जिय हो बिहार के लालू - Lalu Yadav Scams



प्राचीन काल में अपनी सम्पन्नता, शौर्यता और शिक्षा के लिए प्रसिद्ध बिहार की अगर आज चर्चा करें तो कभी विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहा यह प्रदेश, वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के सबसे पिछड़े राज्यों  में से एक गिना जाता है, कभी नालंदा विश्वविद्यालय जहाँ देश -विदेश के लोग शिक्षा लेने आते थे और आज अपने विषय का नाम जाने बगैर बच्चे टॉप कर जाते हैं. जैन और बौद्ध धर्मों का उद्भव स्थल रहा बिहार आज केवल भ्रस्टाचार, घोटाला, अराजकता के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है. और इसका सारा श्रेय अगर किसी को जाता है तो निःसंदेह  बिहार के सुप्रसिद्ध नेता लालू यादव को. जी हाँ लालू यादव एवं उनकी पत्नी ने बिहार में लगभग 15 सालों तक राज्य किया है. और सब जानते हैं कि इस  दौरान बिहार राज्य की स्थिती बिगड़ती चली गई, चोरी, रेप, किडनैपिंग की घटनाों को खूब बढ़ावा मिला. एक बार फिर लालू यादव चर्चा में हैं इस बार सीबीआई ने उनके 12 ठिकानों पर एक साथ छापे मारे हैं और  420 और 120-बी का मामला दर्ज किया गया है.

पटना विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने वाले लालू यादव को राजनीति में खासी दिलचस्पी थी, 80   के दशक में लालू यादव एक उभरते हुए नेता थे जिनकी खास शैली और बोलने का अंदाज लोगों को खूब भा रहा था . और इसी का नतीजा था कि मात्र 29 साल की उम्र में लालू यादव लोकसभा के सदस्य बने और राजनीति में अपना सिक्का जमाना शुरू कर दिए. लालू  यादव की तीक्ष्ण  दृष्टि बिहार की आबादी में 11% की हिस्सेदारी रखने वाले यादव वोट बैंक पर थी और उन्होंने अपने आपको लोअर कास्ट और यादवों के नेता के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया. जिसका सुखद परिणाम निकला और लालू जनता पार्टी से अलग हो कर खुद की पार्टी "राष्ट्रिय जनता दल" का गठन कर बिहार की राजनीति में  स्थापित हो गए. मगर बिहार की जनता का ये दुर्भाग्य था कि जिस व्यक्ति पर उसने भरोसा किया वो इतना बड़ा घोटालेबाज निकलेगा. जी हाँ जब लालू मुख्यमंत्री थे तब  बिहार सरकार के ख़ज़ाने से ग़लत ढंग से पैसे निकालने और  कई वर्षों में करोड़ों की रक़म का घपला  पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों के द्वारा  राजनीतिक मिली-भगत के साथ की गयी. शुरू शुरू में तो ये मामला एक-दो करोड़ रुपए का लगा मगर बाद में  900 करोड़ रुपए तक जा पहुंचा. और कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि घपला कितनी रक़म का है क्योंकि यह वर्षों से होता रहा है और बिहार में हिसाब रखने में भी भारी गड़बड़ियां हुई हैं.
जैसा की हम सब जानते हैं 1997 में लालू यादव पर चारा घोटाले का आरोप लगा और उन्हें मुख्यमंत्री पद से स्तीफा तक देना पड़ा और वो जेल भी गए. लेकिन हमारे देश में जेल व्यवस्था से कौन परिचित नहीं है लोग यहाँ जेल में बैठ कर भी शासन कर सकते हैं और यही हुआ लालू यादव के मामले में भी.

लालू के जेल जाने के दौरान उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने बिहार की राजनीति की बागडोर अपने हांथों में लिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन रहीं. भले ही लालू जेल में थे लेकिन राबड़ी देवी के माध्यम से सत्ता का संचालन जारी रखे हुए थे और इसके साथ यही भ्रष्टाचार, घोटालों और अनैतिक कार्यों का भी. अगर हम कहें कि लालू यादव के वजह से बिहार अपराधों का गए गढ़ बन गया तो ये गलत नहीं होगा. कौन नहीं जनता कि हत्या, डकैती, रेप जैसे सैकड़ों अपराधों का दोषी मोहम्मद शहाबुद्दीन को लालू का खास संरक्षण प्राप्त है. यहाँ तक कि जेल में भी शाहबुद्दीन कि सुविधाओं का ख्याल रखा जाता है है वो भी लालू यादव की मेहरबानी से. खैर ये जनता है कुर्सी पर बैठना जानती है तो उतारना भी जानती है और इसका एहसास अच्छे से होगा लालू यादव को. लगभग 10 सालों तक सत्ता में वापसी को तड़पते रहे लालू को जनता ने एक बार फिर मौका दिया है बिहार की राजनीति में सक्रीय भूमिका निभाने का लेकिन इस बार फिर उनका नाम घोटालों और बेनामी सम्पति के लिए उछल रहा है, और इस बार न केवल  लालू बल्कि उनका पूरा परिवार इस लपेटे में है.  किसी ने सही कहा है जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे. लालू यादव ने अपने दोनों  ही बेटों की राजनीति में लांचिंग बड़े दी धूमधाम से की जहां छोटा बेटा मुख्यमंत्री तो बड़ा बेटा स्वास्थ्यमंत्री के पद पर आसीन हो गया. 

मगर लालू यादव के पूर्व में किये गए घोटाले उनके बेटों के वर्तमान को अधर में डाल रहे हैं, अगर लालू परिवार पर आरोप अगर सिद्ध हो जाते हैं तो शायद ही दो बारा  मौका मिले बिहार की जनता की सेवा का. इसी लिए बुजुर्गों ने कहा है कि उतना ही खाओ जितना पचा सको. जिस राज्य की जनता ने आपको मशीहा समझा आपने उन्हें ही नर्क वाली स्थिति में ला दिया. लालू यादव का तो सक्रीय राजनीति से लगभग वास्ता ख़त्म ही हो गया है मगर उनके बच्चों की तो अभी शुरुआत हुयी है ऐसे में अभी से घोटालों और घपलों में नाम आने शुरू हुए तो वो दिन दूर नहीं जब बिहार  की राजनीति से पुनः वनवास हो जाये. इसलिए यादव फैमिली को यह समझना आवश्यक है की पुराने दिन अब नहीं रहे जहां चारों ओर लूट - खसोट मची थी और कोई बोलने वाला नहीं था. अब समय बदल गया है, इसलिए राजनीति को सेवा की भावना से की जाये न की पारिवारिक व्यवसाय समझ कर मुनाफा कमाने की निति अपनायी जाये. 

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विंध्यवासिनी सिंह

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