आप याद रहेंगी सुषमा दी!



Sushma Swaraj 
जब भी नारी सशक्तीकरण की बात होती है पता नहीं क्यों उनमें जो कुछ चेहरे दृष्टि के सामने आते हैं उनमें सुषमा दी को मैं सबसे ऊपर पाती हूं।
भारतीय जनता पार्टी के दूसरे कार्यकाल का शपथ ग्रहण समारोह हो चुका है, तमाम विभागों में कैबिनेट मंत्री और राज्यमंत्री बनाए जा चुके हैं पर कुछ अधूरा-अधूरा सा लग रहा है। जी हां यह अधूरापन कुछ और नहीं बल्कि सुषमा दी का उनके मंत्रालय में ना होना है।

सुषमा दी के सन्दर्भ में बहुत सारी बातें कही गयीं! सुषमा दी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच तालमेल ना होने की बात, उनके आडवाणी कैंप से जुड़े होने की बात तक उठायी गई। 

लेकिन बीते 5 सालों में सुषमा दी का अविरल प्रवाह बना रहा। ट्विटर पर किसी ज़रूरतमंद का एक ट्वीट ही उन्हें सक्रिय कर देता था और पिछले 5 साल ऐसा लगा जैसे उन्होंने खुद को पूरी तरह से झोंक दिया हो और विदेश मंत्रालय में हर स्तर पर जिम्मेदारी निभा रही हों। हजारों लोगों की व्यक्तिगत तौर पर सुषमा स्वराज ने मदद की और वह चाहे मंत्रालय में रहें या ना रहें लेकिन सुषमा जी को वह कभी भूल नहीं पाएंगे। नरेंद्र मोदी के दूसरे प्रधानमंत्रित्व के काल में सुषमा स्वराज के मंत्रिमंडल में शामिल ना होने के पीछे उनका स्वास्थ्य बताया जा रहा है और वास्तव में अगर ऐसा है तो उनके इस निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए।

भारतीय नारी की सौम्यता, मजबूती और उसकी गरिमा क्या होती है और इन चीजों को अगर किसी एक नारी में देखना हो तो वह सुषमा स्वराज ही हो सकती हैं।

Sushma Swaraj with Adwani ji

लम्बा राजनैतिक कैरियर 
महज 25 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखने वाली सुषमा स्वराज लगभग 41 साल तक सक्रीय राजनीति में रही हैं। इसमें वो सात बार सांसद बनीं तो तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़ीं और जीतीं भी। इतना ही नहीं सुषमा भारतीय जनता पार्टी के दमदार नेताओं में अपना स्थान रखती रही हैं। अपनी हाजिरजवाबी और प्रखर वक्ता की छवि के लिए सुषमा हमेशा से जानी जाती रही हैं।

ये जग जाहिर है कि सुषमा स्वराज, भाजपा के लौह-पुरुष कहे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को अपना राजनैतिक गुरु मानती हैं और उन्ही के संरक्षण में उनका राजनैतिक सफर आगे बढ़ा है। लेकिन 66 साल की उम्र में चुनाव ना लड़ने के फैसले से वो अपने गुरु को आईना दिखती नजर आयीं। ज्ञात हो कि 91 साल के अडवाणी और 85 साल के मुरली मनोहर जोशी की राजनीतिक रूप से सक्रीय रहने की इच्छा किसी से छुपी नहीं है।

इस मामले में सुषमा स्वराज ने एक आदर्श प्रस्तुत किया है कि सही समय पर अपने आपको व्यवस्था से अलग करके नए लोगों को उभरने का मौका दिया जाना चाहिए। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी को सुषमा जैसी सीनियर, सक्रिय और धुरंधर नेता के संरक्षण और अनुभव के लिए प्रयासरत रहना चाहिए था।खासकर तब जब भारत विदेशी-मोर्चे पर चीन और पाकिस्तान के साथ दूसरे देशों से मिल रही मजबूत चुनौती का सामना कर रहा है।

Sushma Swaraj with PM Narendra Modi

बदली परिस्थतियों में कार्य करने का दम
बहुत कम उम्र में राजनीति में आयीं सुषमा हमेशा से ही पार्टी के कार्यों में बढ़ -चढ़ हिस्सा लेती रहीं। चाहें जेल में बंद जार्ज फर्नांडिस के लिए चुनाव प्रचार हो या संसद से सड़क का संघर्ष। लेकिन अपने लम्बे राजनैतिक कैरियर में सुषमा स्वराज को अपनी ही पार्टी में अध्यक्ष का पद प्राप्त नहीं हुआ। इसके असली वजह चाहे जो भी हो लेकिन कहा तो यह जाता है कि सुषमा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पृष्ठ्भूमि की नहीं थीं और यही वजह है कि उन्हें कभी पार्टी अध्यक्ष का पद ऑफर नहीं किया गया। इतना ही नहीं जब 2013 इस बात की चर्चा होने लगी कि अगले चुनाव में प्रधानमंत्री के पद के लिए नरेंद्र मोदी का नाम आगे किया जायेगा तो इसके विरोध में लाल कृष्ण आडवाणी का साथ सुषमा स्वराज ने भी दिया था। 

इसके बाद जब मोदी की अगुआई में बीजेपी सत्ता में आयी तो कहा जाने लगा कि सुषमा को इस कार्य का भुगतान करना पड़ेगा। हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी ने इन सब के बावजूद सुषमा स्वराज को विदेश मंत्री का पद देकर उनको सम्मानित किया। लेकिन सुषमा स्वराज के हिम्मत और धैर्य का लोहा मानना होगा कि उन्होंने बदली परिस्थिति में भी अपना कार्यकाल बिना किसी कंट्रोवर्सी के गुजार दिया। 

अब जब सुषमा स्वराज चुनाव नहीं लड़ने और मंत्रिपद स्वीकार नहीं करने का फैसला ले चुकी हैं तो सभी को उनके फैसले का सम्मान करते हुए उनके द्वारा किये गए तमाम साहसिक फैसलों को याद रखना चाहिए। खासकर, नारी सशक्तिकरण के झंडाबरदारों को ज़रूर उनके बेदाग़ और मजबूत जीवन से सीख लेनी चाहिए।

-विंध्यवासिनी सिंह
   



Post a Comment

0 Comments