क्या वास्तव में कांग्रेस को इतना ज्यादा इतराने की जरूरत है?





भारत की आजादी के बाद एक पार्टी यानी कांग्रेस पार्टी में सर्वाधिक दिनों तक शासन किया. 1975 की जनता पार्टी की सरकार छोड़ दी जाए तो उसका राज एकछत्र ही कहा जाएगा. फिर 1998 में कई दशकों के प्रयास के बाद संघ परिवार बाजपेई सरकार के माध्यम से कांग्रेस को चुनौती देने में सफल रहा, लेकिन 2004 में जब पुनः संसदीय चुनाव हुए तो भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार की सांस फूल गई और 10 साल वह पुनः सत्ता से बाहर. फिर  2014 का वह समय आता है जब नरेंद्र मोदी के रूप में एक लहर आती है जिसमें कांग्रेस पार्टी बह जाती है. तकरीबन नरेंद्र मोदी का पूरा कार्यकाल कांग्रेस को दहशत में रखने के लिए याद किया जाएगा क्योंकि एक के बाद दूसरा और तीसरा राज्य ना केवल कांग्रेसी चिंता का विषय बन गया बल्कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके राहुल गांधी को पप्पू साबित करने में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व और कार्यकर्ता समूह में किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी. 2018 जीतने का समय आता है तब देश में सेमीफाइनल के नाम पर चुनाव होते हैं जिसमें मिजोरम और तेलंगाना के अतिरिक्त हिंदी हार्टलैंड के तीन मुख्य राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव आयोजित होते हैं और यहां से कांग्रेस को संजीवनी मिलती है जहाँ 3 राज्यों में कांग्रेस सरकार बनाने में एक तरह से सफल हो जाती है. वहीं कांग्रेस के तमाम नेता बेहद संयम बरतते हुए इस जीत के बाद बेहद आशावादी ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं लेकिन वह यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि 2019 में वह भाजपा को हरा देंगे. 2019 तो काफी दूर है लेकिन कांग्रेस को अपनी कुछ कमियों पर अवश्य ही विचार करना चाहिए जिसके कारण उसके एकछत्र साम्राज्य वर्चस्व को तोड़ने में भारतीय जनता पार्टी को सफलता प्राप्त हुई इनमें पहला है -

वंशवाद 

कांग्रेस पार्टी पर चाहे जनता पार्टी के दौर में 1977 में हमला हुआ हो या फिर उसके बाद के दौर में कांग्रेस पार्टी पर जब भी विपक्षी हमला करते थे तो वह वंशवाद का ही सहारा लेते थे वंशवाद एक ऐसी विष बेल है जिसने कांग्रेस को कई वर्षों तक बैकफुट पर धकेला है. और जब जब कांग्रेस मजबूत होने की दिशा में आगे बढ़ेगी तब तब यह वंशवाद उसके पैरों में लिपट जाएगी और चाहे वह भाजपा हो या कोई दूसरा दल हो वंशवाद को लेकर कांग्रेस पर चोट करने में आघात करने में चूकेगा नहीं. 


आलाकमान कल्चर 

दूसरी कांग्रेस की कमजोर कड़ी की बात करें तो वह आलाकमान कल्चर आधारित है कहीं ना कहीं उसकी शासन प्रणाली जमीन से जुड़ी हुई नहीं रहती है इसके कारण कई बार उसको नुकसान भी उठाना पड़ता है. हालांकि इसके फायदे भी है लेकिन इतिहास गवाह है कि प्रणब मुखर्जी से लेकर और दूसरे तमाम नेता योग्य नेता कांग्रेस के आलाकमान कल्चर के भीतर दब के रह गए और कांग्रेस पार्टी कई बार टूटी भी.  जाहिर है कांग्रेस को इस कल्चर से अलग होना पड़ेगा तभी वह देश में कुछ स्थाई विकल्प दे पाएगी अन्यथा एक के बाद दूसरा दूसरा के बाद तीसरा उलट-पुलट होता रहेगा.

 तुष्टीकरण 

 2014 के चुनाव प्रचार कीजिए कांग्रेश की छवि ऐसी बन गई थी कि वह मायनोरिटी  और उसमें भी खासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर तुष्टीकरण की किसी भी हद से गुजर जाने को राजी हो गई थी. जाहिर तौर पर उसे उस छवि को बदलने के लिए राहुल गांधी को कई कई मंदिरों के चक्कर लगाने पड़े हैं तो अपना गोत्र तक बताना पड़ा है जिसमें कुछ हद तक जरूर मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेसी छवि कम हुई है. लेकिन अभी भी कांग्रेस में ऐसे नेता और चाटुकार भरे पड़े हैं जो अल्पसंख्यक छवि देने के लिए विख्यात हैं, और कब वह कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टीकरण का चेहरा फिर से बना देंगे यह कहा नहीं जा सकता. वहीं अगर ऐसा फिर से  होता है तो भाजपा को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल जायेगा और वह बहुसंख्यक की राजनीति पर आधारित प्रतिघात करने से चुकेगा नहीं.

 संगठन पर भरोसा 
कांग्रेस के लोग यह माने या ना माने लेकिन उसके संगठन से कहीं बेहद स्ट्रक्चर्ड और मजबूत संगठन आर एस एस कैडर और भाजपा का संगठन है. एक तरह से वह लोकतांत्रिक भी है तो समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व भी करता है. अगर कांग्रेस पार्टी अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखना चाहती है और आगे की तरफ जाना चाहती है निश्चित रूप से उसे अपने संगठन पर ध्यान देना पड़ेगा सिर्फ गांधी परिवार या कुछ बड़े नेताओं को चाटुकारिता के जरिए प्रसन्न करने  वालों को तरजीह देना बंद करके असल जमीनी कार्यकर्ताओं को तरजीह देना शुरू करना पड़ेगा. और यही एक रास्ता है जिसके फलस्वरूप कांग्रेस पार्टी अपने संगठन को धार दे पाएगी मजबूती दे पाएगी. तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस विधानसभा चुनाव में इस बात पर एक मत है कि अगर कांग्रेस का संगठन राजस्थान मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मजबूत रहा होता तो जीत का अंतर इतना कम ना होता है.

वहीं सबसे अधिक गौर करने वाली बात यह है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी लम्बे समय से सत्ता में थी ऐसे में लोगों के अंदर मौजूदा सरकार से अनबन लाज़मी है. और कहीं न कहीं बीजेपी इन राज्यों में जनता के उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पायी और लोगों ने सत्ता परिवर्तन का मन बना लिया था. जिसका परिणाम यह निकला कि बीजेपी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा और कांग्रेस को सत्ता में आने का.और इस हिसाब से कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि अब उनके सामने वह जनता है जो अपना हक़ नहीं मिलने पर सरकार बदलने का माद्दा रखती है. तब तो और अधिक जब आपने सरकार में आने के लिए तमाम ऐसे वादे कर डाले हों जो शायद ही 100 प्रतिशत पूरे हो पाएं. इस लिए इस जीत पर बहुत ज्यादा न इतराये क्योंकि 5 साल बीतते देर नहीं लगता. आप जनता की जरुरत समझें और उसे पूरा करते हुए उनका विश्वास जीतने की कोशिश करें तो शायद आपको 2019 में  अच्छा परिणाम मिले.

-विंध्यवासिनी सिंह 




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