google.com, pub-7859222831411323, DIRECT, f08c47fec0942fa0 आखिर कब होगा सबसे पहले देश?

आखिर कब होगा सबसे पहले देश?

bharat mata
पिछले दिनों एक बहुचर्चित नेता ने अपने भाषण में धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए कहा कि हर फैसले में भारत सर्वाेपरि होना चाहिए। जो भी काम किया जाए वह भारत के लिए हो क्योंकि देश सभी धर्माे और विचारधाराओं से ऊपर है। अगर लक्ष्य भारत की तरक्की है तो उसमें सभी धर्मों के लोगों की खुशहाली शामिल है। यही धर्मनिरपेक्षता है। बेशक कुछ लोग राजनैतिक कारणों से उस नेता के विरोधी हो और उनसे असहमति रखते हो लेकिन उनके द्वारा व्यक्त विचारों का सीधे े-सीधे विरोध करने की गलती शायद ही कोई करें।

 ‘सबसे पहले देश’ के विचार को आगे बढ़ाने का श्रेय विश्व प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दीवान सैय्यद जैनुल आबेदीन साहिब को हैं। उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा नियंत्रण रेखा पर दो भारतीय सैनिक का सिर काटकर ले जाने के मुद्दे पर पाकिस्तानी नेताओं के दोगलेपन पर अपना विरोध प्रकट करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की अजमेर यात्रा का बहिष्कार करने करने की घोषणा की थी। बेशक भारत के विदेश मंत्री ने राजनयिक शिष्टाचार की दुहाई देते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ को शानदार दावत तो दी पर भारतीय सैनिकों के मुद्दे पर एक शब्द तक नहीं कहा जबकि ख्वाजा साहिब की दरगाह के खादिमों ने परवेज अशरफ का दान लेने से मना कर सबसे पहले देश का एक शानदार उदाहरण प्रस्तुत किया।

 वैसे यह कोई पहली बार नहीं है कि किसी ने ‘सबसे पहले देश’ की अवधारणा प्रस्तुत की हो। यहाँ सदियों से इस आदर्श को अपनाने की परम्परा रही है। पन्ना धाय से इब्राहिम गार्दी तक, अब्दुल हमीद से देश के आम आदमी के लिए देश ही धर्म रहा है। लेकिन दुःखद आश्चर्य होता है कि हमारे कुछ नेताओं के लिए देशहित से पहले स्वयं के राजनैतिक हित रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो राजनीति को शर्मसार करते हैं। ताजा उदाहरण है श्रीनगर मे केंदीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के शिविर पर आतंकवादी हमले का जिसमें पाँच जवान शहीद हुए। ऐसे में जब राज्य से ऑर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट हटाने की मांग पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है क्योंकि आतंकवादियों का दुस्साहस सख्त से सख्त कार्यवाही की मांग करता है। परंतु स्वयं को राष्ट्रीय दल कहने वाले मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट के महासचिव का कथन है कि ताजा फिदायीन हमला अफजल गुरु की फांसी का नतीजा है। उनके अनुसार वह पहले से कहते रहें है कि अफजल गुरू को फांसी नहीं दी जानी चाहिए थी, क्योंकि इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। 

अफजल को सूली पर चढ़ाने से पहले इस बात का आंकलन करना चाहिए था कि आखिर इसका असर काश्मीर पर क्या पड़ेगा। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि देशद्राहियों के मानवाधिकारों के समर्थक तो मिल जाते हैं लेकिन निर्दोषों के मानवाधिकारों का सवाल उठाना साम्प्रदायिकता मानी जाती है। इन नेताजी से पूर्व स्वयं काश्मीर के मुख्यमंत्री भी इसी प्रकार की बातें करते हुए देशद्रेही को शहीद बताते हुए आँसू तक बहा चुके हैं। उन्हें कब समझ में आऐगा कि जिस अपराधी को निचली कोर्ट से देश के उच्चतम न्यायालय तक अपनी बेगुनाही साबित करने के पर्याप्त अवसर मिले। उसके मानवाधिकार इससे ज्यादा आखिर कितने होने चाहिए। जो व्यक्ति अपने इन्टरव्यू में अपने किये पर अफसोस जताना तो दूर गर्व करता हो, उसके प्रति आखिर किस आधार पर नरमी बरती जानी चाहिए। यदि अपराधी को दंड की प्रतिक्रिया से डरने की गलत परम्परा एक आरंभ हो गई तो कानून के शासन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। 

यह जानने का अधिकार इस देश की जनता को है कि इन नेताओं ने काश्मीर से भगाये गये निर्दोष पण्डितों के मानवाधिकारों के लिए कभी सरकार पर दबाव नहीं बनाया। सीमा पर तैनात सैनिकों की सुरक्षा और स्वाभिमान पर उन्हें शायद ही कभी उबाल आया हो जो विपरीत परिस्थितियों में भी देश की श्रेष्ठ सेवा करते हैं। क्या उन्हें नहीं मालूम कि क्रिकेटरों के भेष में श्रीनगर के सीआरपीएफ कैप पर हमला करने आए अत्याधुनिक हथियारों से लेस आतंकियों का सामना जवानों ने बगैर हथियार किया। क्या वे इस तथ्य से अपरिचित हैं कि श्रीनगर के पुलिस महानिरीक्षक ने पिछले महीने आदेश दिया था कि ड्यूटी के दौरान केन्द्रीय बलों के जवान हथियार लेकर नहीं चलेंगे। अगर 100 जवान स्थानीय पुलिस की मदद पर जाएंगे तो सिर्फ 10 के पास ही हथियार होंगे। बाकी को लाठी-डंडे लेकर चलना होगा। उन्होंने इस बात की जरूरत क्यों नहीं समझी कि राज्य सरकार पर तत्काल इस अनुचित आदेश को वापस लेने की मांग की जाए। क्या वे इस आदेश के चलते पूरी घाटी में तैनात केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों का मनोबल प्रभावित होने से इंकार कर सकते हैं? इधर यह चर्चा भी है कि केरल तट के पास दो भारतीय मछुआरों की हत्या करने का आरोपी इटली के दो नाविकों को वहाँ की सरकार के इस आश्वासन पर इटली जाने की अनुमति दी गई थी कि वे मुकदमे का सामना करने के लिए शीघ्र वापस भारत आएंगे। 

लेकिन अब इटली की सरकार ने अपने वादे से साफ पलटते हुए उन्हें भारत भेजने से इन्कार कर दिया है जो सरासर अनुचित है। इटली के इस व्यवहार से दोनों देशों के संबंध प्रभावित हो सकते है। यह सुखद संकेत है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने इटली को चेतावनी दी है कि भारतीय मछुआरों की हत्या का मुकदमा झेल रहे दो इतालवी मरीन सैनिकों को अगर वापस भारत न भेजा गया तो उसे इसके नतीजे भुगतने होंगे। किसानों की ऋण माफी के नाम पर 52 हजार करोड़ रूपये की बहुचर्चित योजना में भारी गड़बड़ियों का खुलासा करती नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट बताती है कि इसमें न केवल बड़े पैमाने पर पात्र किसानों को नजरअंदाज किया गया बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को लाभ दिया गया जो इसके पात्र ही नहीं थे। कैग रिपोर्ट के अनुसार सूत्रधार की जिम्मेदारी निभा रही संस्थाएं बिना स्वतंत्र जाँच के केवल बैंकों द्वारा पेश प्रमाणपत्रों और आंकड़ों पर ही निर्भर कर रही थीं। स्पष्ट है कि इस महत्वपूर्ण योजना में ‘सबसे पहले देश’ के स्थान पर ‘सबसे पहले मैं’ था।

 आज देश का किसान जिस तरह से नित्य बढ़ते डीजल, खाद, बिजली आदि के दामों के चुकाकर भी सस्ता उत्पादन बेचने के लिए विवश है, वह किसी भी सरकार के लिए अपनी योजनाओं की असफलता का संकेत होना चाहिए, जिसपर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिए न कि टालमटोल। वैसे हमारे देश में कल्याणकारी योजनाओं की वास्तविकता क्या होती है, वह किसी से छिपी नहीं है। उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार द्वारा बेरोजगारी भत्ता देना एक अच्छा कदम माना जा सकता है लेकिन प्राप्त आँकड़ों के अनुसार इस योजना का आधे से ज्यादा धन बेरोजगारों की बजाय आयोजकों की जेब में जा रहा है। अब इसे किस प्रकार की कार्य कुशलता और कल्याणकारी परियोजना कहा जाए जहाँ 8.5 करोड़ बेरोजगारी भत्ता बाँटने के लिए 12.5 करोड़ रुपये आयोजन पर खर्च करने की नजीर सामने हो। आँकड़ें गवाही देते हैं कि बेरोजगारी भत्ता वितरण से ज्यादा जोर भव्य आयोजनों पर है। इधर यमुना को प्रदूषण मुक्त करने की परियोजनाओं पर भारी-भरकम बजट के बावजूद स्थित लगातार बदतर होने पर देश की सबसे बड़ी अदालत को केंद्र सरकार दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारों से अब तक खर्च हुए साढ़े चार हजार करोड़ रुपये का हिसाब पूछना पड़ रहा है। जाहिर है कि चहूँ ओर ‘सबसे पहले देश’ केवल नारों में हैं और व्यवहार में ‘सबसे पहले मैं’। क्या वेतन के नाम पर मामूली राशि लेने वाले बहुचर्चित मुख्यमंत्री को इस बात का उत्तर देना चाहिए कि वे जिस प्रकार के डिजाइनर कपड़े और कीमती चश्में पहनते हैं, आखिर वे उन्हें यह सब कहाँ से प्राप्त होता है? अगर वे खामोश रहे तो ‘सबसे पहले देश’ का उनका नारा भी दूसरे नेताओं की तरह खोखला साबित होगा।

 -----डॉ. विनोद बब्बर




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