ओम पूरी से सीखें माफ़ी मांगना - Legendary Indian Actor Om Puri





'बूढा ही सही गांव में एक मर्द अभी ज़िंदा है'  कितना सटिक बैठती है ये लाइन फिल्म अभिनेता ओम पूरी के जीवन पर. वैसे तो यह डॉयलॉग उनकी ही बहुचर्चित फिल्म  'मिर्च- मसाला' का है लेकिन उन्होंने इस लाइन को जिया है. भारतीय फिल्म जगत के गिरते मापदंड में भी अगर अभिनय का कोई पैमाना रखा जायेगा तो निःसंदेह ही उसमें "ओम पूरी" साहब का नाम होगा.बॉलीवुड तथा रंगमंच के बेहतरीन कलाकारों में स्थान रखने वाले ओम पुरी आज हमारे बीच नहीं रहे.  66 साल की उम्र में  उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. बहुत चंद लोग ऐसे होते हैं जो अपने जीवन काल में कामयाबी का स्वाद चखने के बाद भी उम्र के इस पड़ाव में भी अपने कार्य को लेकर इतना संजीदा रहते हैं जैसे ओम पूरी थे. मिली जानकारी के अनुसार इस साल उनकी 6  फ़िल्में फ्लोर पर थीं, जिसमें सलमान खान की बहुप्रतीक्षित ट्यूबलाइट भी सामिल थीं. ओम पुरी ने अपने फ़िल्मी करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. आर्ट और परंपरागत फिल्मों के साथ ही कमर्शियल फिल्मों पर भी उनकी पकड़ उतनी ही मजबूत थीं. इसीलिए तो उन्हें अभिनय के हर फन का माहिर माना जाता है. ओम पुरी ने फिल्म अर्धसत्य में अभिनय की नई ऊंचाइयों को छुआ था, उन्हें इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय अवॉर्ड दिया गया था. उन्होंने हॉलीवुड की मशहूर फ़िल्में जैसे माय सन द फ़ॉनेटिक , ईस्ट इज ईस्ट, द पैरोल ऑफिसर, वुल्फ में भी काम किया है. ओम पुरी पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके हैं. इसके साथ ही  2004 में उन्हें ब्रितानी फ़िल्म उद्योग में योगदान के लिए मानक ओबीई मिला था (ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश अंपायर). 

जैसा की हम सब जानते हैं भारतीय फिल्मी दुनिया काफी चकाचौंध भरी है, जहाँ हीरो बनने के लिए आपका चिकना, गोरा, सुडौल तो होना निश्चित ही है.  इसके उलट ओम पूरी बेहद साधारण शक्ल -सूरत, चेहरे पर चेचक का दाग, मोटी सी नाक लिए न बल्कि अभिनय का झंडा गाड़ा बल्कि  बहुत सारी फिल्मों में लीड हीरो की भूमिका भी किये. अस्सी और नब्बे का वो दशक जब बॉलीवुड में अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी जैसे दिग्गज अभिनेताओं का  बोल -बाला था उस वक़्त भी ओम पूरी ने अपने डायलॉग डिलीवरी का विशेष अंदाज़ और दमदार आवाज़ से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा. चेहरे से दिखने में शख्त मिजाज ओम पूरी की कॉमेडी भी लाज़वाब थी और इसके लिए उन्हें कुछ खास प्रयास नहीं करना पड़ता था. वो अपनी भाव-भंगिमाओं से, अपनी आवाज से ही कॉमेडी कर लेते थे.' जाने भी दो यारों', 'चुपके-चुपके', 'मालामाल विकली', 'चाची 420', 'आवारा पागल दीवाना', 'सिंग इज किंग', 'दुल्हन हम ले जाएंगे', 'बिल्लू', 'चोर मचाए शोर' और 'हेरा-फेरी' जैसी फिल्मों में आप साफ -साफ देख सकते हैं.

हरदिल अजीज इस कलाकार को विवादों से भी दो-चार होना पड़ा था. क्योंकी ओम पूरी हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखते थे. मजाकिया लहजे में ही वो काफी गम्भीर बातें कह जाते थे. एक बार किसी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि बॉलीवुड में चालीस सालों तक काम करने के बावजूद भी मैं 'खान' नहीं बन पाया हालाँकि इसको उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा था. वहीँ असहिष्णुता के मुद्दे पर आमिर खान के बयान का भी उन्होंने कड़ा विरोध किया था. इन सब विवादों के बीच जो सबसे चर्चित बयान था किसी शहीद सैनिक को लेकर जो उन्होंने टीवी डिबेट में कहा था. उनके इस बयान के लिए उनकी खूब खिंचाई हुयी. लेकिन इस अभिनेता को जैसे ही इस भयानक भूल का एहसास हुआ तुरंत ही माफ़ी मांग ली, न बल्कि माफ़ी मांगी वो उस सैनिक के घर पहुँच गए अपने किसी धार्मिक दोस्त की सलाह पर पश्चाताप का यज्ञ करने. उनके आवेग में दिए बयान को तो हर चैनल पर दिखाया गया लेकिन अपने भूल को सुधारने के लिए किये गए प्रयास को शायद ही किसी चैनल ने प्राथमिकता दी. हमारे देश में हर रोज कोई न कोई नेता या बड़ा आदमी कुछ न कुछ विवादित बयान देता है और हो हल्ला होने पर सॉरी बोल कर निकल जाता है. लेकिन ओम पूरी ने शहीद सैनिक के घर जाकर उसके परिवार से माफ़ी मांग कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा किया और मानवता का परिचय दिया.

18 अक्टूबर 1950 में अंबाला के एक पंजाबी परिवार में जन्मे ओम पुऱी फ़ौज में भर्ती होना चाहते थे. लेकिन किस्मत ने उन्हें  अभिनय की दुनिया में लाया. जहाँ उन्होंने भरपूर इज्जत और शोहरत कमाई. आज वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन मनोरंजन की दुनिया में किये गए उनके सराहनीय कार्य और योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा.
-विंध्यवासिनी सिंह 

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