन गृह सचिव ने 20 राज्यों के 55 जिलों को माओवादी हिंसा से प्रभावित बताया था। हिंसा के दौरान होने वाली मौतों को आधार माना जाए तो 2010 से नक्सली हिंसा में गिरावट आई है। लेकिन क्या इसका मतलब है कि माओवादी कमजोर पड़ रहे हैं? या इसका यह भी मतलब है सकता है कि सुरक्षा बल जानमाल के नुकसान या आम लोगों की मौत के डर से नक्सलियों से कम टकरा रहे हैं? और यह भी कि माओवादी अपने को पूरी तरह से तैयार किए बिना लड़ाई कर जंगलों में कायम की गई अपनी सत्ता को गंवाना नहीं चाहते हैं। 

 सेना नहीं सिविल सोसाइटी के लोगों को भेजो 

 पिछले साल मध्य प्रदेश से निकली हजारों लोगों के जन सत्याग्रह का नेतृत्व करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल भूमि सुधार पर केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई टास्क फोर्स के सदस्य हैं। नक्सल समस्या पर राजगोपाल पैनी निगाह रखते हैं। इसके समाधान पर राजगोपाल कहते हैं, मैं उम्मीद करता हूं कि सरकार अपनी रणनीति में बदलाव लाएगी और नक्सल हिंसा प्रभावित इलाकों में पुलिस बल को ज्यादा बड़ी संख्या में भेजने की बजाय सिविलस सोसाइटी के लोगों को वहां भेजे ताकि मूल समस्या को समझकर उसका समाधान किया जा सके। इस बारे में शुरुआत युवाओं को प्रशिक्षित कर होनी चाहिए ताकि वे यह समझ सकें कि अहिंसात्मक तरीके से समस्याओं का समाधान किया जा सकता है और अहिंसा भी मजबूत हथियार है। साथ ही प्रभावित इलाकों के सरकारी अफसरों और कर्मचारियों को स्थानीय लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरुरत है। 

 कानून दुरुस्त करो 

 मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल का कहना है कि वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट और माइंस एंड मिनरल्स एक्ट में आमूलचूल बदलाव लाने की जरुरत है। इन कानूनों ने बड़ी तादाद में लोगों को विस्थापित किया है। ये कानून आदिवासी लोगों को बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही सरकार फोरेस्ट राइट्स एक्ट, पंचायत एक्ट, अनुसूचित जाति-जनजाति से जुड़े प्रिवेंशन ऑफ एट्रॉसिटी एक्ट को मजबूती के साथ जमीन पर लागू करे। ये कानून आदिवासियों की बहुत मदद कर सकते हैं।

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