आज़ादी के 70 साल बाद भी सरकारी तंत्र बेहाल - Negligence In Government Sector



आजादी का जश्न हमें याद  दिलाता है कि किस तरह से हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहुति दे कर हमें एक आज़ाद देश में साँस लेने का अधिकार प्रदान किया. इसीलिए हम हर साल आज़ादी की लड़ाई में शहीद हुए उन वीरों को याद करते हैं. अभी अभी हमारे देश ने आज़ादी के 70 साल पूरे किये और वाकई  ये किसी भी देश के लिए ये काफी गर्व की बात है अपनी आज़ादी की वर्षगांठ को मनाना. और ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा मनोहर छवि, तेज -तर्रार, और वाक्पटु नेता देश की अगुआनी करे तो बात ही क्या है. पिछले तीन सालों की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री जी के द्वारा तमाम उपलब्धियां गिनाई गयीं, तो वहीँ कुछ सुनहरे भविष्य के सपने भी दिखाए गए. मगर इन उपलब्धियों और सपनों के बीच एक अहम् सवाल ये है कि क्या हम ने, हमारे देश ने, हमारी व्यवस्था ने सच में  वो मुकाम हासिल किया है जो कि आज़ादी के 70 साल के बाद होनी चाहिए. निःसंदेह हमारा जवाब 'हाँ' नहीं हो सकता, खासकर सरकारी तंत्रों की कार्यप्रणाली के विषय में तो बिलकुल भी नहीं. इसका सबसे ताजा और दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण गोरखपुर के बीआरडी  मेडिकल कॉलेज में हुयी लापरवाही और लगभग 60 मासूम बच्चों की मौत से लगा सकते हैं.

जी हाँ ये वही गोरखपुर है जो उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री का गढ़ कहा जाता है, और ये वही योगी आदित्यनाथ हैं जिनके सपथ लेते ही पूरे उत्तरप्रदेश में  सिस्टम को सुधारने को लेकर उथल -पुथल मच गयी थी. और संयोग देखिये मात्र दो दिन पहले खुद सीएम उसी हॉस्पिटल के दौरे पर थे और उन्हें कानों -कान खबर भी नहीं हुयी  की हॉस्पिटल किस बदहाली से गुजर रहा है. और अब जब इतनी बड़ी लापरवाही के चलते बच्चों की मौतें हुईं हैं तो फिर ऐसे औचक निरिक्षण और नेताओं के दौरों पर सवाल उठना लाज़मी है. यही नहीं जिस एंटी -रोमियो  स्क्वाड को लेकर योगी सरकार ने इतनी चर्चा बटोरी और उसी यूपी में दिन-दहाड़े दो लड़के स्कूली छात्रा को चाकू मारकर मौत के घाट उतार  देते हैं और निडर हो कर अब तक घूम रहे हैं. तो क्या ये माना जाये कि जिस चमक -धमक के साथ योगी सरकार लॉन्च हुयी थी वो चमक अब फीकी पड़ रही है.एक साल भी नहीं हुए और उत्तर प्रदेश में फिर से शासन व्यवस्था जर्जर अवस्था में चला गया है. ये सिर्फ किसी एक विभाग की लापरवाही की बात नहीं है बल्कि आप देखेंगे कि लगभग सारे सरकारी तंत्र में इसी तरह कि लापरवाही और दुर्व्यवस्था कायम है. अब चाहें मेडिकल विभाग हो, पुलिस या शिक्षा विभाग हर जगह धांधली और रिश्वतखोरी का बोल बोलबाला है. ऐसा नहीं है कि ऐसे हालत सिर्फ उत्तर प्रदेश के ही हैं बल्कि समूचे भारत में यही हालत हैं.


हम बिहार कि बात करें तो हर साल यहाँ बाढ़ के पानी से तबाही मचती है और सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, लाखों लोगों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. वहीँ हर बार की  तरह तमाम सरकारें इंतजार करती हैं कि बाढ़ आये और राहत शिविर का आयोजन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाये. अरे भाई जब ये तय है कि पानी का दबाव बढ़ते ही  नेपाल पानी छोड़ेगा जिसका नुकसान सीधा -सीधा बिहार और उत्तर प्रदेश के सटे इलाकों को उठाना पड़ेगा फिर इसकी तैयारी पहले से क्यों नहीं की जाती. क्यों नहीं वक़्त रहते प्रभावित इलाकों को खाली कराया जाता जिससे कम से कम नुकसान हो और इस समस्या का स्थायी उपाय पर विचार क्यों नहीं किया जाता. इस साल के बाढ़ की वजह से 200 से ज्यादा लोग मरे हैं और अभी राज्य के आधे से अधिक लगभग 20 जिले बाढ़ की चपेट में है.यही नहीं बाढ़ से करीब चौदह  हजार मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं. वहीँ  राज्य सरकार की तरफ से चलाये जा रहे  1336 राहत शिविर में  करीब सवा चार लाख लोगों ने शरण ली है. क्या वक़्त रहते पहल करने से इस मुसीबत को कम नहीं किया जा सकता था? मगर सरकारी व्यवस्था है किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है सब राम भरोसे चल रहा है.


अब आप कहेंगे कि ये तो यूपी - बिहार इसका कुछ नहीं हो सकता तो आपको बता दें कि अभी हुयी दो बड़ी रेल दुर्घटनाएं इस बात का सबूत है कि दुर्व्यवस्था और हद दर्जे की लापरवाही किस तरह से राष्ट्रिय स्तर पर भी छाया हुआ है. आज़मगढ़ जाने वाली कैफियत एक्सप्रेस और डम्पर से टकरा गयी और उसके 9  डिब्बे पटरी से उतर गए और 22  लोगों को जान गवानी पड़ी तथा 75 लोग घायल हो गए. वहीँ  उत्कल एक्सप्रेस के 14 डिब्बे  सिर्फ इस लिए  पटरी से उतर कर दुर्घटनाग्रस्त हो गए कि उस लाइन पर मरम्मत का काम चल रहा था और इससे सम्बंधित सावधानी नहीं बरती गयी. दुर्भाग्यवश इस घटना में लगभग डेढ़ सौ लोग घायल हो गए. कितना अजीब है ये और ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएं पहले कभी नहीं हुयी है मगर जब ऐसी घटनाएं होती हैं  तो तमाम मंत्री, नेता और अफसर ऐसा जताने लगते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा कदम उठाया जाने वाला है, भले ही कुछ समय बाद यह मामला ठन्डे बस्ते में क्यों नहीं चला जाता. 
हम  गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला पर नजर डालें तो यह साफ नजर आता है कि पहले तो इस बात को झुठलाने की कोशिश हुई कि मौतें ऑक्सिजन की कमी से हुई हैं, फिर इसके तुरंत बाद ऑक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी पर छापे मारे जाने लगे. इससे भी बात बनती नहीं दिखी तो बाकायदा एक तेज-तर्रार मुख्यमंत्री के द्वारा मामले को भटकने के लिए  जन्माष्टमी, कांवड़ यात्रा और नमाज का सहारा लेना पड़ा. लेकिन अफ़सोस कि किसी ने भी चाहें वो राज्य स्तर के नेता हो या राष्ट्रिय स्तर के किसी ने भी अपने बयान नहीं दिया कि  सरकारी अस्पतालों में आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई में जारी कमिशनखोरी की बात को सरकार गंभीरतापूर्वक लेगी और  सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध होगी. हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में हर छोटी -बड़ी घटना का ज़िक्र करते हैं तो हमें उम्मीद है कि इस तरीके से होने वाले तमाम सरकारी विभागों की  लापरवाही, कमीशनखोरी पर लगाम लगाने की कोशिश का आश्वासन तो जरूर ही देंगे.  


Web title- आज़ादी के 70 बाद भी सरकारी तंत्र बेहाल - Negligence In Government Sector 

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