शत्रु संपत्ति को देश हित में खर्च हो जाना चाहिए






हाल के समय में भारत सरकार के रिजर्व बैंक से टकरा हट का मामला खबरों में छाया रहा था इसके अनुसार भारत सरकार रिजर्व बैंक से इसलिए पैसे मांग रही है ताकि मंदी के समय आर्थिक जरूरतों को पूरा किया जा सके खैर इस पर तो रब ही विवाद चल रहा है किंतु इस बीच एक अच्छी खबर यह आई कि सरकार शत्रु संपत्ति के शेयर बेचकर पैसे जुटाने वाली है इसके अनुसार मोदी सरकार ने क्या प्रोसेस होना चाहिए और किस तरीके से यह पूरी प्रक्रिया पूरी होगी इसके बारे में निर्णय कर लिया है और बताया जा रहा है एक सर्वे के अनुसार की तकरीबन 3000 करोड रुपए शत्रु संपत्ति को बेचकर प्राप्त किया जा सकता है

बताते चलें कि शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 इंडियन पार्लियामेंट द्वारा पास किया गया एक कानून है जिसके अनुसार उन सभी लोगों की संपत्ति पर भारत सरकार का अधिकार होगा जो बंटवारे या फिर 1965 या 1971 के वार के बाद पाकिस्तान चले गए और उन देश की नागरिकता ले ली उनकी तमाम संपत्ति शत्रु संपत्ति घोषित की जा चुकी है और पहली बार उस संपत्ति की को बेचकर धन जुटाने की बात कही जा रही है.
2016 में किरण रिजिजू में इसी बिल में संशोधन पेश किया जिसके अनुसार ना केवल पाकिस्तान बल्कि 1962 के चीन भारत युद्ध के बाद देश छोड़कर जाने वाले लोगों की संपत्ति भी शत्रु संपत्ति के अंतर्गत आ गई.
हालांकि इस अधिनियम को अदालत से चुनौती में मिली लेकिन वह खारिज हो गई और अभी भारत में तकरीबन 9000 शत्रु संपत्ति की पहचान की है जिनकी कीमत एक लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है.

क्या हैं इसके फायदे - बता दें कि इस वित्त वर्ष के  7 महीने पूरे होने के बाद भी सरकार ने मात्र 10,000 करोड़ रुपये ही इकठ्ठा किया है जो कि तय लक्ष्य  80,000 करोड़ रूपये से काफी कम है. ऐसे में सरकार अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए वर्षों से बेकार पड़ी शत्रु संपत्ति को बेचेगी. वहीं सरकार का कहना है कि इस बायबैक से मिली राशि से केंद्र के विनिवेश प्रोग्राम को बढ़ावा मिलेगा और इसका इस्तेमाल कल्याण कार्यक्रमों में किया जा सकेगा. एक तरह से देखा जाये तो यह सरकार का सार्थक कदम है ऐसे रजवाड़े जो देश की नागरिकता को छोड़ किसी अन्य देश की नागरिकता अपना चुके हैं ऐसे में यहाँ बरसों से पड़ी हुई उनकी सम्पति को देश हित में खर्च करना कुछ गलत नहीं है. एक सवाल यह उठाया जा रहा है जो लोग देश छोड़ गए उनके वारिश जो इसी देश देश के नागरिक है संपत्ति छीनने से उनके साथ अन्याय होगा. इस सन्दर्भ में बस यही कहा जा सकता है जो असली मालिक था वो तो दूसरे देश का नागरिक बन गया फिर से सम्पति ट्रांसफर कब हुई. इसलिए इस तरह के दलील में कुछ खास दम नहीं है. बता दें कि इस मामले में राजा महमूदाबाद के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट किसी भी मुद्दे पर किसी के पक्ष में कोई फैसला नहीं सुनाया है.

उत्तर प्रदेश में हैं ज्यादा शत्रु संपत्ति -  देश भर में कुल आंकी गयी  9,281 शत्रु संपत्तियों में अकेले उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 4,991 संपत्तियां हैं इसमें भी 125 से ज्यादा शत्रु संपत्तियां अकेले राजधानी लखनऊ में हैं. वहीं दूसरे स्थान पर है पश्चिम बंगाल जहाँ  2,735  शत्रु संपत्तियों का आंकड़ा पेश किया गया है. इसके साथ ही  दिल्ली में 487 संपत्तियां हैं. वहीं चीन गए लोगों से जुड़े 126 शत्रु संपत्तियों में मेघालय में 57 और पश्चिम बंगाल में 29 संपत्तियां हैं.

बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी है लागू शत्रु सम्पति का कानून
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने बहुत पहले ही लगभग बंटवारें के बाद  ही शत्रु सम्पत्ति का हवाला देकर भारत आये हिन्दुओं की जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया था. वहीं पाकिस्तान से अलग होने के बाद बांग्लादेश ने भी शत्रु संपत्ति नियम ला कर भारत और पाकिस्तान गए लोगों की सम्पत्तियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया. 

-विंध्यवासिनी सिंह 




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