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Thursday, 13 July 2017

जिय हो बिहार के लालू - Lalu Yadav Scams

01:48


प्राचीन काल में अपनी सम्पन्नता, शौर्यता और शिक्षा के लिए प्रसिद्ध बिहार की अगर आज चर्चा करें तो कभी विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहा यह प्रदेश, वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के सबसे पिछड़े राज्यों  में से एक गिना जाता है, कभी नालंदा विश्वविद्यालय जहाँ देश -विदेश के लोग शिक्षा लेने आते थे और आज अपने विषय का नाम जाने बगैर बच्चे टॉप कर जाते हैं. जैन और बौद्ध धर्मों का उद्भव स्थल रहा बिहार आज केवल भ्रस्टाचार, घोटाला, अराजकता के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है. और इसका सारा श्रेय अगर किसी को जाता है तो निःसंदेह  बिहार के सुप्रसिद्ध नेता लालू यादव को. जी हाँ लालू यादव एवं उनकी पत्नी ने बिहार में लगभग 15 सालों तक राज्य किया है. और सब जानते हैं कि इस  दौरान बिहार राज्य की स्थिती बिगड़ती चली गई, चोरी, रेप, किडनैपिंग की घटनाों को खूब बढ़ावा मिला. एक बार फिर लालू यादव चर्चा में हैं इस बार सीबीआई ने उनके 12 ठिकानों पर एक साथ छापे मारे हैं और  420 और 120-बी का मामला दर्ज किया गया है.

पटना विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने वाले लालू यादव को राजनीति में खासी दिलचस्पी थी, 80   के दशक में लालू यादव एक उभरते हुए नेता थे जिनकी खास शैली और बोलने का अंदाज लोगों को खूब भा रहा था . और इसी का नतीजा था कि मात्र 29 साल की उम्र में लालू यादव लोकसभा के सदस्य बने और राजनीति में अपना सिक्का जमाना शुरू कर दिए. लालू  यादव की तीक्ष्ण  दृष्टि बिहार की आबादी में 11% की हिस्सेदारी रखने वाले यादव वोट बैंक पर थी और उन्होंने अपने आपको लोअर कास्ट और यादवों के नेता के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया. जिसका सुखद परिणाम निकला और लालू जनता पार्टी से अलग हो कर खुद की पार्टी "राष्ट्रिय जनता दल" का गठन कर बिहार की राजनीति में  स्थापित हो गए. मगर बिहार की जनता का ये दुर्भाग्य था कि जिस व्यक्ति पर उसने भरोसा किया वो इतना बड़ा घोटालेबाज निकलेगा. जी हाँ जब लालू मुख्यमंत्री थे तब  बिहार सरकार के ख़ज़ाने से ग़लत ढंग से पैसे निकालने और  कई वर्षों में करोड़ों की रक़म का घपला  पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों के द्वारा  राजनीतिक मिली-भगत के साथ की गयी. शुरू शुरू में तो ये मामला एक-दो करोड़ रुपए का लगा मगर बाद में  900 करोड़ रुपए तक जा पहुंचा. और कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि घपला कितनी रक़म का है क्योंकि यह वर्षों से होता रहा है और बिहार में हिसाब रखने में भी भारी गड़बड़ियां हुई हैं.
जैसा की हम सब जानते हैं 1997 में लालू यादव पर चारा घोटाले का आरोप लगा और उन्हें मुख्यमंत्री पद से स्तीफा तक देना पड़ा और वो जेल भी गए. लेकिन हमारे देश में जेल व्यवस्था से कौन परिचित नहीं है लोग यहाँ जेल में बैठ कर भी शासन कर सकते हैं और यही हुआ लालू यादव के मामले में भी.

लालू के जेल जाने के दौरान उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने बिहार की राजनीति की बागडोर अपने हांथों में लिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन रहीं. भले ही लालू जेल में थे लेकिन राबड़ी देवी के माध्यम से सत्ता का संचालन जारी रखे हुए थे और इसके साथ यही भ्रष्टाचार, घोटालों और अनैतिक कार्यों का भी. अगर हम कहें कि लालू यादव के वजह से बिहार अपराधों का गए गढ़ बन गया तो ये गलत नहीं होगा. कौन नहीं जनता कि हत्या, डकैती, रेप जैसे सैकड़ों अपराधों का दोषी मोहम्मद शहाबुद्दीन को लालू का खास संरक्षण प्राप्त है. यहाँ तक कि जेल में भी शाहबुद्दीन कि सुविधाओं का ख्याल रखा जाता है है वो भी लालू यादव की मेहरबानी से. खैर ये जनता है कुर्सी पर बैठना जानती है तो उतारना भी जानती है और इसका एहसास अच्छे से होगा लालू यादव को. लगभग 10 सालों तक सत्ता में वापसी को तड़पते रहे लालू को जनता ने एक बार फिर मौका दिया है बिहार की राजनीति में सक्रीय भूमिका निभाने का लेकिन इस बार फिर उनका नाम घोटालों और बेनामी सम्पति के लिए उछल रहा है, और इस बार न केवल  लालू बल्कि उनका पूरा परिवार इस लपेटे में है.  किसी ने सही कहा है जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे. लालू यादव ने अपने दोनों  ही बेटों की राजनीति में लांचिंग बड़े दी धूमधाम से की जहां छोटा बेटा मुख्यमंत्री तो बड़ा बेटा स्वास्थ्यमंत्री के पद पर आसीन हो गया. 

मगर लालू यादव के पूर्व में किये गए घोटाले उनके बेटों के वर्तमान को अधर में डाल रहे हैं, अगर लालू परिवार पर आरोप अगर सिद्ध हो जाते हैं तो शायद ही दो बारा  मौका मिले बिहार की जनता की सेवा का. इसी लिए बुजुर्गों ने कहा है कि उतना ही खाओ जितना पचा सको. जिस राज्य की जनता ने आपको मशीहा समझा आपने उन्हें ही नर्क वाली स्थिति में ला दिया. लालू यादव का तो सक्रीय राजनीति से लगभग वास्ता ख़त्म ही हो गया है मगर उनके बच्चों की तो अभी शुरुआत हुयी है ऐसे में अभी से घोटालों और घपलों में नाम आने शुरू हुए तो वो दिन दूर नहीं जब बिहार  की राजनीति से पुनः वनवास हो जाये. इसलिए यादव फैमिली को यह समझना आवश्यक है की पुराने दिन अब नहीं रहे जहां चारों ओर लूट - खसोट मची थी और कोई बोलने वाला नहीं था. अब समय बदल गया है, इसलिए राजनीति को सेवा की भावना से की जाये न की पारिवारिक व्यवसाय समझ कर मुनाफा कमाने की निति अपनायी जाये. 

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विंध्यवासिनी सिंह

Keywords:  Lalu Yadav Scams, Cbi, Bihar, Lalu yadav News 

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Wednesday, 7 June 2017

सच्चे गोरक्षकों को सलाम - Gorakshak, Hindi Article

00:55
गोरक्षा हमारे देश में कोई आज शुरू हुई परंपरा नहीं है, बल्कि हज़ारों हज़ार साल से यह चली आ रही है. अन्य पशुओं से अलग अगर गाय को माता का दर्जा दिया गया है तो यह यूं ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे तमाम व्यावहारिक कारण रहे हैं. हालाँकि, भारतीय सभ्यता में न केवल गाय को, बल्कि हर प्रकार के पशु, पक्षी और जानवरों का अपना महत्त्व बताया गया है. अब सांप को ही ले लीजिये, जिसकी नाग-पंचमी पर पूजा होती है या फिर गणेश जी की सवारी के रूप में चूहे की महिमा ले लीजिये.
मतलब साफ़ है, हम प्रकृति-पूजक और प्रकृति द्वारा दिए गए प्रत्येक उपहार के प्रति कृतज्ञ रहे हैं. शायद इसीलिए जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने पेरिस समझौते से अपने देश को अलग करते समय भारत पर प्रदूषण फैलाने सम्बंधित आरोप लगाए तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीना ठोंकते हुए कहा कि "हम आज से नहीं, बल्कि पांच हज़ार साल से भी अधिक समय से प्रकृति का ध्यान रख रहे हैं." वस्तुतः यह हमारे संस्कार में घुल गया है, जो किसी हाल में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ट्रांसफर होता रहता है. ऐसे में किसी अन्य को हमें यह सिखाने की कतई आवश्यकता नहीं है कि प्रकृति और प्राकृतिक वस्तुओं के साथ जीवों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए.
यही बात जब गाय को लेकर कही जाती है तो दुनिया को आश्चर्य होता है और कई छद्म बुद्धिजीवी हमें पिछड़ेपन का शिकार बताते हैं. पर भाई, हम तो व्यावहारिक बात करते हैं. गाय और हमारी कृषि प्रधान भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना गहरा सम्बन्ध रहा है, यह कोई बताने वाली बात है क्या? गाय का न केवल दूध, बल्कि उसका गोबर-मूत्र और उसके बछड़े कृषि कार्य में किस तरह से काम आते रहे हैं, इस तथ्य से हर कोई भली भांति परिचित है. रही बात दूसरे पशुओं से उसकी तुलना की तो तमाम वैज्ञानिक शोधों में यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि गाय का दूध बच्चों, बूढ़ों और जवानों के लिए सर्वोत्तम रहा है. इसी गाय के सहारे आज आधुनिक युग में भी बड़े बड़े कारोबार खड़े किये जा रहे हैं. अब इससे अधिक गाय की महिमा बताने की भला क्या आवश्यकता है.
हालाँकि, दुःख की बात यह है कि एक ओर गायें जहाँ काटी जा रही हैं और सरकार उस पर कोई ठोस कानून पारित नहीं कर पा रही है, वहीं तमाम ऐसे असामाजिक तत्व भी समाज में फ़ैल गए हैं जो गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करते नज़र आते हैं. ऐसे कार्य उन संगठनों को भी बदनाम करते हैं, जो सच्चे मन से गोरक्षा करते हैं. बहुचर्चित अख़लाक़ हत्याकांड के बाद हमारे पीएम नरेंद्र मोदी ने भी यह बात स्वीकार किया था कि 80 फीसदी से अधिक गोरक्षक फर्जी हैं. जाहिर है, इन पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है और सच्चे गोरक्षकों को सम्मानित किये जाने की आवश्यकता है. सच्चे गोरक्षकों के तमाम उदाहरण आपको आसानी से मिल जायेंगे और इन्हें सलाम किया जाना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के कारण गोवंश में बृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप हमारे चरमरा रही कृषि व्यवस्था और समाज के वंचित तबके को इससे सहारा मिलता है.

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Friday, 5 May 2017

दरकता 'आप' से विश्वास- आत्ममुग्धता से बाहर आएं केजरीवाल - Aam Admi Party After MCD Election

23:48


दरकता 'आप' से विश्वास- आत्ममुग्धता से बाहर आएं केजरीवाल - Aam Admi Party After MCD Election

कहा जाता है कि ऊंचाई की तरफ चढ़ने वालों को बराबर ताकत  के साथ आगे बढ़ना पड़ता है क्योंकि थोड़ी भी ढील हुयी तो इंसान दुगनी गति से नीचे की तरफ गिरता है. और आज कल ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है दिल्ली की सर्वाधिक चर्चित राजनीतिक पार्टी 'आम आदमी पार्टी' में. जी हाँ 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से जीत के घोड़े पर सवार आम आदमी पार्टी के लिए हालिया चुनाव काफी दर्दनाक साबित हुए हैं. तब दर्द और बढ़ गया जब अपने ही गढ़ में नगर निगम के चुनाव में पार्टी धाराशायी हो गयी. ये कहना गलत नहीं होगा कि 'आप' के लिए निकाय चुनाव को जितने का मौका भी था और दस्तूर भी. क्योंकि जिस तरह दिल्ली कि जनता ने 70 में से 67 सीटों को सौंप कर अरविन्द केजरीवाल पर विश्वास जताया था और लगातार mcd में ख़राब प्रदर्शन से बीजेपी के प्रति लोगों में नाराजगी थी तो उस लिहाज से दिल्ली में केजरीवाल की हार अच्छे संकेत नहीं हैं. बावजूद इसके कि अपनी ऐसी स्थिति कि समीक्षा की जाये केजरीवाल के रणबाँकुरे आपस में ही लड़ बैठे. अभी हाल ही में पार्टी के खासमखास नेता और केजरीवाल के बेहद करीबी कुमार विश्वास को लेकर हंगामा मचा हुआ है. ओखला से विधायक अमानतुल्ला खान द्वारा  सीधा- सीधा भाजपा से मिला होने का आरोप लगाए जाने के बाद एक बार के लिए कुमार विश्वास का पार्टी छोड़ने का निर्णय तक सामने आया था. मगर समय रहते केजरीवाल और मनीष शिसोदिया ने स्थिति को संभालते हुए अमनतुल्ला खान को पार्ट से सस्पेंड किया और विश्वास को राजस्थान का प्रभारी बनाकर पार्टी में रोक लिया. फ़िलहाल के लिए तो ये मामला टल गया मगर कब तक ऐसे विवादों को टालते रहेंगे केजरीवाल. क्योंकि लगातार हो रही शिकस्त की  वजह से पार्टी में दबे सुर में आवाज उठने लगी है हार की जिम्मेदारी के सन्दर्भ में. लेकिन केजरीवाल अभी भी इस विषय पर अपनी मनमानी निति अपनाये हुए हैं और हार का जिम्मा कभी ईवीएम तो कभी जनता के ऊपर थोप रहे हैं. 

एक और बात जो इस पुरे प्रकरण से निकल आयी है वो ये है कि केजरीवाल के खास कहे जाने वाले कुमार ने खुलेयाम ये आरोप लगाया है कि  'अरविंद केजरीवाल को चाटुकारों की मंडली घेरे है'. आपको याद होगा कुछ समय पूर्व योगेंद्र यादव ने भी ऐसे ही विचार रखे थे केजरीवाल के लिए जिसकी सजा उन्हें पार्टी से निकल कर दी गयी. कुछ दिन पूर्व ही विधायक 'वेद प्रकाश' ने भी यह कहते हुए पार्टी से स्तीफा दे कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं. वहीँ विधायक ने इल्जाम लगाया कि अरविंद केजरीवाल को कुछ लोगों ने घेर ‌ल‌िया है और वो सिर्फ उन्ही कि बात सुनते हैं उन्हें पता ही नहीं  की पार्टी में क्या हो रहा है. अब जब बहुत सारे लोग एक ही बात को बोल रहे हैं तो इस बात को एक सिरे कैसे नाकारा जा सकता है. और ऊपर से खुद केजरीवाल ने अपने बदलते रवैये से अक्सर अपने तानाशाही होने का परिचय भी कराया है. सत्ता में आने से पहले जो काम करने का जज्बा और जूनून था वो गायब है और है तो सिर्फ और सिर्फ अपनी महिमा मंडान.
दरकता 'आप' से विश्वास- आत्ममुग्धता से बाहर आएं केजरीवाल - Aam Admi Party After MCD Election 

हालाँकि  दिल्ली की जनता ने तो  2015 के विधानसभा चुनाव में  केजरीवाल के नए वादे फ्री वॉइ- फाई और मुफ्त बिजली पानी के नारे के साथ  सत्ता की चाबी सौंप दी है . खास बात ये थी कि दूसरी बार केजरीवाल को सरकार बनाने के लिए किसी की मदत की भी जरुरत नहीं थी. लेकिन इतनी बड़ी सफलता को केजरीवाल सिर्फ अपनी सफलता मान बैठे है, उन्हें लगता है कि लोग उनके चेहरे को देख कर वोट देते हैं. वैसे अभी -अभी संपन्न हुए गोवा और पंजाब के चुनाव के नतीजे  जितने निराशाजनक निकले उससे सबक लेने की  बजाय केजरीवाल अभी भी और राजनीतिक पार्टियों की तरह ही परम्परागत राजनीति करने में ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं. जैसा की सब जानते हैं पंजाब में केवल 20 सीटें मिलीं वहीँ पार्टी ने गोवा में खाता भी नहीं खोला. दिल्ली में मिली सफलता को दुहराने के उद्देश्य से आम आदमी पार्टी ने इन दोनों राज्यों में खूब हाँथ -पांव मारे लेकिन जनता इतनी बेवकूफ नहीं है लोगों को पता है कि दिल्ली वालों के दिल खोल कर वोट देने के बावजूद केजरीवाल पुरे टाइम प्रधानमंत्री और दिल्ली के गवर्नर के खिलाफ दोषारोपण किये हैं या आपराधिक मामलों में अपने विधायकों का बचाव करते रहे हैं. लोगो वो दिन कैसे भूल सकते हैं जब केजरीवाल कहते थे कि 'वो राजनीति की गन्दगी को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरे हैं'. गन्दगी साफ करना तो दूर दिल्ली में इन्हीके विधायकों ने गंध मचा रखा है सोमनाथ भारती से लेकर संदीप कुमार, दिनेश मोहनिया, या फिर धर्मेन्द्र सिंह कोली हो किसी न किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार के मामले में फंसे और केजरीवाल उनके बचाव में उतरे.  
दरकता 'आप' से विश्वास- आत्ममुग्धता से बाहर आएं केजरीवाल - Aam Admi Party After MCD Election 

अगर ऐसा ही था तो पुरानी पार्टियां क्या बुरी थीं, 'आप' में ऐसा क्या खास है. केजरीवाल को नहीं भूलना चाहिए कि उनकी पार्टी की असली पहचान क्या है जनता ने उन्हें रातों -रात सिर आँखों पर क्यों बैठाया है. महज दो- चार साल में ही पार्टी अपना वजूद खो देगी ऐसा अनुमान लगाना कठिन था, लेकिन ताजा मामलों से तो ऐसा ही लग रहा है. 'आम आदमी पार्टी' सिर्फ नाम की आम है लेकिन गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस पार्टी में वही लोग हैं जो अन्य पार्टयों में नहीं जा सके. और ये लोग वही राजनीति कर रहे हैं जो दूसरी पार्टियां करती है और जिसकी निंदा अक्सर केजरीवाल करते हैं. खैर अब जब चारों तरफ हाँथ -पैर मारने के बाद केजरीवाल को अपनी लोकप्रियता का अंदाजा लग चूका है तो उम्मीद करते हैं कि उनको दिल्ली वालों की क़द्र समझ में आनी चाहिए. और अभी भी बचे हुए तीन सालों में इन्होंने गंभीरता पूर्वक काम नहीं किया तो निःसंदेह आने वाला विधानसभा  चुनाव केजरीवाल और इनकी पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर देगा. और तब वाकई दुःख की बात होगी जब देश को तीसरे विकल्प का सपना दिखा कर आम आदमी पार्टी यूँ हासिये पर आ जायेगी. एक बात और केजरीवाल को समझना चाहिए कि आपकी चापलूसी करने वाले कभी भी आपको सही रास्ता नहीं दिखाएंगे, इसलिए कुछ अप्रिय बोलने वालों को भी साथ रखें जिससे सही -गलत का फर्क समझा जा सके. वैसे भी कहा गया है कि ... "निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय"

- विंध्यवासिनी सिंह  

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Sunday, 30 April 2017

दिल्ली एमसीडी - छवि के गेम में मोदी अभी भी सबसे आगे- Delhi MCD Election

00:52



लम्बे समय से दिल्ली नगर निगम के चुनाव में दो ही पार्टियों का दबदबा था बीजेपी और कांग्रेस. लेकिन 2013 से आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से धमाकेदार एंट्री की दोनों पुरानी पार्टियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा था. हालाँकि 'आप' के उभार का सर्वाधिक खामियाजा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ा क्योंकि कांग्रेस के वोटर्स 'आप' के सपोर्टर्स बन गए थे. दिल्ली की जनता ने जिस तरीके का विस्वास दिखाया अरविन्द केजरीवाल को कि वो दिल्ली सहित भारत विजय की यात्रा पर निकल पड़े और रातोंरात राष्ट्रीय नेता का टैग अपने नाम करने की छटपटाहट इनके चेहरे से साफ देखी जा सकती थी. हालाँकि पंजाब और गोवा विधानसभा के नतीजों ने इन्हे वापस दिल्ली ला पटका और कभी विधानसभा के 70 में से 67 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी के लिए नगर निगम का चुनाव प्रतिष्ठा का विषय बन गया. और इसी का दबाव था की आप के सभी बड़े नेता विकास की बात छोड़ बीजेपी और कांग्रेस की कमियाँ निकालने में लग गए. और ऐलान भी कर दिया कि हमारी हर का कारन ईवीएम मशीन होगी. जैसे ये मान चुके थे कि इन्हे चुनाव हारना है. वहीँ लगातार हर का सामना कर रही कांग्रेस को भी उम्मीद थी कि इस बार का चुनाव उसे राहत देगा, मगर कांग्रेस इस बार तीसरे नंबर की पार्टी रही . वहीँ लगातार 10 सालों से दिल्ली एमसीडी पर शासन करने और लोगों की जबरदस्त नाराजगी बावजूद भी बीजेपी ना केवल नंबर एक रही बल्कि अप्रत्याशित जीत भी हाशिल की. 

एक नजर चुनाव के विभिन्न बिंदुओं पर . 

केजरीवाल पर से लोगों का विश्वास कम हुआ - जब केजरीवाल सत्ता संभाले थे तो लोगों में एक तरह का विश्वास था कि दिल्ली की काया पलटने वाली है. केजरीवाल ने भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी, शीला दीक्षित से लेकर बीजेपी के तमाम नेताओं की ऐसी - ऐसी फाईले खोज निकाले की दिल्ली की जनता तो जैसे बौरा गयी की अब बस यही बंदा है जो दिल्ली में विकास का कार्य कर सकता है. अपने लोकलुभावन वादों के चलते आम आदमी पार्टी सत्ता में तो आ गयी  लेकिन दो साल पूरे होने के बावजूद पार्टी उन वादों को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाई. अपने द्वारा किये तमाम वादे जैसे महिला सुरक्षा के लिए पूरी दिल्ली में सीसीटीवी लगवाना और राष्ट्रीय राजधानी को वाईफाई जोन में तब्दील कर देना, इसके अलावा दिल्ली में नए स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोलना, संविदा कर्मचारियों को स्थायी करना जैसे मुद्दों पर आम आदमी पार्टी बचती नजर आयी. वहीँ बजाय  कुछ ठोस काम करने के वो पुरे टाइम किसी न किसी से उलझते रहे. उनको हमेशा से ही गिला था कि मोदी सरकार उनको काम नहीं करने देती. लेकिन दिल्ली की जनता इतनी बेवकूफ नहीं है ये सब समझते हैं कि अगर आपको केंद्र से ही काम निकलवाना है तो आप का व्यवहार कैसा होना चाहिए केंद्र के प्रति. और इस मामले में केजरीवाल कहीं भी खरे नहीं उतारते. वहीँ सभी नेताओं को भ्रष्टाचारी कहने वाले केजरीवाल अपने विवादित विधायकों के मामले चुप्पी साध गए. और एक-  एक करके अपने अपने विश्वासपात्र और कर्मठ सहयोगियों को अपने से अलग करते गए. जीत की खुमारी में आम आदमी पार्टी के विधायक से लेकर कार्यकर्त्ता तक ने मर्यादा तोडा. मजाल की कोई आम आदमी पार्टी पर सवाल उठाये, इसके नेता तुरंत आक्रामक तरीके से पलटवार करने से नहीं चूकते. और इनका यही आचरण इनको जनता से दूर ले गया  विपक्ष का काम आसान कर दिया. इसका नतीजा ये निकला कि जिस तेजी से पार्टी का ग्राफ चढ़ा था उतनी ही तेजी से निचे भी गिरने लगा.  और नतीजा mcd चुनाव के रूप में आप सब के सामने है.
  
मोदी की छवि हावी रही- हालाँकि पिछले 10 सालों से दिल्ली mcd पर बीजेपी का ही कब्ज़ा रहा है और दिल्ली की जनता इनके कामों से खुश नहीं थी. ऐसे में बीजेपी ने एक बार फिर मुद्दों को अहमियत देने के बजाय नरेंद्र मोदी के फेस को आगे रख चुनाव की रणनीति बनायीं और उसमे कामयाब भी हुयी. लोगों के अंदर नरेंद्र मोदी की साफ -सुथरी इमेज वाली भावना है और इस बात का बखूबी इस्तेमाल किया बीजेपी ने. या आप ये भी कह सकते हैं कि दिल्ली कि जनता ने केजरीवाल के बदले मोदी को चुनना बेहतर समझा. लगातार प्रधानमंत्री को निशाना बना कर केजरीवाल वैसे ही लोगों के दिलों में उनके लिए सॉफ्ट कार्नर बनाने का काम कर दिया था. और इस बात को बीजेपी ने भुनाया भी और एक तरफ से ये साबित करने में कामयाब रहे कि केजरीवाल अपने राष्ट्रिय नेता बनने के रास्ते का रोड़ा मानते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को. और इस तरह केजरीवाल अपने ही गढ़ में ढेर हो गए. वहीँ एमसीडी चुनाव में बीजेपी ने इस बार किसी भी पुराने पार्षद को टिकट नहीं देने की नीति को आजमाया जो की कारगर साबित हुआ. चुकी पुराने पार्षदों के काम से जनता नाराज थी नए पार्षदों के आ जाने से बीजेपी के पिछले कामों कि चर्चा ही नहीं हुयी और नए पार्षद मोदी के  सिपाही के रूप में बखूबी प्रस्तुत हुए.

पूर्वांचल फैक्टर और मनोज तिवारी- बीजेपी ये अच्छे से जानती थी कि दिल्ली में पूर्वांचली अच्छी -खासी संख्या में हैं और उन्हें लुभाने के लिए भोजपुरी फिल्मों के नायक और जाने -माने भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी गयी. बीजेपी का ये दांव भी सटीक लगा जहाँ मनोज का जलवा उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान दिखा वहीँ दिल्ली में भी पूर्वांचल के लोगों को खींचने में कामयाब रहे. लगभग 30 लाख की संख्या और दिल्ली की जनसँख्या के 10 प्रतिशत पूर्वांचली अब किंगमेकर की भूमिका में आ गए हैं. इसलिए इतने बड़े वोट बैंक को ध्यान में न रखना बेवकूफी ही होगी. 

कांग्रेस विश्वास दिलाने में नाकाम रही- लगातार मिलती हार का सामना कर रही कांग्रेस को एक बार फिर निराशा हाँथ लगी. जो कांग्रेस लगातार 15 सालों तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज रही आज उसी कांग्रेस के लिए दिल्ली में अस्तित्व बचाने जैसे हालात हो गए हैं. हालाँकि 'आप' के उभार की मुख्य वजह कांग्रेस ही रही है. कांग्रेस से मोह भंग होने से इसके वोटर्स आप की तरफ झुके. mcd  चुनाव में कांग्रेस के लिए बड़ा झटका तब लगा जब 'अरविंदर सिंह लवली' ने कांग्रेस का दमन छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए वहीँ महिला मोर्चा की अध्यक्ष बरखा सिंह ने भी कांग्रेस से किनारा कर लिया. सबसे बड़ी बात एक बार फिर प्रदेश अध्यक्ष 'अजय माकन' के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. हालाँकि उन्होंने अपने पद से इस्तीफे की बात कही है मगर देखना दिलचस्प होगा की इस्तीफे का कितना असर होता है और कांग्रेस की हालात कितनी सुधरती है.  

अब जब बीजेपी एक बार नगर निगम की कमान अपने हांथों में ले चुकी है तो उम्मीद करते हैं कि पिछले 10 सालों के गिले सीकवें दूर करेगी और बेहतर परफार्म करके दिखयेगी. वहीँ केजरीवाल अनाप -सनाप बोलने से बाज आएं और दिल्ली वालों के लिए हमेशा तीसरे विकल्प के रूप में अपनी मौजदगी बनाये रखे. तो कांग्रेस फिर आत्ममंथन करे.

- विंध्यवासिनी सिंह 

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Friday, 21 April 2017

महापुरुषों के नाम पर अवकाश की प्रासंगिकता- Holidays In Up

05:06


लगातार कार्य दिवस के बाद जब छुट्टी वाला दिन आता है तो किसे अच्छा नहीं लगता? लोग बड़ी बेसब्री से इंतजार भी करते हैं इन छुट्टिओं का. लेकिन उत्तर प्रदेश में लोगों को छुट्टियों का इंतजार नहीं करना पड़ता है, खासकर सरकारी लोगों को. वैसे तो पूरे भारत में राष्ट्रीय और धार्मिक आधार पर कई सारे अवकाश पहले ही रहते हैं. साथ ही हर प्रदेश अपनी सुविधाओं और संरचना के हिसाब से अलग से अवकाश भी घोषित किये हुए हैं. मगर इस लिस्ट में सबसे आगे है उत्तरप्रदेश, जहाँ सबसे अधिक सरकारी अवकाश घोषित हैं, क्योंकि यहाँ जातीय और धार्मिक  राजनीतिक समीकरण को साधने के लिए महापुरुषों के नाम पर सरकारी अवकाश की घोषणाएं, कुछ कुछ रेवड़ियां बांटने की तरह की गयी हैं. 

इस सन्दर्भ में बात करें तो, मुख्यमंत्री योगी ने जब से कुर्सी संभाली है उनकी पैनी नज़र कई बारीक़ चीजों पर जा रही है. शायद सीएम योगी को आभास हो गया है कि जब तक छोटी -छोटी चीजों को दुरुस्त नहीं किया जायेगा, तब तक उत्तर प्रदेश की हालत सुधरने वाली नहीं है. इसी के अंतर्गत यूपी में होने वाली बेहिसाब सरकारी छुट्टियों पर कैंची चलाने की बात भी सामने आयी है. 
बीती अम्बेडकर जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री ने एक कार्यक्रम में कहा कि "यहाँ बच्चों को ये तक नहीं पता कि आज छुट्टी क्यों हैं और ऐसा इसलिए कि उन्हें महापुरुषों के जीवन से अवगत ही नहीं कराया जाता." ये बिलकुल सत्य है अब जब किसी भी महापुरुष के जयंती पर अवकाश रहेगा तो भला बच्चों को कैसे पता चलेगा इन महापुरुषों के बारे में? इसलिए ये बिलकुल सही बात है कि ऐसी छुट्टी की परंपरा बंद होनी चाहिए और ऐसे मौकों पर स्कूलों में एक-दो घंटे का विशेष सत्र आयोजित कर संबंधित महापुरुष के बारे में बच्चों को जानकारी दी जानी चाहिए. 
अगर गौर करें तो बात सिर्फ स्कूली बच्चों के अवकाश का ही नहीं है, बल्कि सारा का सारा सरकारी कामकाज भी प्रभवित होता है, जब इन अवकाशों की वजह से सरकारी डिपार्टमेंट बंद होते हैं. चूंकि, सरकारी विभागों से ही जुड़े होते हैं प्राइवेट विभाग भी, तो जाहिर तौर पर उन पर भी अप्रत्यक्ष रूप से ही सही असर तो पड़ता ही है.

क्या हैं छुट्टियों के आंकड़े
अगर बात उत्तरप्रदेश की हो, तो यहाँ 146 दिनों का सरकारी अवकाश रहता है और अगर  इसमें कर्मचारियों को मिलने वाले 15 अर्न्ड लीव और 14 कैजुअल लीव शामिल करें तो करीब 175 दिन की छुट्टी होती है. इस तरह लगभग 1 साल में 6 महीनों का अवकाश. कितना अजीब है ये सुनने में ही? जो उत्तर प्रदेश अपनी बदहाली और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता है, वहां के सरकारी कर्मचारियों को साल में 6 महीनों की छुट्टियां मिलती हैं? ध्यान देने वाली बात ये है कि यहाँ प्रत्येक जाति को ध्यान में रखकर कुछ छुट्टिओं का विशेष प्रबंधन किया गया है. अब देखिये, ब्राह्मणों के लिए परशुराम जयंती तो क्षत्रियो के लिए चंद्रशेखर जयंती, महाराणा प्रताप जयंती. इतना ही नहीं जननायक कर्पूरी ठाकुर जयंती, महर्षि कश्यप एवं महाराज गुह्य जयंती, सरदार वल्लभ भाई पटेल जयंती, ऊदा देवी शहीद दिवस जैसे अवसरों पर छुट्टी कर पिछड़े वर्ग को साधने का प्रयास तो वाल्मीकि जयंती, संत रविदास जयंती, अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस, डॉ़ अम्बेडकर जयंती के द्वारा दलितों को खुश करने की कोशिश की गयी है. 

इसी कड़ी में, चौधरी चरण सिंह जयंती और चेटीचंद के द्वारा सिंधी और वैश्य समाज में पैठ बनाने का प्रयास भी किया गया है. इतना ही नहीं मुस्लिम लोगों के लिए हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, अजमेरी गरीब नवाज का उर्स आदि अवसरों पर भी सरकारी अवकाश की घोषणा की गयी है. 

वहीं भारत के दूसरे राज्यों की बात करें तो गोवा, तमिलनाडु, असम, कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों को छोड़ कर बाकि सारे राज्यों में हिन्दुओं के सभी प्रचलित त्यौहार के लिए अवकाश रहता है, तो भिन्न प्रदेशों की सरकारें भी छुट्टियों के मामले में कुछ कम नहीं हैं. 

गौर करने वाली बात ये है कि जहाँ एक तरफ बेतहाशा छुट्टियों की वजह से जहाँ स्कूल अपने 220 दिनों के शैक्षणिक सत्र को पूरा नहीं कर पाते और बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है वहीं सरकारी कार्यालयों में अवकाश के चलते काम अधूरे रह जाते हैं. एक तो वैसे ही सरकारी कर्मचारी 'तेज' कार्य करने के लिए विश्व विख्यात हैं, ऊपर से यह छुट्टियां! अब चाहे उत्तर प्रदेश हो या देश का कोई भी राज्य हो सरकारी तंत्र के फिसड्डी होने का हाल लगभग एक समान है. ऐसे में इतनी भारी मात्रा में छुट्टी देने का क्या औचित्य बनता है? 


सरकारी विभाग पिछड़ा फिर भी मौज
अक्सर हम बात करते हैं कि अमेरिका इत्यादि देश हम से इतने आगे क्यों हैं? तो एक रीजन ये भी है कि वहां हमारे यहाँ की तरह इतनी ज्यादा छुट्टियां नहीं होती हैं. अगर अमेरिका की बात करें तो वहां 10 से 11 सरकारी छुट्टी ही होती है. विदेशों की तो बात ही छोड़िये हमारे देश में ही प्राइवेट सेक्टर में इतनी छुट्टियां नहीं होती है और शायद एक यह भी बड़ी वजह है कि हर क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. और रेलवे से लेकर बिजली विभाग तक को प्राइवेट सेक्टर को दिए जाने की मांग होती रहती है. इसके उलट सरकारी विभाग के लगातार पिछड़ने के बाद भी उन्हें छुट्टियों के रूप में सौगात दिया जाना समझ से परे है.  


कब छुट्टी हो और कब नहीं हो...
ऐसा नहीं है कि समाज में छुट्टियां होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि जिन त्योहारों  में समाज और परिवार की सहभागिता हो जैसे: होली, दिवाली, दशहरा, ईद, गुरु पूर्णिमा, क्रिसमस इत्यादि तो इन अवसरों पर कार्यालयों और विद्यालयों का बंद होना समझ में आता है. लेकिन वाल्मीकि जयंती, अग्रसेन जयंती और उर्स जैसे अवसरों पर क्यों बंद हों कार्यालय? इन अवसरों को मनाने का मतलब है कि इन महापुरूषों के आदर्शों को समाज को बताया जाय और उनकी राह पर चलने के लिए प्रेरित किया जाये. ताकि जहाँ बच्चे इनसे कुछ सीख सकें तो वहीं बड़े इनके आदर्शों को फिर से याद कर सकें. 

क्या होंगे फायदे?
अगर सच में योगी सरकार ने इस विषय पर पहल करते हुए बेवजह की छुट्टियों को खत्म कर दिया तो निःसंदेह ही स्कूली बच्चों के साथ -साथ  उत्तरप्रदेश भी विकास की तरफ एक कदम आगे बढ़ाएगा. ज्यादा दिन कार्यालय खुलने से सालों से पेंडिंग पड़े काम संपन्न हो पाएंगे तो वहीँ आम लोगों को भी काफी सहूलियत होगी जब समय से उनके काम पुरे हो जाया करेंगे. 

हालाँकि, किसी को भी इन छुट्टियों के ख़त्म हो जाने को लेकर ऐतराज नहीं होना चाहिए, पर राजनीति भी तो है. क्या वाकई राजनीति से पार पाकर योगी आदित्यनाथ की सरकार सुधार की दिशा में आगे बढ़ेगी? यदि सच में ऐसा होता है तो निःसंदेह यह एक सराहनीय कदम होगा. 
- विंध्यवासिनी सिंह

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