कोर्ट का आदेश ही काफी नहीं, हमें भी जिम्मेदार बनना पड़ेगा






अक्टूबर के महीनें में दिल्ली के आसमान में छायी धुंध सर्दी के शुरू होने की निशानी नहीं है बल्कि यह बताती है कि दिल्ली कि आबो -हवा में जहरीली गैसों का बढ़ना शुरू हो गया है. वैसे तो दिल्ली की हवा में सालों भर प्रदूषण की मात्रा ज्यादा रहती है, लेकिन अक्टूबर - नवम्बर में तो ये जानलेवा स्तर पर पहुँच जाता है. पिछले साल यही प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानक से तीस गुना ज़्यादा बढ़ गया था, और डॉक्टर कहने लगगए थे कि दिल्ली में रहने वाला  हर व्यक्ति रोजाना 50 सिगरेट पीने जितना जहर अपने अंदर ले रहा है और अपने सांसे घटाता जा रहा है. यही नहीं इस दमघोटू धुंध के चलते पिछले साल स्कूलों तक को बंद करना पड़ा था. मगर अफ़सोस कि इस साल भी हम उसी स्थिति की तरफ अग्रसर है. अभी अक्टूबर ख़तम ही हुआ है लेकिन आप आसानी से मौसम में बदलाव को महसूस कर सकते हैं. वैसे  तो दिल्ली में प्रदूषण के तमाम कारण है लेकिन कुछ प्रमुख कारणों पर भी हम ध्यान दें तो निःसंदेह ही प्रदूषण के स्तर को कम किया जा सकता है.

क्यों ज्यादा बिगड़ जाती है दिल्ली की हवा 

 वैसे तो विश्व के सारे ही शहर प्रदूषण के चपेट में हैं लेकिन अपनी दिल्ली ने टॉप 5 प्रदूषित शहरों में अपना स्थान बना लिया है. नवम्बर से लेकर फ़रवरी तक हवा में प्रदूषण का लेवल डेंजर जोन से भी ऊपर चला जाता है. इसके सबसे प्रमुख करने में सबसे पहले बताया जाता है कि अक्टूबर में अंत में पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा खेत खाली करने के लिए धान की पराली को जलाया जाता है जिसका धुंआ दिल्ली में प्रवेश कर जाता है. वहीँ अगर आप गाड़ियों की बात करें तो एक सर्वे के अनुसार दिल्ली की सड़कों पर रोजाना 1400 नयी गाड़ियां उतरती है. हालाँकि कोर्ट ने पुराने डीजल वाहनों को दिल्ली में बंद कर दिया है लेकिन ट्रकों का अभी भी शहर से होकर अवागमन जारी है. इतना ही नहीं शहर में हो रहे धड़ल्ले से निर्माण कार्य भी काफी हद तक प्रदूषण को बढ़ा देते हैं. वहीँ सड़क के किनारे और मलबों के पास इकठ्ठा डस्ट भी हवा में घुल कर प्रदूषण को बढ़ाते हैं. इन सब के अलावा दिल्ली में निकलने वाले कचरे से कौन परिचित नहीं होगा, ये कचरे भी प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं.

कोर्ट के आदेश का कितना होता है असर

 लगभग हर साल सुप्रीम कोर्ट दिल्ली को साफ करने के मद्देनजर तरह -तरह आदेश पारित करती है जैसे पिछले साल पटाखों की बिक्री पर रोक लगाया था तो इस साल रोक के साथ दिवाली के दिन मात्र दो घंटे ही पटाखों को फोड़ने का आदेश दिया था, उसमें में कम आवाज वाले और छोटे पटाखें ही शामिल थे. मगर हर साल की तरह इस बार भी लोगों ने जम कर पटाखें फोड़े जिसका असर दिवाली की सुबह आसानी से देखा जा सकता था. कोर्ट ने तो कंस्ट्रक्शन साईट को भी हरे कपड़े से ढक कर रखने के आदेश दिए हैं मगर इसका भी पालन होते नहीं दीखता और कहीं होता भी है तो केवल नाम मात्र का. हालाँकि लोकतंत्र में यह सही नहीं है मगर सुप्रीम कोर्ट अगर कोई निर्देश देता है तो उसकी अनुपालना न होने की स्थिति में उसके पास संबंधित अधिकारियों या संस्थानों आदि पर अवमानना के आधार पर कार्रवई करने का अधिकार होता है.  इसलिए प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट को भी सख्त होने की जरुरत है.

दिल्ली में रहने वाला हर व्यक्ति है 'स्मोकर'

 तमाम बड़े डॉक्टर इस बात की चेतावनी देते हैं कि दिल्ली हवा में साँस लेने से फेफड़े पर जहरीली परत जम जाती है जिसका असर लम्बे समय तक रहता है. वहीँ वैज्ञानिकों का कहना है कि 'एक दिन में एक इंसान 25 हज़ार बार सांस लेता है. एक बार में वो 350 से 400 मिलीलीटर हवा अपने अंदर लेता है. जिसमें दिल्ली शहर में लोग रोजाना 10 हजार लीटर प्रदूषित और जहरीली हवा अपने अंदर लेते हैं. सीधे शब्दों में कहा जाये तो एक व्यक्ति रोजाना 20 से 25  सिगरेट पी रहा है. अगर गौर किया जाये तो एक बड़ा स्मोकर भी शायद ही एक दिन में इतनी सिगरेट पीता होगा. एक तरफ तो लगातार सिगरेट पीना जानलेवा बताया जा रहा है तो दूसरी तफर अनजाने में लोग इसके शिकार बन रहे हैं. 

क्या है जनता की जिम्मेदारी 

चिड़िया और किसान की कहानी आप सभी ने सुनी होगी जिसमें किसान अपने सभी सगे- सम्बन्धियों को फसल काटने की बात कहता है लेकिन चिड़िया निश्चिंत रहती है लेकिन जिस दिन वो स्वयं खेत काटने की बात कहता है तब चिड़िया अपने बच्चों को उड़ चलने की सलाह देती है. ठीक वैसे ही जब तक हम खुद जागरूक नहीं होंगे तब तक कोई भी सरकार या सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई असर नहीं होने वाला है. यह हमें सोचना होगा कि दिवाली पर चंद लम्हों की ख़ुशी के लिए जो अँधा -धुंध पटाखें हम फोड़ते हैं उसका कितना बड़ा नुकशान हमें और दूसरों को उठाना पड़ता है. इसके साथ ही गाड़ियों का कम से कम इस्तेमाल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. वैसे ही बेवजह ऐसी न चलाएं और सिग्नल पर गाड़ी का इंजन बंद कर दें. जिस दिन हम सब इन छोटी -छोटी बातों के बारे में सोचने लग जायेंगे उस दिन फर्क अपने आप नजर आने लगेगा. 

खूब फल-फूल रहा है एयर प्यूरिफ़ायर का बाजार 

कहतें हैं कि व्यापारी हर परिस्थिति में अपना मुनाफा देखते हैं. जी हाँ चारों तरफ प्रदूषण के हाहाकार में बाजार में एयर प्यूरीफायर से लेकर एयर मास्क की बिक्री में खूब रौनक रह रही है. डॉक्टरों द्वारा  मास्क लगाकर ही घरों से बाहर निकलने की सलाह और घर के वातावरण को साफ रखने के लिए लोग धड़ल्ले से मास्क और एयर प्यूरीफायर खरीद रहे हैं. सिर्फ साल   2017 में भारत में लगभग दो लाख एयर प्यूरीफ़ाइंग मशीनों की खरीददारी की गयी. वहीँ साल 2022 तक इस  बाज़ार को 14.5 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है.

सरकारें क्या करें 

यह हर साल का रोना है की पंजाब -हरियाणा के किसान पराली जलाते हैं और दिल्ली की हालत ख़राब हो जाती है. लेकिन इस मसले पर कोई भी ठोस कदम उठाते हुए नहीं देखा जा रहा है. वहीं जब दिल्ली में प्रदूषण असहनीय हो जाता है तो 10 - 5  दिन के लिए ऑड- इवेन स्किम लांच कर दी जाती है, जबकि इसका व्यापक असर होता नहीं दीखता है. अगर सच में दिल्ली की सरकार को लोगों की चिंता है तो इस दिशा में ठोस कदम उठाते स्थायी समाधान की तरफ विचार करती. जिसमें रिहायसी इलाकों के साथ ही पूरे दिल्ली में पड़ी मिट्टी की वैक्यूम के साथ पानी का छिड़काव शामिल है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बेहतर और लक्जरी बना कर भी काफी हद तक लोगों निजी गाड़ियों के इस्तेमाल से रोका जा सकता है. इतना ही एमसीडी के कर्मचारी जब सड़कों पर झाड़ू लगाते हैं तो बहुत सारा धूल हवा में उड़ा देते है सरकार को इस दिशा में भी कदम उठाने की जरुरत है कि कैसे कम से कम धूल उड़ाए और कूड़े को जलाये बिना सड़कों की सफाई की जा सके. ऐसे तमाम छोटी -छोटी चीजों पर अगर सालों भर ध्यान दिया गया तो निःसंदेह ही दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण में कमी आएगी. वहीं सरकर को काम करता देख लोग भी जागरूक होंगे.

-विंध्यवासिनी सिंह 


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