प्रवीण तोगड़िया को किनारे किये जाने के मायने




दिसंबर 2011 से विश्व हिन्दू परिषद् में अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर अपनी सेवा दे रहे नेता प्रवीण तोगड़िया को बड़े ही रोचक ढंग से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. यही नहीं इस पूरी प्रक्रिया में ऐसा पहली बार हुआ है कि वीएचपी के पदों के लिए चुनाव का सहारा लिया गया. ज्ञात हो कि इससे पहले दिवंगत नेता अशोक सिंघल ने 1984 से लेकर दिसंबर 2011 तक वीएचपी के कार्यकारी अध्यक्ष को संभाला और बाद में ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए यह पद हिंदुत्व को लेकर बेहद सक्रिय रहे  प्रवीण तोगड़िया को सौंप दिया. वहीं अपनी छवि के अनुरूप तोगड़िया लगातार विवादित बयान दे कर चर्चा में बने रहे. चाहे मुसलमानों का मामला हो या गौरक्षकों का या फिर भारत माता के जय कारे इन मुद्दों पर कई बार तोगड़िया में मोदी सरकार के लिए भी मुशीबतें खड़ी कर दी. हालाँकि कहा तो यह भी जा रहा है कि लगातार मोदी सरकार के प्रति हमलावर हो रहे तोगड़िया को आरएसएस ने योजना के तहत विश्व हिन्दू परिषद् से दूर कर उनके ताकत को कम किया है. वैसे भी मोदी और तोगड़िया कि टकराहट किसी से छुपी नहीं है और ऐसे कई मौके आये जब प्रवीण तोगड़िया ने सीधे तौर पर मोदी और उनके कामकाज के तरीकों को निशाना बनाया. जबकि आरएसएस अपने हिंदुत्व के अजेंडे में मोदी सरकार के रोल को अहम्  मानती है ऐसे में तोगड़िया को बाहर का रास्ता दिखाना जरूरी हो गया था. वहीं अगर बात हिंदुत्व की हो तो विश्व हिन्दू परिषद् का गठन क्यों हुआ यह जानना भी जरुरी है.

विश्व हिन्दू परिषद् के गठन का उद्देश्य
मध्यप्रदेश राज्य सरकार ने एक नियोगी कमीशन का गठन कर उसको  ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों के अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी थी.  वहीं वर्ष 1957 में इस इस कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमे कहा गया कि ईसाई मिशनरियां स्कूलों, अस्पलातों और अनाथालयों के माध्यम से गरीब जनता को पैसे का लालच दे कर उनका धर्म परिवर्तित करा रही हैं. वहीं इस धर्मान्तरण के गंभीर समस्या से निपटने तथा हिंदुत्व के प्रचार के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन परम पूजनीय सरसंघचालक श्री गुरुजी और सांदीपनी साधनालय के संस्थापक स्वामी चिन्मयानन्द, श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, डॉ. के.एम. मुंशी, सन्त तुकड़ो जी महाराज, स्वामी शंकरानन्द, ब्रह्मचारी दत्तमूर्ति, मास्टर तारा सिंह, ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह आदि ने मिलकर  29 अगस्त 1964 को विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की. इस संगठन का मूल उद्देश्य था की देश - विदेश में रह रहे हिन्दुओं को उनके धर्म से जोड़े रखा जाये और देश के अंदर धर्म परिवर्तन के उद्देश्य में लगीं संस्थाओं पर भी नियंत्रण  किया जा सके.

निशाने पर क्यों आये तोगड़िया -  
अटल जी के शासन के बहुत दिनों के बाद भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है और इस बात से नाकारा नहीं जा सकता कि इसके लिए आरएसएस ने एड़ी- चोटी का जोर लगा दिया था. वहीं आरएसएस के हिंदुत्व के खाके में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और लोकप्रियत भी सही सही फिट बैठ रहा है. और दोनों ही पक्ष लगातार एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक रवैया भी अपनाये हुए हैं. ऐसे में आरएसएस की यह भरपूर कोशिस रहेगी की नरेंद्र मोदी सत्ता में लम्बे समय तक बने रहे. वहीं किसी भी व्यक्ति का लगातार मोदी को निशाने पर लेना आरएसएस के राह में रोड़ा अड़ाने वाली बात है. जहाँ तक प्रवीण तोगड़िया की बात करें तो पिछले कुछ समय से उनके मन में नरेंद्र मोदी के खिलाफ असंतुष्टि कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी. इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि  गुजरात में अपने आप को गायब करने और मरवाने तक के आरोप उन्होंने गुजरात बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर लगा दिए. इसके साथ ही तोगड़िया के ऊपर पटेल आंदोलन को हवा देने का भी आरोप लगा तो वहीं इस आंदोलन का मुख्य चेहरा रहे हार्दिक पटेल से उनकी बढ़ती नजदीकी भी आरएसएस के नजरों में खटकी. हालाँकि हिन्दू परिषद् से दूर कर आरएसएस ने प्रवीण तोगड़िया की ताकत को कम  जरूर  कर दिया है लेकिन उनके विवादित बोलों को अभी रोक पाना आसान नहीं होगा तो वहीं विपक्ष भी तोगड़िया  रूपी हथियार का इस्तेमाल PM मोदी के खिलाफ जरूर करेगा. वहीं प्रवीण तोगड़िया की जगह कार्यकारी अध्यक्ष बने आलोक कुमार तथा अध्यक्ष बने हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और पूर्व जस्टिस विष्णु सदाशिव कोकजे से उम्मीद है कि वो आरएसएस के सपने को पूरा करेंगे और राम मंदिर निर्माण में अपनी अहम् भूमिका भी निभाएंगे.












निशाने पर क्यों आये तोगड़िया -  अटल जी के शासन के बहुत दिनों के बाद भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है और इस बात से नाकारा नहीं जा सकता कि इसके लिए आरएसएस ने एड़ी- चोटी का जोर लगा दिया था. वहीं आरएसएस के हिंदुत्व के खाके में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और लोकप्रियत भी सही सही फिट बैठ रहा है. और दोनों ही पक्ष लगातार एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक रवैया भी अपनाये हुए हैं. ऐसे में आरएसएस की यह भरपूर कोशिस रहेगी की नरेंद्र मोदी सत्ता में लम्बे समय तक बने रहे. वहीं किसी भी व्यक्ति का लगातार मोदी को निशाने पर लेना आरएसएस के राह में रोड़ा अड़ाने वाली बात है. जहाँ तक प्रवीण तोगड़िया की बात करें तो पिछले कुछ समय से उनके मन में नरेंद्र मोदी के खिलाफ असंतुष्टि कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी. इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि  गुजरात में अपने आप को गायब करने और मरवाने तक के आरोप उन्होंने गुजरात बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर लगा दिए. इसके साथ ही तोगड़िया के ऊपर पटेल आंदोलन को हवा देने का भी आरोप लगा तो वहीं इस आंदोलन का मुख्य चेहरा रहे हार्दिक पटेल से उनकी बढ़ती नजदीकी भी आरएसएस के नजरों में खटकी. हालाँकि हिन्दू परिषद् से दूर कर आरएसएस ने प्रवीण तोगड़िया की ताकत को कम  जरूर  कर दिया है लेकिन उनके विवादित बोलों को अभी रोक पाना आसान नहीं होगा तो वहीं विपक्ष भी तोगड़िया  रूपी हथियार का इस्तेमाल PM मोदी के खिलाफ जरूर करेगी. वहीं प्रवीण तोगड़िया की जगह कार्यकारी अध्यक्ष बने आलोक कुमार तथाअध्यक्ष बने हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और पूर्व जस्टिस विष्णु सदाशिव कोकजे से उम्मीद है कि वो आरएसएस के सपने को पूरा करेंगे और राम मंदिर निर्माण में अपनी अहम् भूमिका भी निभाएंगे 


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