भारतीय संस्कृति के प्रचार- प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका

सोशल मीडिया आज के समय में एक अलग तरह की दुनिया बन चूका है. इसका महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि पारंपरिक मीडिया की तरह न तो इसमें किसी एक लॉबी का प्रभुत्व है और काफी हद तक यह स्वतंत्र भी है, बल्कि मै कहूँगा स्वच्छंद है. तकनीक (टेक्नोलोजी) से जुड़े होने के कारण मै इसकी व्यापकता को असाधारण मानता हूँ, जो कि प्रत्येक दिन गुणात्मक रूप से बढती ही जा रही है. जो आज का विषय है, वह है भारतीय संस्कृति के प्रसार में सोसल मीडिया की भूमिका - तो अब तक के जो आंकड़े है मेरी नजर में, वह बहूत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं है क्योंकि भारतीय संस्कृति की गहरी समझ बहूत कम ही महानुभावों में विदित हो पाती है, फिर इसके वास्तविक प्रचार प्रसार का प्रश्न उठाना थोड़ी जल्दबाजी का विषय है. इस दौर में जब सोसल मीडिया अभी अपनी किशोरावस्था में है, तो सामान्य मनुष्य की तरह यह भी भटकाव के दोराहे पर खड़ा है. बहुधा इन सोशल माध्यमों पर सामग्री थोड़ी छिछली होती प्रतीत होती है. पर इसका यह मतलब कदापि नहीं है है कि हम सरकारी हुक्म से सहमत हैं जो इसकी आवाज की हत्या करने पर कई कई बार आमादा दिखी. बल्कि जरूरत है बौद्धिक समाज के थोडा ज्यादा सक्रीय होने की, आशा की किरण जगाने की.
निश्चित रूप से यह प्रसन्न होने की बात है कि अनेक मनीषी, विद्वान, नेता, लेखक, विचारक आज कल फेसबुक, ट्विट्टर इत्यादि सोशल माध्यमों पर सक्रीय हैं. यह उनके विचारों को एक मॉस तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बना है,, पर साथ में इस बात को लेकर अत्यंत दुःख का अनुभव होता है कि यही बुद्दिजीवी मात्र अपनी सक्रियता दिखने के लिए सस्ती मार्केटिंग का सहारा लेते हुए भटकाव लिए, द्विअर्थी कंटेंट भी प्रस्तुत करने में परहेज नहीं करते हैं. इसी सन्दर्भ में मै अपना एक अनुभव बताना चाहूँगा. पिछले दिनों देश के एक बुद्धिजीवी माने जाने वाले प्रसिद्द नेता के फेसबुक प्रोफाइल पर स्वामी विवेकानंद के सुन्दर विचार पढने को मिले, निश्चित रूप से अच्छा लगा यह देखकर, पढ़कर. परन्तु उन महाशय द्वारा अपना छाया-चित्र क्रम में ऊपर लगाया गया था और स्वामी विवेकानंद जी का निचे... जो देखने में ही अनुचित लगा. हमारे अग्रज माननीय विनोद बब्बर जी (जो वास्तव में सोशल मीडिया पर भारतीय संस्कृति के प्रचार की सार्थक प्रतिमूर्तियों में आगे हैं) द्वारा प्रतिक्रिया देकर ध्यान दिलाने के बावजूद, कई दिनों तक लगातार, बल्कि मै तो जबरदस्ती कहूँगा, वहीँ गलतियां जान-बूझकर होती रहीं. .... तो इस तरह की लापरवाही से जनमानस को उलटी सीख ही तो मिलेगी. खैर, इसके सकारात्मक पहलू को हमें ध्यान में रखते हुए माननीय बुद्धिजीवियों द्वारा इसे एक जिम्मेवारी के तौर पर लेना चाहिए, जिससे इस उभरते हुए काफी हद तक लोकतान्त्रिक माध्यम को अपनी जवानी (अभी यह किशोरावस्था में जो है) में सही राह पकड़ने में आसानी हो.
तकनीकि फिल्ड से होने के कारण मै कुछ अन्य विन्दुओं पर जरूर अपनी बातें रखना चाहूँगा, क्योंकि इन माध्यमों में यह आवश्यक भी है और उपयोगी भी:
१. सुरक्षा-
-असुरक्षित / अनजान सिस्टम पर लॉगइन करने से हमें बचना चाहिए, क्योंकि इसमें आपकी प्रोफाइल का पासवर्ड लिक होने का खतरा काफी ज्यादा होता है. यह इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यदि आपकी प्रोफाइल किसी के हाथ लग गयी, तो वह आपकी छवि को तार-तार कर सकता है. ... यदि बहूत जरूरी ही हो, तो आप प्राइवेट-ब्राउज़िंग / इन्कॉग्नीटो विंडो का प्रयोग करें. अपनी प्रोफाइल को और सिक्योर करने के लिए अपना पासवर्ड महीने में एक बार जरूर चेंज करें, और अपने मोबाइल नुम्बर से अपने फेसबुक अकाउंट को वेरीफाई करें.
२. पेज की सुरक्षा- सोशल मीडिया में सर्वाधिक पोप्युलर फेसबुक का प्लेटफोर्म है और इस पर अपनी कम्युनिटी को सुरक्षित ढंग से प्रचार करने का माध्यम आपका पेज है. यदि आपके पास एक विषय है, और आप उस पर लम्बे समय तक काम करने को इच्छुक हैं, तो आप अपना पेज बनाएं और कोशिश करें कि वह पेज विषय से सम्बंधित ही रहे. पेज को आप अपने साथ सामान विचार के इच्छुक लोगों को 'कंटेंट' डालने के लिए अधिकृत कर सकते हैं, जबकि मास्टर कंट्रोल आप अपने पास रख सकते हैं. इसमें आपको पेज देखने वालों के बारे में स्पष्ट आंकड़ा मिलता रहता है, और आप उस तरीके से इसमें कंटेंट का प्रबंधन कर सकते हैं. इस बारे में विशेष जानकारी के लिए आपको गूगल के साथ समय व्यतीत करना होगा अथवा आप मुझे ९९९००८९०८० पर काल कर सकते हैं.
३. यदि आप थोडा और गहरे एवं स्थायी रूप से सोशल माध्यमों का प्रयोग करना चाहते हैं तो आपको अपने समस्त कंटेंट (छायाचित्र, चलचित्र, लेख इत्यादि) ब्लॉग पर जरूर डालना चाहिए, जिसमें आपको एक आजादी का अनुभव होगा और आपके सिर्फ अपने कंटेंट होंगे आपके ब्लॉग पर, न किसी और का विज्ञापन और न अनचाहा कोई और कंटेंट... वस्तुतः, यह आपके समस्त योजनाओं का आधार बनने के लिए सर्वथा उपयुक्त है. ब्लोगिंग के लिए www.blogger.com ;; एवं www.tumblr.com दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सुविधाजनक वेबसाइट हैं, जो आपको मुफ्त और सुरक्षित सुविधाएं देती हैं. अपने ब्लॉग का समय- समय पर बैकप लेना न भूलें.
४. अन्य कई और तकनीकि विधियां हैं, जिनसे आप भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार में अहम् भूमिका अदा कर सकते हैं,, यदि आपके पास स्वस्थ कंटेंट है तो आप उस से सम्बंधित चित्र के साथ लोगों को मॉस मेल कर सकते हैं, सम्बंधित विषयों के फोरम पर जाकर चर्चा कर सकते हैं. पर यह विषय कभी और.
अंत में मै इस विषय की समाप्ति पर अपने पिछले छः साल के अनुभव के आधार पर यही कहूँगा कि सोशल मीडिया, अत्यधिक सोशल होने के बावजूद स्वस्थ भारतीय संस्कृति के कंटेंट से लबालब नहीं है. इसको लबालब करते हुए आज की पीढ़ी (क्योंकि अधिकांश पाठक इसी वर्ग के हैं) के योग्य हमें व्यावहारिक प्रस्तुति भी देने की कोशिश करनी है, तभी आज के विषय की सार्थकता बनेगी. मै, मिथिलेश आयोजन समिति को साधुवाद देने के साथ, इस विषय से सम्बंधित अपनी जानकारी को हर समय साझा करने को उपलब्ध रहूँगा, ऐसा मै प्रस्ताव करता हूँ.

जय हिन्द, जय भारत.



Mithilesh Kumar Singh
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