मंदिर मुद्दा- धैर्य जरुरी है


जब भी चुनाव आता है तब तमाम मुद्दों के साथ ही एक अहम् मुद्दा वर्षों से जनता के सामने गर्माता रहा है. यह मुद्दा कोई और नहीं बल्कि राम लला को घर देने अर्थात उनकी जन्मभूमि अयोध्या में राम -मंदिर का निर्माण कराने का है. इस बार जब बीजेपी की पूर्णबहुमत की सरकार है तब भी यह मामला साढ़े चार साल तक खींचता रहा, बता दें कि बीजेपी ने हमेशा से ही मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाया है और इसे बनवाने की प्रतिबद्धता दिखाई है. जिस तरह से बीजेपी और आरएसएस ने मंदिर निर्माण की पैरोकारी की है उस तरह जनता ने अगर आरएसएस की सहायता से बनी बीजेपी की सरकार से मंदिर निर्माण की उम्मीद लगायी है तो गलत क्या है?. लेकिन जैसा कि हम जानते हैं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ़ की पीठ ने अयोध्या मामले पर सुनवाई जनवरी 2019 के लिए टाल दिया है. इतना ही नहीं कोर्ट ने यह भी कन्फर्म नहीं किया है कि सुनवाई किस बेंच के सामने होगी या सुनवाई किस तारीख से शुरू होगी और इसका फ़ैसला कब आएगा. हालाँकि राजनीति के जानकारों का मानना है कि कोर्ट के इस फैसले से मंदिर मुद्दे का हल इतनी जल्दी निकलना मुश्किल है और इधर चुनाव में भी बहुत कम  समय बचे है. ऐसे में इस मसले पर बिना किसी ठोस हल के इस चुनाव में बीजेपी के सामने चुनौतियाँ कठिन होने वाली हैं. वहीँ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरफ से भी सरकार के लिए मुश्किल खड़े करने वाले बयान दिए जा रहे हैं. कुछ दिनों पहले ही आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार और संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी ने साफ कहा है अगर सर्वोच्च न्यायालय को निर्णय करने में कुछ कठिनाई आ रही है तो सरकार अध्यादेश ला कर मंदिर निर्माण का कार्य सुनिश्चित कराये. 


इधर आम लोगों के बीच भी मंदिर के फैसले को टालने से धैर्य जवाब देने लगा है उस पर से तमाम विपक्षी पार्टियों द्वारा लगातार इस आग में घी डालने का काम किया जा रहा है. बतादें कि कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद ही कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने बयान दिया कि बीजेपी चाहे तो मंदिर मामले पर कानून बनाए, कांग्रेस उसे नहीं रोक रही है. वहीँ महाराष्ट्र में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एलान किया है कि वो 25 नवंबर को अयोध्या जाएंगे और वहीँ से पूछेंगे कि प्रधानमंत्री मोदी कब अयोध्या आएंगे. उद्धव यहीं नहीं रुके और चैलेन्ज करते हुए बोले कि "अगर आपने राम मंदिर का निर्माण शुरू नहीं किया तो हम करेंगे. हम हिंदुओं को साथ लेकर ये निर्माण करेंगे. हिंदू किसी की जागीर नहीं हैं." सब जानते हैं कि 1992 में विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को गिरा देने के बाद हिंदू और मुसलमानों के बीच भड़के सांप्रदायिक दंगे में लगभग 2000 से ज़्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. और अभी भी इस मुद्दे पर बात करने पर दोनों सम्प्रदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. ऐसे में अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता को भड़काना कहाँ तक उचित है.

 जैसा कि सब जानते है हाईकोर्ट ने पहले मंदिर मामले में पहले जमीन का दो तिहाई हिस्सा हिंदू पक्ष को सौंप ही चुका है. और सुप्रीम कोर्ट को भी करोड़ों लोगों के भावनाओं का ख्याल रखते हुए न्याय पूर्ण फैसला ही सुनाना चाहिए. एक बात और ध्यान देने वाली है कि न ही विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस जैसी हिंदूवादी संगठनें भारत के सारे हिंदुओं की प्रतिनिधि है और न ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सभी मुसलमानों की नुमाइंदा है ऐसे में इन धार्मिक संगठनों को भी अपनी मर्यादा और हद समझनी चाहिए. यह सच है कि आम जनता ने अपने आराध्य भगवान राम के मंदिर निर्माण को लेकर बहुत इंतजार किया है, लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि किसी के भड़काने से आवेग में आ जाये. इसके साथ ही कोर्ट को भी अब टाल -मटोल के रवईया को ख़त्म करते हुए अपना फैसला सुना कर वर्षों से चले आ रहे इस विवाद को सुलझा देना चाहिए.


- विंध्यवासिनी सिंह 

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