आलोचना को बनाएं प्रेरणा

हम जो भी करते है अपनी बुद्धि के अनुसार ठीक ही करते हैं, लेकिन हमने सचमुच अच्छा किया या नहीं, इसका ठीक-ठीक आकलन दूसरे लोग ही कर सकते हैं। हालांकि जब हमारे किसी कार्य पर लोगों की प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है तो हम बहुत दुखी होते हैं। कोई भी कार्य करते समय हम यह उम्मीद करते है कि लोग उसे सराहेगे। लेकिन, जब लोगों की प्रतिक्रिया उसके विपरीत होती है तो हमें बुरा लगता है। 

  आलोचना और टिप्पणी में फर्क 

आमतौर पर लोग आलोचना और टिप्पणी को एक ही समझ बैठते है। पर ऐसा है नहीं। आलोचना मनुष्य के व्यवहार की होती है। यह व्यक्ति की प्रवृलियों, कार्यो और परिस्थितियों आदि के पूरे अध्ययन के बाद की जाती है। इसके विपरीत टिप्पणी क्षणिक होती है। यह जीवन के विस्तृत अध्ययन से जुड़ी नहीं होती। आलोचना क्यों? लोग एक-दूसरे की आलोचना क्यों करते है? इसके अलग-अलग कारण है। व्यवहार में जब कोई व्यक्ति नए कार्य करने की सोचता है या करता है तो उसके ज्यादातर साथी नकारात्मक रुख अपनाते है। अगर आप लीक से हटकर कुछ नया कर रही है तो आपको सुनना ही पड़ेगा। हालांकि जब आप सफल हो जाती है तो यही आलोचना तारीफ में बदल जाती है। कुछ लोग आदतन आलोचक होते है। दूसरों की क्रियाओं पर नेगेटिव प्रतिक्रिया देते रहना उनकी प्रवृलि होती है। दरअसल ऐसे लोग खुद से ही असंतुष्ट होते है। कभी-कभी आलोचना व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण की जाती है। कुछ लोग वास्तव में सही आलोचक होते है। ऐसे लोग पूरी बारीकी से परिस्थितियों का अध्ययन करके ही कुछ कहते है। 

सुनकर एकदम न बदलें 

आलोचना से दुखी होकर खुद को एकदम से नहीं बदलना चाहिए। आलोचकों की बातों में आकर अगर आप बदलाव करती है तो यह आपके व्यक्तित्व की कमजोरी को दर्शाता है। हां, अच्छी तरह सोचकर अपने व्यक्तित्व में बदलाव लाना कोई बुराई नहीं है। आलोचना से घबराकर लक्ष्य से भटकना कतई उचित नहीं है। आप तन-मन से कार्य करे और जब सफलता मिले तो इसका श्रेय आलोचकों को दें और अपने कार्य में लगी रहे। यही वास्तव में आलोचना का सबसे सही जवाब है। 

  ठीक हो तो जरूर सुधार करे 

 ए, जिसने समय रहते आपकी गलती बताने में मदद की। सही आलोचना को जीवन में एक चुनौती की तरह लेना चाहिए और इस आधार पर बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए। जो झूठे अहम के कारण सही आलोचना के बाद भी बदलाव नहीं लाते उनके असफल होने की आशंका अधिक होती है। इसके विपरीत जब लगे कि आलोचना ठीक नहीं है तो उसे वैसे ही छोड़ दें जैसे टीवी में प्रोग्राम पसंद न आने पर हम चैनल बदल देते हैं। अगर आप सदा दूसरों की आलोचना पर ध्यान देती रहेगी तो कुछ नहीं कर सकतीं। जीवन में कई बार कटु आलोचना का शिकार होना पड़ता है। इसलिए अपनी आलोचना पर एक नजर जरूर डालें और आगे बढ़ती रहे।

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