चाय: भारतीयों की संस्‍कृति से जुड़ा है यह काला पानी

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नई दिल्ली के दरियागंज इलाके के मेन रोड पर बहुत ही करीने से सजी एक दुकान है. यह लगभग तीन दशक पुरानी है और इस पर चाय मिलती है. ऐसी-वैसी चाय नहीं बल्कि यह देश का पहला टी पार्लर है, जहां चाय बेचना कोई पेशा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति को पेश करना है. 
 यहां पहले चाय टेस्ट करवाई जाती है, उसके बाद आप चाहें तो उसे खरीदें और अच्छी न लगे तो आपकी मर्जी. आप की पसंद को 1981 में शुरू करने वाले इसके मास्टर टेस्टर संजय कपूर कहते हैं, ‘‘हमारा काम लोगों को अच्छी चाय पिलाना है. उन्हें सुकून के कुछ लम्हे गुजारने का मौका देना है. इसलिए उनके संतुष्ट होने पर ही हम उन्हें खरीदने के लिए कहते हैं.’’ वाकई ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है, जहां चाय पिलाने के मायने कुछ लम्हे फुरसत के गुजारना है तो भाग-दौड़ से खुद को ताजादम करना भी है. भारत दुनिया की चाय का एक-तिहाई उत्पादन करता है और ब्लैक टी का यह सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है.
 दार्जिलिंग की पहाडिय़ों और असम की वादियों में पैदा होने वाली चाय का कोई जवाब नहीं है. दार्जिलिंग की चाय अपने फ्लेवर और असम की चाय अपने कड़कपन के लिए पहचानी जाती है. टी बोर्ड ऑफ इंडिया के चेयरमैन एम.जी.वी.के. भानु कहते हैं, ‘‘भारत में चाय उत्पादन का 95 फीसदी असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल से आता है जबकि बाकी का 5 फीसदी त्रिपुरा, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, बिहार, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और मेघालय से आता है.’’ 

 यूं मिली हमें चाय चाय के इतिहास के साथ बड़ी ही दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है. बात चार हजार साल पुरानी है. चीन का एक बादशाह हुआ करता था, जिसका नाम शिन नोंग था. एक बार वह शिकार पर गया और थककर पेड़ के नीचे आराम कर रहा था. पास ही उसके लिए पानी उबल रहा था. तभी पास ही के पड़े की कुछ पत्तियां उसमें आ गिरीं. पानी उबला बादशाह ने पीया और उसकी सारी थकान दूर हो गई और वह अपने साथ जाते हुए उस पेड़ की कुछ पत्तियां ले गया. इस तरह एक ऐसे पेय पदार्थ ने हमारे जीवन में कदम रखा, जिसने हमें कुछ पल सुकून से बिताने और बतियाने के अलावा सेहतमंद होने की दिशा में बढ़ाने के भी दिए. खास यह कि आखिर वह क्या तत्व था जिसने बादशाह नोंग की सुस्ती दूर भगा दी तो कपूर बताते हैं, ‘‘चाय में थियानिन होता है. जिससे दिमाग में अलर्टनेस आती है और सुकून मिलता है. इससे ताजगी का एहसास होता है.’’

 ग्रीन टी या ब्लैक टी? भारत में ब्लैक टी लोग अधिक मात्रा में इस्तेमाल करते हैं जबकि चीन में ग्रीन टी पीने वालों की संख्या अधिक है. चाय तीन प्रकार की होती है और ये तीनों अपनी अवस्था पर निर्भर करती हैं. कपूर बताते हैं, ‘‘ग्रीन, ऊलोंग और ब्लैक टी. जीरो ऑक्सीडाइज्ड वाली पत्ती ग्रीन टी होती है, हाफ ऑक्सीडाइज्ड पत्ती ऊलोगं टी होती है जबकि फुल ऑक्सीडाइज्ड को ब्लैक टी कहते हैं.’’

 भारत में अकसर ब्लैक टी को दूध और चीनी के साथ लिया जाता है जबकि ग्रीन टी में इनका बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं होता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि चाय में ज्यादा दूध डालने से बचना चाहिए क्योंकि इससे चाय के अधिकतर औषधीय तत्व मर जाते हैं. इसलिए दिन में एक-दो कप बिना चीनी और दूध के भी लेने चाहिए. 
असम की टी-रिसर्च एसोसिएशन के वैज्ञानिक डॉ. देवजीत बोरठाकुर कहते हैं, ‘‘शरीर के लिए फायदेमंद एंटी ऑक्सिडेंट थियाफ्लेविन और थियारबिगिन्स चाय में मौजूद मिल्क प्रोटीन के साथ जटिल संरचनाएं बना लेते हैं. यही वजह है कि दूध की चाय पीने वालों को न तो इनका फायदा मिलता है और न ही मिल्क प्रोटीन का फायदा मिलता है. इसलिए बगैर दूध की चाय लेना ही सेहत के लिए बेहतर होता है.’’ 
 एंटी ऑक्सिडेंट थियाफ्लेविन और थियारबिगिन्स मोटापे के साथ-साथ कोलेस्ट्रॉल कम करने में भी सहायक होते हैं. जहां तक सवाल ब्लैक और ग्रीन टी का है तो यह जायके की बात है कि कौन-सी चाय पी जाए. विशेषज्ञों के मुताबिक इनसे होने वाले फायदों में सिर्फ उन्नीस-बीस का अंतर हो सकता है, इससे ज्यादा नहीं है. स्वाद और सेहत भरा जायका भारत में यह मिथक है कि चाय पीने से रंग काला होता है. विशेषज्ञ इस मिथक को सिरे से खारिज कर देते हैं. उनका कहना है कि चाय में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट त्वचा के लिए फायदेमंद होते हैं. वैज्ञानिकों की मानें तो एक प्याला चाय किसी अमृत से कम नहीं है. 
चीन में 1,000 महिलाओं पर हुए एक शोध में साबित हुआ है कि महिलाओं के लिए गंभीर खतरा बने गर्भाशय कैंसर का जोखिम चाय पीने से कम हो जाता है. इस शोध का नेतृत्व करने वाले कर्टिन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर एंडी ली कहते हैं, ‘‘आप कितनी मात्रा में और कितनी बार चाय पीते हैं यह भी मायने रखता है. एक दिन में आप जितने ज्यादा कप चाय पीएंगे नतीजा उतना ही अच्छा होगा (यानी गर्भाशय के कैंसर का जोखिम उतना ही कम होगा).’’ डायबिटीज में भी चाय फायदेमंद होती है. जर्मनी की हेनरिक हेन यूनिवर्सिटी के लेबनिज सेंटर फॉर डायबिटीज रिसर्च में हुए एक शोध के मुताबिक मधुमेह से बचने के लिए दिनभर में कम-से-कम चार कप चाय पीनी चाहिए. अब तक चाय पर हुए ज्यादातर शोध ग्रीन-टी पर केंद्रित थे. 
लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया है कि ब्लैक-टी भी कम फायदेमंद नहीं होती. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक शोध बताता है कि ब्लैक-टी के ज्यादा सेवन का संबंध मोटापा कम होने से है. इसके पीछे अनुसंधानकर्ताओं का यह सोचना है कि ग्रीन-टी के ब्लैक-टी में बदलने की प्रक्रिया जिसे फर्मंटेशन कहते हैं, के दौरान सेहत के लिए फायदेमंद ‘फ्लेवेनॉइड’ विकसित हो जाते हैं. भारत के टी-बोर्ड का भी मानना है कि ग्रीन-टी के मुकाबले ब्लैक-टी ज्यादा ऑक्सिडाइज्ड होती है. बेशक बहस कोई भी रहे लेकिन इस बात को कोई झुठला नहीं सकता कि ऑफिस हो या घर, सुकून के कुछ लम्हे गुजारने में अकसर हमारी साथी चाय ही होती है.















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