ईवीएम पर आरोप लगाना राजनीतिक दिवालियापन

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भारत में आए दिन चुनाव होते रहते हैं लेकिन पिछले कुछ सैलून से कोई ना कोई राजनीतिक दल ईवीएम पर सवाल उठाने में लगा रहता है। इसमें भी देखने वाली बात यह है कि जो सत्ताधारी दल केंद्र की सत्ता में विराजमान होता है उसे ईवीएम से कोई दिक्कत नहीं होती है लेकिन ज्योंही  वह केंद्रीय सत्ता से बाहर होता है तो उसकी दिक्कत ईवीएम से स्टार्ट हो जाती है। ज्ञात हो कि अमेरिका से लेकर कांगो इत्यादि तमाम देशों में सफलतापूर्वक ईवीएम मशीन चल रही है और वहां किसी को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन भारत में जरूर दिक्कत है। अब सवाल केवल ईवीएम और चुनाव आयोग का भी नहीं है बल्कि यह तमाम संवैधानिक संस्थाओं का भी है, यहां कोई भी नेता चुनाव जीतने के लिए और अपने विपक्षी को नीचा दिखाने के लिए कभी सीबीआई के इस्तेमाल की बात उठाता है कभी चुनाव आयोग का इस्तेमाल करने की बात उठाता है तो कभी ईवीएम की बात उठाता है। समझना मुश्किल नहीं है कि इस तरह की राजनीतिक दिवालियापन के सिवा कुछ भी नहीं है। हमारे राज नेताओं के पास जनता के विकास का भरोसा दिलाने लायक क्या कुछ भी नहीं है जो चुनाव आते ही ईवीएम को लेकर जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश की जाने लगती है।टेक्नॉलजी के चलते दुनिया चाँद पर पहुँच गयी लेकिन अभी भी भारत में लोग बिना सुबूत के एक वोटिंग मशीन को लेकर होहल्ला मचाने में लगे है।

अमेरिका के कथित हैकर सैय्यद शुजा के दावों में कितना दम
 ज्ञात हो कि पिछले दिनों जब जोर जोर से आवाज उठने लगी थी तब ईवीएम के खिलाफ चुनाव आयोग ने हैक करने का चैलेंज दिया भी दिया था। चुनाव आयोग का कहना था कि आए कोई और ईवीएम हैक करें लेकिन तब वहां कोई भी नहीं आया। हालाँकि जो राजनीतिक पार्टियां सबसे ज्यादा इस मामले पर गला फाड़ रही थीं वो इसे चुनाव आयोग का ड्रामा बता कर इस चैलेंज में शामिल न होने की बात करने लगीं। वहीं अगर हम ताजे मामले की बात करें जिसमें किसी कथित हैकर ने अमेरिका में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है तो लोगों को पूछना चाहिए कि वो चुनाव आयोग कि चैलेंज को स्वीकार क्यों नहीं किया और इतने दिन कहां रहा ?।और अब जब आम चुनाव नजदीक आ रहा है तो इस तरह की बातें फिर से उठनी  शुरू हो गई। उससे भी अहम् बात यह है कि अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए और उसमें कई में भारतीय जनता पार्टी की हार हुई तो किसी राजनीतिक दल ने या किसी साइबर एक्सपर्ट ने ईवीएम के हैक होने की बात नहीं उठाएगी। यहाँ यह साफ करना आवश्यक है कि मुख्य रूप से बीजेपी पर ही आरोप लगते हैं कि वो चुनाव के दौरान ईवीएम को हैक करा कर चुनाव जीत जाती है।
वहीं एक चीज और ध्यान देने योग्य है कि आईआईटी भिलाई के डायरेक्टर और चुनाव आयोग की टेक्निकल एक्सपर्ट कमेटी के मेंबर डॉ। रजत मूना का कहना है कि ईवीएम को हैक नहीं किया जा सकता यह पूरी तरह से सुरक्षित है। फिर आखिर किस आधार पर राजनीतिक पार्टियां आरोप लगा रही हैं कि ईवीएम के जरिये बीजेपी जीत रही है।
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'ईवीएम का विकल्प बैलेट' कितना भरोसेमंद 
जिस तरीके से आज सभी राजनीतिक दल वोटिंग मशीन पर अविश्वास जता कर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग कर रहे है तो कोई बताएगा कि जब मशीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो बैलेट पर क्यों? और क्या हम सब भूल गए कि किस प्रकार से दबंगई दिखाई जाती रही है बैलेट के ज़माने में, कहीं बूथ कैप्चरिंग तो कहीं पूरी की पूरी मतदान पेटी ही बदल दी जाती है। इतना ही नहीं जबरदस्ती लोगों के वोट उनकी मर्जी के खिलाफ डलवाया जता रहा है। इसके साथ ही भारी मात्रा में लोगों के वोट ख़राब भी हो जाते थे। इस लिए बैलेट पेपर से चुनाव कराने का मतलब है फिर से चुनाव के समय दबंगई की शुरुआत। इसके साथ इतना जरूर कहना चाहेंगे कि चुनाव आयोग को समय समय पर टेक्नॉलजी और सुरक्षा को लेकर जाँच जरूर करते रहना चाहिए ताकि लोगों के मन में अपने वोट के सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार का वहम पैदा नहीं होने पाए।

वहीं  सिर्फ यह कहा जाए कि भारतीय जनता पार्टी इन चीजों के लिए जिम्मेदार है तो यह गलत होगा और हर एक राजनीतिक पार्टी को इसकी जवाबदेही लेनी होगी। लोकतंत्र में यह बात समझना आवश्यक है कि संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हर एक की है। इसके साथ ही अनाप-शनाप आरोप बेबुनियाद आरोप लगाने से भला किसका क्या फायदा हो जाएगा यह बात अपने आप में समझना मुश्किल है। बेहतर होगा कि प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक राजनेता जनता के मुद्दों पर ध्यान दें और प्रशासनिक अधिकारी और संवैधानिक संस्थाएं इस बात की सुरक्षा करें इस बात के प्रति लोगों को आश्वस्त करें कि उनकी निगरानी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुरक्षित रहेगी। दोनों अगर अपना रोल निभाते हैं तो इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारा लोकतंत्र दिन-ब-दिन मजबूती की ओर बढ़ता चला जाएगा और अगर ऐसा नहीं होता है एक दूसरे पर अनाप-शनाप आरोप लगाए जाते हैं तो निश्चित रुप से हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है और कहीं न कहीं  यह राजनीतिक दिवालियापन का ही प्रतीक है।  

-विंध्यवासिनी सिंह 


  

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