गेमचेंजर बना सवर्ण आरक्षण, कितना होगा कारगर?



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लगातार तीन राज्यों में सत्ता गवां कर निढाल हो चुकी बीजेपी ने सवर्णो के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाकर अपने लिए संजीवनी का उपाय कर लिया है. इसमें कोई शक नहीं है कि आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णो के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा के बाद से ही बीजेपी के नेताओं सहित उसके समर्थकों में नयी ऊर्जा का संचार हो गया है. इस मुद्दे पर तमाम विश्लेषक, राजनीतिज्ञ और आम जनता तक अपनी राय रख रही है. वहीँ अपने आप को निरीह समझ रहे और राजनीति में केवल वोट के लिए याद किये जाने वाले गरीब सवर्णो को सुकून मिल रहा है कि चलो देर से ही सही किसी ने उनकी सुध तो ली. अगर गौर किया जाये तो बीजेपी ने तीन महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनजर इस बार अपने तरकश से ऐसा तीर छोड़ा है जिसका काट किसी भी राजनीतिक पार्टी के पास फ़िलहाल नहीं है. क्योंकि इससे पहले तमाम राजनीतिक दलों ने आरक्षण का कार्ड खेला है और जनता में अपनी छवि बनाई है कि वो उनके हितैसी हैं ऐसे में अगर गरीब सवर्णों के आरक्षण के खिलाफ बोलना मतलब उनके वोट से हाथ धोना है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसने सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग की है इससे पहले 2011 में यूपी की मुख्यमंत्री रहीं मायावती ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण मिले इसके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पात्र लिख कर मांग की थी. वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने फरवरी 2014 में जाति आधारित आरक्षण को समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग की थी.  इसके आलावा चंद्रबाबू नायडू, रामबिलास पासवान, जीतन राम मांझी ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर चुके हैं. 
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हालाँकि तमाम पार्टियों के सपोर्ट के बाद भी इसमें कोई शक नहीं है आर्थिक आधार पर दिए जा रहे इस आरक्षण के राह में तमाम रोड़े भी हैं. संसद के दोनों सदनों में संविधान संसोधन बिल पास होने के पास भी इसके ऊपर सुप्रीम कोर्ट की तलवार लटक रही है. इससे पहल भी सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मूल रूप से छेड़छाड़ न हो के नाम कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण के पहल को निरस्त कर चूका है. आपको याद होगा जब साल 2015  में सुप्रीम कोर्ट ने मनमोहन सरकार के उस फैसले को निरस्त कर दिया था जिसमें जाटों को संविधान में लिखित  पचास फीसदी आरक्षण की सीमा के बाहर जाकर आरक्षण देने की बात कही गयी थी.

आर्थिक आधार के इन आंकड़ों पर ध्यान देने की जरुरत 
अगर सुप्रीम कोर्ट सरकर के इस फैसले को मान भी लेता है तो आर्थिक आधार के इस रिजर्वेशन में बहुत सारा लोचा है. अगर आप साल 2011 की जनगणना पर नजर डालें तो देश में 86.2 प्रतिशत ऐसे किसान हैं जिनके पास पांच एकड़ से भी कम खेती योग्य जमीन है. तो इस तरह से नए आर्थिक रिजर्वेशन के नियम में आने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है. ऊपर से इस 10 प्रतिशत आर्थिक रिजर्वेशन में अन्य अल्पसंख्यक समुदाय भी शामिल है जिनमे मुस्लिम समुदाय से  59.5 प्रतिशत, सिख समुदाय से 77.5 और ईसाइयों के 39.7 प्रतिशत सामान्य श्रेणी के लोग भी हैं. वहीँ हिन्दुओं की बात करें तो  सामान्य आर्थिक आरक्षण व्यवस्था से 26 प्रतिशत हिन्दू  भी इस दायरे में आते हैं. 

सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में क्या है रोजगार के आंकड़े 

हमारे देश में सरकारी नौकरी के प्रति लोगों का प्रेम किसी से छुपा नहीं है. मगर दिनों -दिन   देश में सरकारी नौकरियां का आंकड़ा काम होते जा रहा है यह भी सच्चाई है. अकेले साल 2018  में नोटबंदी के बाद से देश में 1.1 करोड़ नौकरियां समाप्त हो गयीं. और मौजूदा समय में देश में बेरोजगारी की दर 7.4 फीसदी है. देश में ऐसे में सराकरी नौकरी में आरक्षण का कोटा बढ़ाना मतलब सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक सुख देने जैसा लगता है. जिससे किसी को कोई ठोस लाभ मिलने वाला नहीं है. जबकि आरक्षण रूपी वृक्ष पर पहले से ही  49.5 प्रतिशत पिछड़ा  आरक्षण का फल  लदा हुआ है. वहीँ अगर प्राइवेट सेक्टर की बात करें तो आईटी फर्म्स,एंट्रेप्रेन्योरशिप  वेंचर्स , सेलिंग, एग्रीकल्चर और विभिन्न फैक्ट्रियों में उपलब्ध कार्यों में  97.3% रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं. फिर किस तर्ज़ पर सरकार मात्र 2.7% रोजगार के लिए युवाओं को सरकारी नौकरी से बांध कर रखना चाहती है.
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रोजगार के अवसर उपलब्ध करने की हो पहल 
ये बहुत ही अच्छी बात है कि सरकार उन लोगों को भी बराबर आने के अवसर देना चाहती है जो सामाजिक स्तर पर सामान्य हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर हैं. इसमें भी कोई शक नहीं है कि सरकार के इस कदम से बहुत सारी प्रतिभाएं जो पैसे की कमी से जूझ रही है उनको आगे आने का अवसर मिलेगा. 
लेकिन....जब सरकार के पास बहुत सीमीत मात्रा में नौकरी है तो फिर इस आरक्षण का कितना व्यापक असर होने वाला है. ऐसे उन संसाधनों पर ज्यादा जोर देने की जरुरत है जिससे सभी नहीं तो कम से कम भारी मात्रा में युवाओं को रोजगार मिल सके. सरकार को चाहिए कि रोजगार बढ़ाने वाली नीतियां को अमल में लाया जाये और जायदा से ज्यादा  प्रफेशनल कॉलेज खोले जाएँ  जहां सबको अपनी-अपनी  क्षमता को निखारने का अवसर मिल 
सके.

 तब अपने आप ही आरक्षण की मांग उठनी बंद हो जायेंगीं.,और यही उचित होगा भारत जैसे विशाल और लोकतांत्रिक देश के लिए....

-विंध्यवासिनी सिंह 




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