सच्चे गोरक्षकों को सलाम - Gorakshak, Hindi Article

गोरक्षा हमारे देश में कोई आज शुरू हुई परंपरा नहीं है, बल्कि हज़ारों हज़ार साल से यह चली आ रही है. अन्य पशुओं से अलग अगर गाय को माता का दर्जा दिया गया है तो यह यूं ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे तमाम व्यावहारिक कारण रहे हैं. हालाँकि, भारतीय सभ्यता में न केवल गाय को, बल्कि हर प्रकार के पशु, पक्षी और जानवरों का अपना महत्त्व बताया गया है. अब सांप को ही ले लीजिये, जिसकी नाग-पंचमी पर पूजा होती है या फिर गणेश जी की सवारी के रूप में चूहे की महिमा ले लीजिये.
मतलब साफ़ है, हम प्रकृति-पूजक और प्रकृति द्वारा दिए गए प्रत्येक उपहार के प्रति कृतज्ञ रहे हैं. शायद इसीलिए जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने पेरिस समझौते से अपने देश को अलग करते समय भारत पर प्रदूषण फैलाने सम्बंधित आरोप लगाए तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीना ठोंकते हुए कहा कि "हम आज से नहीं, बल्कि पांच हज़ार साल से भी अधिक समय से प्रकृति का ध्यान रख रहे हैं." वस्तुतः यह हमारे संस्कार में घुल गया है, जो किसी हाल में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ट्रांसफर होता रहता है. ऐसे में किसी अन्य को हमें यह सिखाने की कतई आवश्यकता नहीं है कि प्रकृति और प्राकृतिक वस्तुओं के साथ जीवों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए.
यही बात जब गाय को लेकर कही जाती है तो दुनिया को आश्चर्य होता है और कई छद्म बुद्धिजीवी हमें पिछड़ेपन का शिकार बताते हैं. पर भाई, हम तो व्यावहारिक बात करते हैं. गाय और हमारी कृषि प्रधान भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना गहरा सम्बन्ध रहा है, यह कोई बताने वाली बात है क्या? गाय का न केवल दूध, बल्कि उसका गोबर-मूत्र और उसके बछड़े कृषि कार्य में किस तरह से काम आते रहे हैं, इस तथ्य से हर कोई भली भांति परिचित है. रही बात दूसरे पशुओं से उसकी तुलना की तो तमाम वैज्ञानिक शोधों में यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि गाय का दूध बच्चों, बूढ़ों और जवानों के लिए सर्वोत्तम रहा है. इसी गाय के सहारे आज आधुनिक युग में भी बड़े बड़े कारोबार खड़े किये जा रहे हैं. अब इससे अधिक गाय की महिमा बताने की भला क्या आवश्यकता है.
हालाँकि, दुःख की बात यह है कि एक ओर गायें जहाँ काटी जा रही हैं और सरकार उस पर कोई ठोस कानून पारित नहीं कर पा रही है, वहीं तमाम ऐसे असामाजिक तत्व भी समाज में फ़ैल गए हैं जो गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करते नज़र आते हैं. ऐसे कार्य उन संगठनों को भी बदनाम करते हैं, जो सच्चे मन से गोरक्षा करते हैं. बहुचर्चित अख़लाक़ हत्याकांड के बाद हमारे पीएम नरेंद्र मोदी ने भी यह बात स्वीकार किया था कि 80 फीसदी से अधिक गोरक्षक फर्जी हैं. जाहिर है, इन पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है और सच्चे गोरक्षकों को सम्मानित किये जाने की आवश्यकता है. सच्चे गोरक्षकों के तमाम उदाहरण आपको आसानी से मिल जायेंगे और इन्हें सलाम किया जाना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के कारण गोवंश में बृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप हमारे चरमरा रही कृषि व्यवस्था और समाज के वंचित तबके को इससे सहारा मिलता है.

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