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Sunday, 18 November 2018

क्या ये कट्टरपंथ की आहट है?

17:10




अभी कुछ दिनों पहले ही सुरक्षा एजेंसियों ने पंजाब में संभावित हमले को लेकर एक अलर्ट जारी किया था हालाँकि राज्य सरकार का कहना है कि सुरक्षा की दृष्टि से पंजाब में हाई अलर्ट लगा दिया गया था लेकिन आज एक आतंकी हमले में 3  लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी है. ज्ञात हो कि पंजाब के अमृतसर के एक गांव राजासांसी में निरंकारी भवन पर ग्रेनेड से हमला हुआ धमाका हुआ है. इसमें कम से कम 3 लोगों की मौत हो गई, जबकि 10 घायल हो गए हैं. बताया जा रहा है कि दो अज्ञात बाइकसवारों ने निरंकारी भवन में चल रहे साप्ताहिक  सत्संग के समय ग्रेनेड से हमला कर दिया. हालाँकि अभी तक किसी आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन इस घटना के बाद शक की सुई तमाम दिशाओं में घूम रही है. कहीं इस घटना के सन्दर्भ में आतंकी मूसा का नाम आ रहा है, तो कोई इसमें पाकिस्तान का हाँथ बता रहा है, इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी के विधायक एचएस फुल्का ने तो सीधे तौर पर सेनाध्यक्ष विपिन रावत पर ही शक कर डाले हैं. वहीं सब के बीच सबसे अधिक सुगबुगाहट हो रही है सिख कट्टरपंथ की.   
इसी साल यानि जून 2018  से ही पंजाब के फ़रीदकोट ज़िले के बरगाड़ी गांव में कुछ लोग पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह  बादल के साथ ही उनके शासन के समय कार्यरत पुलिस डिपार्मेंट के अधिकारीयों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि 2015 में हुए धार्मिक ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान के मामले में बादल सरकार ने कोई कार्यवाई नहीं की. बता दें कि 2015 पंजाब के कुछ शहरों में गुरुग्रंथ साहिब के फटे हुए पन्ने सड़कों पर मिले थे. वहीँ इस तरह के प्रदर्शन को लेकर कहीं न कहीं इस बात की चर्चा भी हो रही है कि अपनी राजनीतिक महत्वाकांछा के लिए फिर से अलगाववाद और समाज को बाँटने की राजनीति पर जोर दिया जा रहा हैं.

एसजीपीसी से बादलों के दबदबे को ख़त्म करने का दबाव 

साल 1925 में गठित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानि एसजीपीसी में कुछ समय से बादल परिवार ने अपनी पैठ बना ली हैं, इसके उलट पिछले 30 सालों से कांग्रेस सिख धार्मिक मामलों और एसजीपीसी में एंट्री के लिए हाँथ पैर मार रही है. अब जब मौजूदा समय में कांग्रेस की सरकार है और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह अक्सर यह बयान देते हुए दिख जा रहे हैं कि वो एसजीपीसी से बादलों को निकाल फेंकना चाहते हैं. अमरिंदर सिंह की इस छटपटाहट को जानकर कट्टरपंथियों के बढ़ावे के रूप में देख रहे हैं. क्योंकि कट्टरपंथी ध्यान सिंह मंड नेतृत्व में चल रहे बरगाड़ी के इस प्रदर्शन को लेकर मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह कुछ ज्यादा गंभीर नहीं लग रहे हैं. हालाँकि जानकारों का कहना है कि इस तरह के बे रोकटोक प्रदर्शन से कट्टरपंथ की आग को एक बार फिर से आग न दी जाये. क्योंकि पंजाब पहले ही इस आग का शिकार हो चूका है और सिर्फ पंजाब ही क्यों पुरे देश को इस आग की तपिस महसूस हुई थी. बता दें कि पंजाब को भारत से अलग देश बनाने के लक्ष्य से अभी देश और विदेश में कई सारी  संस्थाएँ काम कर रही हैं जिनमे से प्रमुख है, रेफरेंडम 2020 तथा सिख्स फॉर जस्टिस. अभी इसी साल जून में हथियारों और पोस्टरों के साथ पंजाब के बटाला में तीन खालिस्तान समर्थकों को पुलिस ने  गिरफ्तार किया है. ये तीनों सिख्स फॉर जस्टिस से सम्बन्ध रखते हैं. वहीं इन कट्टरपंथियों का प्रदर्शन भारत में ही नहीं बल्कि कनाडा इंग्लैंड समेत अन्य देशों में प्रदर्शन तक भी फैला है. ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि पंजाब को अलग खलिस्तान बनाने की मांग ने दम तोड़ दिया है लेकिन इस तरह के संगठनों के सक्रीय होने और इनके समर्थकों द्वारा लगातार रैलियों के सम्बोधित करने को सिरे से नाकारा नहीं जा सकता है. इसलिए पंजाब में मौजूदा कांग्रेस सरकार अभी से एक्टिव हो जाये तो जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी घटना के भविष्य में होने की सम्भावना कम हो जाएगी.

-विंध्यवासिनी सिंह 





Saturday, 17 November 2018

शादी की संस्था' में बढ़ता 'विश्वास'

06:10


कहा जाता है कि धरती पर 84 लाख योनियाँ मौजूद है, और इन्ही योनियों को पार करते हुए अंत में मनुष्य का जन्म होता है. ये भी सब जानते हैं कि मनुष्य सभी जीव -जंतुओं से श्रेष्ठ है. अगर हम ध्यान दें तो आसानी से समझ सकते हैं कि अपनी निष्टा, कर्तव्य निभाने और ज़िम्मेदारियाँ निभाने की प्रवृति के कारण ही मनुष्य सबसे श्रेष्ठ है. उन्हीं जिम्मेदारियों में से एक है वैवाहिक जीवन को अपनाना. इस जिम्मेदारी में जहाँ दो अजनबी इंसान साथ मिलकर रहने, सुख-दुःख में भागीदारी और मौत तक साथ न छोड़ने का वादा करते हैं तो वहीं संतानोत्पत्ति के द्वारा अपनी पीढ़ी को भी आगे बढ़ाते है. शादी की यह परम्परा लगभग पुरे विश्व में अलग -अलग रूपों में मौजूद है. फिर ऐसा क्या हो गया कि आज की युवा पीढ़ी का शादी नाम की संस्था से विश्वास उठता जा रहा है. लोग शादी ना कर लिव इन रिलेशनशिप में रहना चाह रहे हैं. अब तो यह आम बात हो गयी है कि युवा पीढ़ी अपनी आधी उम्र बिना शादी के बिता दे रही है. ऐसे में  बॉलीवुड कलाकार रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की शादी ऐसे लोगो के लिए उदहारण है जो यह मानते हैं कि जब सबकुछ मिल रहा है तो शादी की क्या जरुरत है.  दीपिका और रणवीर ही क्यों इस साल कई सारी बड़ी सेलिब्रिटीस ने शादी की है या करने वाले हैं, कुछ समय पहले ही अनुष्का और विराट कोहली, सोनम और आनंद आहूजा तथा नेहा और अंगद ने विवाह के बंधन में बंधने का निर्णय लिया. इसके साथ ही बॉलीवुड के साथ ही हॉलीवुड में तहलका मचाने वाली प्रियंका चोपड़ा भी अपने विदेशी मंगेतर निक जोनस के साथ जल्दी ही शादी करने वाली हैं. इन सेलिब्रिटीज को किस बात की कमी है जो विवाह संस्था में विश्वास दिखा रहे हैं. क्या इन्हे बिना विवाह के साथी की कमी थी या ये IBF तकनिकी से बच्चा पैदा नहीं कर सकते थे. लेकिन इन बड़े लोगों ने इस विवाह संस्था को अपनाया है तो जरूर इसमें कोई खास बात होगी. 


जिसको हम ऐसे समझ सकते हैं कि जिम्मेदारियां आपको मनुष्य मनुष्य बनती हैं. क्योंकि धरती पर तो जानवरों ने भी भी जन्म लिया है लेकिन हम इंसान उनसे बेहतर क्यों है? शायद इसलिए कि हम ज़िम्मेदारियाँ उठाते हैं, किसी के प्रति समर्पित रहते हैं.और यही वजह है कि मनुष्य कि श्रेणी सबसे उत्तम है. हमारे ग्रंथों में भी कहा गया है कि विवाह का उद्देश्य क्रमशः विषयाशक्ति से मुक्त होकर ईश्वर की और बढ़ना है. इसका सीधा सा अर्थ है कि जब हम किसी के साथ विवाह बंधन में बंधते हैं तो संयम धारण करने की क्षमता अपने आप बढ़ने लगती है. हम विषय विकारों से दूर किसी एक चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने लगते है. और इन्ही गुणों के कारण हमें इंसान कहलाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है. इसमें कोई शक नहीं है कि हम जिस समाज में रह रहे हैं वो समाज मानव जाति के अनवरत प्रयत्नों, संघर्षों, उपलब्धियों, अविष्कारों आदि के कारण बना है जिसमें मुख्य भूमिका विवाह का भी रहा है. जब मनुष्य को यह एहसास हुआ कि उसके लिए अकेले रहने की अपेक्षा झुण्ड में रहना सुरक्षित है तो उसने इसमें रहने के कुछ नियम बनाये जिससे समाज में समरसता बनी  रहे उन्ही में से एक है विवाह के नियम. ऐसा माना जाता है की मानव समाज में विवाह की शुरुआत  19  वीं शताब्दी में हुई. इससे पहले  किसी भी पुरुष को किसी भी महिला के साथ सम्बन्ध बनाने का अधिकार प्राप्त था. इसके साथ ही हिन्दू समाज में इस विचार ने जन्म लिया कि उनके बाद  उनकी  संतान उनका नाम को आगे ले जाएगी इसके साथ ही उनकी संपत्ति की देखरेख के साथ ही वृद्धावस्था में उन्हें सहारा भी  देगी. सिर्फ हिन्दू समाज ही क्यों पश्चिमी देशों में भी विवाह का चलन है विवाह में विश्वास है. आपको याद होगा कि हॉलीवुड के मशहूर कलाकार ब्रैड पिट और एंजलीना जोली का जब तलाक हुआ तो कैसे  ब्रैड पिट डिप्रेशन में चले गए थे. इसलिए ये कहना जरुरी है कि अगर किसी वजह से कहीं विवाह असफल होने  की खबर आती है  तो उससे निराश होने की बजाय उसके सकरात्मक पहलुओं के बारे में विचार किया जाना चाहिए. हुए इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है वो विवाह संस्था की जगह ले सके.  इसी के साथ हम नवदम्पत्ति दीपिका और रणवीर के लिए शादी की देश सारी शुभ कामनाएं है और ये उम्मीद है की वो एक आदर्श पति-पत्नी साबित हो और युवा पीढ़ी के लिए आदर्श स्थापित कर पाने सफलता पाएं.


- विंध्यवासिनी सिंह  


Thursday, 15 November 2018

सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने के सपने पर लटकी तलवार

07:50




मध्यप्रदेश की तरह ही राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा नहीं की है. जैसा की सब जानते हैं राजस्थान में कांग्रेस दो गुटों में बँटी हुई है, एक गुट दो बार मुख्यमंत्री रहे फ़िलहाल में  कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत का है तो दूसरा गुट कांग्रेस प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व युवा नेता सचिन पायलट का है. वहीं पार्टी के पुराने नेता व कार्यकर्त्ता फिर से गहलौत की अगुआई चाहते हैं तो पार्टी के युवा कार्यकर्त्ता अपने नेता के सचिन को मुख्यमंत्री के कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं. हालाँकि इस गुटबाजी पर मिट्टी डालने के राहुल गाँधी ने एंडी से छोटी लगा दिया था. राहुल की ये भरपूर कोशिश रही की जनता में यह मैसेज जाये कि पार्टी एक है. इसके लिए राजस्थान में राहुल गाँधी ने जितनी भी रैलियां किया सब जगह इन दोनों नेताओं को मंच पर एक साथ बैठाया. इतना ही नहीं कांग्रेस ने मध्यप्रदेश की तर्ज पर राजस्थान में भी सीनियर नेताओं को चुनाव न लड़कर पार्टी की जीत की रणनीति तैयार करने के मुद्दे पर मना लिया था और गहलौत लगभग मान भी गए थे. इसीलिए ये लगभग यह तय माना जा रहा था कि कांग्रेस पार्टी के जीत के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में सचिन पायलट शपथ ले सकते हैं. वहीं अभी  राहुल गाँधी द्वारा गहलौत और सचिन पायलट दोनों के चुनाव लड़ने के घोषणे के बाद ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि इस कदम के बाद सचिन के मुख्यमंत्री बनने के सपने पर संकट आ सकता है. हालाँकि सचिन पायलट के राह में कुछ और भी कांटें हैं जिनका ज़िक्र हम करना चाहेंगे.

आसान नहीं है गहलोत के तिलिस्म को तोड़ना
यह जरूर कहा जाता है कि राहुल गाँधी और सचिन पायलट की आपस में  बहुत बनती है, इतना ही नहीं सचिन के रूप में राहुल राजस्थान का भविष्य देखते हैं. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि चुनाव के समय राहुल अशोक गहलौत से भी उतनी ही करीबी और विश्वास दिखा रहे हैं. इसके अलावा भी अशोक गहलोत दो बार राजस्थान में मुख्यमंत्री रह चुके हैं और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ हैं. वहीं अशोक गहलोत के साथ एक प्लस पॉइंट यह भी हैं कि वो राजस्थान के जिस जाती से सम्बन्ध रखते हैं उस जाती को काफी सभ्य और शांत माना जाता हैं. इतना ही नहीं राजस्थान की पिछड़ी जातियां अपने आप को इस जाती के लोगों से सुरक्षित महसूस करती हैं. ऐसे में अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो इसके चांसेस बहुत ज्यादा हैं कि गहलोत को दुबारा मुख्यमंत्री बनाने की मांग की जाये.


बाहरी होने की छवि से निकलना
अगर रिसर्च की माने तो राजस्थान में इस समय युवा वोटर्स की संख्या बढ़ी है, ऐसे में यह उम्मीद की जा रही है कि युवा होने के नाते सचिन पायलट इन युवा वोटर्स को लुभाने में कामयाब हो सकते हैं. लेकिन सचिन के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वो पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं जिसका उन्हें अनुभव नहीं है. दूसरी समस्या यह है कि जब उनके सामने अशोक गहलौत जैसा धुरंधर होगा तो उनके बाहरी होने पर भी सवाल उठेगा. बता दें कि सचिन पायलट उत्तर प्रदेश के नोएडा से सम्बन्ध रखते हैं. वहीं सचिन को लेकर एक और बात टकराएगी कि वो गुज्जर समुदाय से हैं जिसको लेकर जाट और मीणा समुदाय के लोग अच्छा नहीं मानते हैं.
अब सब कुछ चुनाव परिणाम पर निर्भर करता है अगर चुनाव में कांग्रेस भारी मतों से जीतती है तो निःसंदेह राहुल गाँधी चाहेंगे कि उनके चहेते सचिन पायलट राज्य की कमान संभालें मगर गलती से भी जोड़-तोड़ की राजनीति हुई तो कुर्सी अशोक गहलौत के पास भी जा सकती है.

- विंध्यवासिनी सिंह





Wednesday, 14 November 2018

'वाटर वे' से बदलेगी वाराणसी की तस्वीर

04:14
आखिर इनोवेशन की चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए देश में अगर आप खबरों की ओर ध्यान दें तो इतनी नकारात्मक खबरें दिखेंगी की कभी-कभी आपको प्रतीत होगा कि सच में कुछ सकारात्मक है भी या नहीं, या  सच में कुछ इनोवेटिव हो रहा है या कुछ इनोवेशन नहीं हो रहा है. मीडिया वास्तव में दो हिस्सों में बात हुआ  दिखता है एक तरफ वह लोग हैं जो सिर्फ उन्हीं बातों को दिखाते हैं जिनसे भावनात्मक रूप से समर्थन जुटाया जा सके अपने नेता के लिए वोट बटोरा जा सके. वहीं दूसरी तरफ ऐसा मीडिया है जिसे सिर्फ और सिर्फ सरकार की आलोचना ही दिखाई देती है वह भी कई बार तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल गलत सिर्फ शोर मचाता हुआ सुनाई देता है. इसके कई उदाहरण दिया जा सकते हैं जैसे हाल फिलहाल राफेल का मुद्दा छाया हुआ है और अगर इसकी आलोचना की तरफ आप ध्यान दें तो सिर्फ और सिर्फ गुमराह करने वाली बातें ही सामने आ रही है. जैसे सीबीआई का मैटर उठा तो इसमें तर्क यह दिया जा रहा है कि सीबीआई के डायरेक्टर अपने आप ही इस मामले की जांच करने वाले थे जिसमें किसी प्रकार की प्रथम दृष्टया सच्चाई नजर नहीं आती है. यह एक अलग विषय है लेकिन इस आलोचना और भक्ति के दौर में क्या हम इनोवेशन इनोवेटिव खबरों की तरफ भी ध्यान दे रहे हैं यह एक बड़ा प्रश्न है. 

अभी आप देखें तो अपने हाल की वाराणसी  यात्रा में नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार जल परिवहन की योजना को मूर्त रूप देने की कोशिश की है वह अपने आप में अद्भुत है. हालांकि वाराणसी में जल थल और नव तीनों क्षेत्रों में परिवहन को बेहतर करने की कवायद हुई है परियोजनाएं उद्घाटित की गई लेकिन इन सब में जल परिवहन को प्रोफेशनल रूप देना बेहद चर्चित और इनोवेटिव कदम है. हवाई यातायात के बारे में हमें पता है कि वह बहुत महंगा है रेल यातायात पर भी काफी हद तक दबाव पड़ जाता है ट्रेनें लेट हो जाती है माल ढुलाई का काम लेट होता जाता है. ऐसे में कोलकाता हल्दिया से लेकर इलाहाबाद वाराणसी तक जल परिवहन गंगा के माध्यम से शुरू करना बेहद इनोवेटिव कदम माना जा सकता है. वहीं  PM मोदी के इस कदम की  इतनी चर्चा नहीं हुई जितनी मेनस्ट्रीम मीडिया में होनी चाहिए थी. आखिर क्या कारण है कि अच्छे कामों की ,इनोवेटिव कामों की चर्चा से मेनस्ट्रीम मीडिया बचता  रहता है जबकि अगर कोई नेता कुछ अनर्गल बयानबाजी करते तो वह उछल कूद मचा देता है. इतना ही नहीं अपनी उछल कूद के दौरान मिडिया यह  भूल जाता है कि असल में एक पत्रकार या मीडिया हाउस के तौर पर उसका मूलभूत कर्तव्य क्या है. इस सन्दर्भ में हम वाराणसी की बात करें तो प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के नाते अक्सर खबरों में यह दिखाया जाता है कि सांसद रहते PM ने वाराणसी का विकास नहीं किया. वहीं ग्राउंड रिपोर्ट की माने तो वाराणसी में निश्चय ही बदलाव और विकास दीखता है. 


वाराणसी की बदली तस्वीर 
 जैसा कि हम सब  जानते हैं कि PM मोदी वाराणसी से सांसद हैं और देश के प्रधानमंत्री ऐसे में लोगों की उम्मीदें अपने आप ही बढ़ जाती हैं कि वाराणसी का कायाकल्प हो जाना चाहिए. लेकिन अक्सर यह चर्चा होती हैं कि PM  ने वाराणसी के लिए कुछ नहीं किया. लेकिन अगर वास्तविक तथ्यों की बात की जाये तो वाराणसी में पिछले 4 सालों में  126 प्रोजेक्टों को पूरा करने का काम किया गया हैं. जिसमें सर्वाधिक वाराणसी के घाटों के सुंदरीकरण
की चर्चा रही. सिर्फ घाटें ही क्यों क्यों वाराणसी के सड़कों , तंग गलियों, सीवर से लेकर पेयजल तक की व्यवस्था में मोदी सरकार ने 4679.79 करोड़ खर्च किये हैं. और इस बात को वहां के मूल निवासी मानते भी हैं. वहीँ इस बात में कोई दो राय नहीं हैं कि पीएम मोदी के सरकार में वाराणसी में बिजली व्यवस्था काफी दुरुस्त हुई है. वहीं वाराणसी से बाबतपुर तक जाने वाले दो लेन वाले रास्ते को फोरलेन में तब्दील किये जाने की भी योजना है. इस योजना के पूरे हो जाने के बाद आप सोच सकते हैं कि एयरपोर्ट से आने वाले सवारियों के लिए कितनी सुविधा 
हो जाने के साथ है समय की काफी बचत भी हो जाएगी.

वाराणसी का "वाटर वे" बनेगा मिशाल 
 वाराणसी से हल्दिया के बीच वाटर वे का शिलान्याश कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है. बता दें की इस वाटर वे के निर्माण के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए व्यापर के नए रास्ते खुलेंगे. क्योंकि सड़क मार्ग की अपेक्षा इसमें काम लागत और कम समय लगेगा. वहीं अगर दूसरे पक्षों की बात करें तो अपने देश में महंगा हवाई किराया और अत्यधिक भार ढोते रेलवेज की हालत किससे छुपी है. आलम तो यह है कि शादी -व्याह और तीज -त्योहारों के समय में ट्रेन में सीट न मिलने और सड़क मार्ग अत्यंत व्यस्त होने के कारण कई बार लोग अपने घर तक नहीं पहुँच पाते है. वहीं इस मार्ग के शुरू होने के साथ ही मालवाहक जहाजों के साथ पब्लिक आवागमन को भी बढ़ावा मिल सकता है. वहीं जब एक जगह यह प्रयोग सफल हो गया तब देश भर में ऐसे नदियों को जोड़ कर परिवहन को नया आयाम देने के साथ ही काफी सुविधाजनक और सस्ता भी बनाया जा सकेगा. वाराणसी के वाजिदपुर में आयोजित PM मोदी की 15वीं  जनसभा में  स्वयं पीएम ने इस बात का ज़िक्र किया कि देश भर में इससमय 100 से भी ज्यादा  नैशनल वॉटर हाइवे पर काम चल रहा है और जल्दी ही इस निर्माण के साथ ही देश एक नयी तरह के परिवहन का आनंद लेगा. एक बात और निश्चित है कि गंगा नदी में क्रूज़ चलने से टूरिज़्म को भी बढ़ावा मिलेगा और टूरिस्टों के आने से निश्चित ही रोजगार बढ़ेगा.

इसके साथ ही अंत में एक बार इस बात को फिर से दुहराना चाहेंगे कि मिडिया के द्वारा आलोचना अपनी जगह उचित है लेकिन प्रयासों और कार्यों की सराहना भी की जानी चाहिए. ऐसा हो सकता है वाराणसी के विकास का जो सपना लोगों ने देखा होगा उसमें कोई कमी होगी लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि वाराणसी में बदलाव हुए हैं और वहां की जनता भी महसूस कर रही है.  इसलिए मिडिया को छोटे- छोटे बयानों के साथ ही छोटे -छोटे कार्यों को दिखाने में कोताही नहीं करनी चाहिए.


-विंध्यवासिनी सिंह 



Monday, 12 November 2018

RSS से शुरू हो कर अनंत में विलीन

11:02



दक्षिण के राज्यों में हमेशा से जमीन तलाश रही बीजेपी आज जो भी फसल काट रही है उसमे सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वो निश्चय ही अनंत कुमार का रहा है. जनता के बीच में वो कितने लोकप्रिय थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता कि लगातार वो 6 (1996, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014) बार सांसद रहे. वहीँ उनके राजनीतिक कद का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वो हमेशा से ही केंद्र के करीबी रहे हैं चाहे सरकार में अटल जी हो या नरेंद्र मोदी. इसके साथ ही आडवानी जी के साथ उनकी करीबी किसी से छुपी नहीं है. निःसंदेह ही बंगलौर की राजनीति में सितारे की तरह चमकने वाले अनंत कुमार के जाने के बाद उनका स्थान लम्बे समय तक रिक्त रहेगा.

उत्तर भारत और दक्षिण की राजनीति में बने सांस्कृतिक पुल
वैसे दो दक्षिण की राजनीति में तमाम बड़े नेता हुए लेकिन उनका वर्चस्व दक्षिण तक ही सीमित रह गया. लेकिन अनंत कुमार इस मामले में सबसे आगे थे और इसका एक मुख्य कारण था हिंदी पर उनकी मजबूत पकड़. हिंदी जानने के कारण अनंत कुमार ने उत्तर भारत की राजनीति में भी बराबर दखल रखी. इतना ही नहीं दोनों राज्यों के बीच सांस्कृतिक महत्वों को भी बरक़रार रखा. वहीं अनंत कुमार ने यह भी साबित किया है कि उन्हें अपनी मातृभूमि और मातृभाषा से भी बेहद लगाव है. ज्ञात हो कि अननत कुमार पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने अंतरराष्‍ट्रीय मंच संयुक्‍त राष्‍ट्र में क्षेत्रीय भाषा 'कन्नड़' में बड़ी ही बेबाकी से भाषण दिया.

दृढ़इच्छाशक्ति के धनी
 ये उनकी इछाशक्ति ही है कि 1987 में बीजेपी के युवा मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद 1996 में  बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव तक बन गए. वहीं आपातकाल के समय इंदिरा गाँधी के विरोध के लिए उन्हें 30 दिनों तक जेल में भी बिताना पड़ा था. आरएसएस के विचारों से सर्वाधिक प्रभावित होकर अनंत कुमार ने 1985 में ही ABVP ज्वाइन कर ली जहाँ उन्होंने पहले  प्रदेश सचिव और फिर राष्‍ट्रीय सचिव का कार्यभार संभाला. इन सब से अलग 1998 से ही अनंत कुमार अपनी मां गिरिजा शास्‍त्री की याद में  ‘अदम्‍य चेतना’ नाम से एक एनजीओ चला रहे हैं जहाँ लगभग 2 लाख से अध‍िक बच्‍चों को मिड-डे मील के तहत खाने की व्यवस्था की जाती है.

विवादों में भी आया नाम 
बंगलौर में एक तरफ जहाँ बीजेपी की जड़े ज़माने में अनंत कुमार ने कोई कशर नहीं छोड़ी वहीं कर्नाटक के दिग्गज नेता येदुरप्पा के साथ उनकी प्रतिद्वंदिता किसी से छुपी नहीं है. कहा तो यहाँ तक जाता है कि इसी प्रतिद्वंदिता का नतीजा था कि कर्नाटक बीजेपी में दो फाड़ हो गए और अंत में येदुरप्पा को बीजेपी तक छोड़नी पड़ी. हालाँकि मोदी सरकार में जहां एक तरफ येदुरप्पा की वापसी हुई तो दूसरी तरफ अनंत कुमार  बीजेपी के पूर्व दिग्गज नेताओं की तरह प्रधानमंत्री मोदी के प्रिय भी बने. जहाँ तक राजनीति की बात है तो यहाँ किसी का भी दामन कहाँ दागों से बच पाता है. राजनीति में दोषारोपण तो चलता रहता है लेकिन इसमें कोई शक नहीं  कि बेंगलौर की राजनीति में अनंत कुमार के रूप में हुई क्षति का भरपाई मुश्किल है.

-विंध्यवासिनी सिंह 







Sunday, 11 November 2018

सेल्फी ...जान से बढ़ कर है क्या?

06:21



सेल्फी...
वो फोटो जिसको खींचने में किसी दूसरे की जरुरत न पड़े यानि की अपने हाथों से ही अपनी फोटो खिंच जाये. लोगों के ऊपर इसका इतना क्रेज है कि अब बड़ी -बड़ी मोबाइल कंपनियां अन्य फीचर्स के साथ ही सेल्फी कैमरे की तरफ ज्यादा ध्यान देने लगी हैं. आपको भी अपने आस-पास ऐसे बहुत सारे नज़ारे देखने को मिल जायेंगे जब लोग दुनिया को भूल सेल्फी लेने में मशगूल हो जाते हैं. कई बार तो खतरनाक जगहों और तरीकों को अपनाने से भी गुरेज नहीं करते. वैसे सेल्फी से होने वाली दुर्घटओं की खबरें अक्सर आती रहती हैं मगर इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है दिल्ली का नवनिर्मित और बहुप्रतीक्षित 'सिग्नेचर ब्रिज'. जहाँ इस  ब्रिज की  खूबसूरती और खूबियों की चर्चा होनी चाहिए वहां इस पर होने वाले संभावित दुर्घटनाओं की चर्चा हो रही है. दिल्ली के साथ ही पूरे देश की शान बढ़ाने वाले सिग्नेचर ब्रिज से गुजरने वाला हर शख्स इसकी भव्यता को अपने कैमरे में कैद कर लेने की चाहत में नियम कानून की धज्जियां तक उड़ा रहा है. 'सिग्नेचर' सेल्फी लेने की इस होड़ के चलते ब्रिज के दोनों तरफ भीड़ लग जा रही है तो कोई पोल पर चढ़कर तो कोई पुल की मुंडेर पर खड़े होकर सेल्फी ले रहे हैं. इतना ही नहीं लोग ब्रिज को बतौर सेल्फी प्वाइंट इस्तेमाल कर रहे हैं जो कि गलत हैं.
वहीं अगर हम इस ब्रिज की खूबियों के बारे में बात करें तो यह ब्रिज असिमेट्रिकल केबल वाला भारत का पहला ओवरब्रिज है जिसका उद्घाटन 4 नवम्बर को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने किया है. ये ओव​रब्रिज आउटर रिंग रोड को वजीराबाद से जोड़ता है. मगर अफ़सोस इस ब्रिज को शुरू हुए हफ्ते भी नहीं बीते कि लोग इसका भी मिसयूज शुरू कर दिए हैं.
अगर हम सावधानी पूर्वक लोगों की ऐसी मानसिकता और सेल्फी के क्रेज को समझें तो कुछ चीजे बड़ी ही आसानी से सामने आती है जिनके बारे में चर्चा करना अस्वश्यक है. जिसमे सबसे पहला नंबर है इंटरनेट का.

इंटरनेट ने किया घी में 'आग' का काम 

यह कहना गलत नहीं होगा कि इंटरनेट ने लोकप्रियता के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं. ऐसे में  इस नए रास्ते पर लोग आंख मूंद कर चल पड़े हैं  उपरोक्त  घटना को इसका एक उदाहरण समझा जा सकता है.  इंटरनेट के माध्यम से लोगरातों रात लोकप्रिय हो जाना चाहते है. हालाँकि यह गलत भी नहीं है गलत है तो इसका तरीका और मानसिकता अगर हम  यूट्यूब की ही बात करें तो केवल इस प्लेटफॉर्म पर  1.3 बिलियन से अधिक यूजर हैं, तो वहीं  फेसबुक पर 2 बिलियन से अधिक एक्टिव यूजर हैं.  यु-ट्यूब और फेसबुक के अलावा  दूसरे इंटरनेट-प्लेटफॉर्म्स भी यूजर्स की अच्छीखासी भीड़ है. ऐसे में सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म बड़ी मार्किट के रूप में मौजूद है. वहीं इसकी सबसे बड़ी खाशियत यह है कि ये प्लेटफॉर्म सभी के लिए बिलकुल ओपन है. शायद यही वजह है कि युवावर्ग इसके तरफ आकर्षित हो रहा है और किसी भी कीमत पर लोकप्रियता पाना चाह रहा है. लेकिन यह इतना भी सरल है जितना देखने में लगता है. युवावर्ग को यह समझना होगा कि कुछ भी अलग हट कर करने कि कोशिश में आप छड़िक सफलता तो जरूर हासिल कर लेंगे लेकिन यह लम्बे समय तक नहीं टिकता है.


मानवीय मूल्यों का संदेश जरुरी 
बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि हम जैसा करेंगे दूसरे भी वैसा ही अनुकरण करेंगे. इसलिए जब हम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई भी तस्वीर या कंटेंट डालते हैं तो यह याद रखना जरुरी हैं कि इसका असर दूसरों पर कैसा पड़ेगा. कहीं हम अनजाने में भीड़ को कुछ गलत करने के लिए तो नहीं उकसा रहे हैं.
कई बार देखने को मिलता हैं कि  ‘प्रैंक’ वीडियो बनाने के चक्कर में लोग  बच्चों और बूढ़ों तक को नहीं छोड़ते है और सामान्य मानवीय मूल्यों को भी ठोकर मार दे रहे हैं. इतना ही नहीं अक्सर ख़बरें आती हैं कि सड़क  के किनारे किसी का एक्सीडेंट हुआ हैं और वहां मौजूद लोग दुर्घटना पर लाइव विडिओ कर रहे हैं. और तो और सामने से आ रही ट्रेन के साथ भी लोग सेल्फी लेने कि कोशिश कर रहे हैं. इस सन्दर्भ में दुर्घटना की कई खबरें आ चुकी हैं. यहाँ यह बताना जरुरी हैं कि ‘सेल्फी’ लेते हुए जान जाने के मामले में भारत  का पहला स्थान हैं.




यह हमारे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं हैं कि तेज़ स्पीड इंटरनेट से हम मनोवांछित कार्यों को आसानी से कर पा रहे हैं. ऐसे में इसका उपयोग सार्थक कार्यों के लिए होना चाहिए न कि टाईमपास के लिए. सेल्फी लेना गलत नहीं हैं  लेकिन सेल्फी में खूबसूरती दिखे जो दूसरों को भी प्रेरित करे तब जाकर आप अच्छे फोटोग्राफर के साथ ही जिम्मेदार मनुष्य कहलायेंगे.
इसलिए एक बात समझना आवश्यक है कि सेल्फी तो लो लेकिन नियम में रहकर और सावधानी पूर्वक क्योंकि जब तुम ही नहीं रहोगे तो उस सेल्फी की क्या कीमत है?

-विंध्यवासिनी सिंह




Saturday, 10 November 2018

शत्रु संपत्ति को देश हित में खर्च हो जाना चाहिए

03:28





हाल के समय में भारत सरकार के रिजर्व बैंक से टकरा हट का मामला खबरों में छाया रहा था इसके अनुसार भारत सरकार रिजर्व बैंक से इसलिए पैसे मांग रही है ताकि मंदी के समय आर्थिक जरूरतों को पूरा किया जा सके खैर इस पर तो रब ही विवाद चल रहा है किंतु इस बीच एक अच्छी खबर यह आई कि सरकार शत्रु संपत्ति के शेयर बेचकर पैसे जुटाने वाली है इसके अनुसार मोदी सरकार ने क्या प्रोसेस होना चाहिए और किस तरीके से यह पूरी प्रक्रिया पूरी होगी इसके बारे में निर्णय कर लिया है और बताया जा रहा है एक सर्वे के अनुसार की तकरीबन 3000 करोड रुपए शत्रु संपत्ति को बेचकर प्राप्त किया जा सकता है

बताते चलें कि शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 इंडियन पार्लियामेंट द्वारा पास किया गया एक कानून है जिसके अनुसार उन सभी लोगों की संपत्ति पर भारत सरकार का अधिकार होगा जो बंटवारे या फिर 1965 या 1971 के वार के बाद पाकिस्तान चले गए और उन देश की नागरिकता ले ली उनकी तमाम संपत्ति शत्रु संपत्ति घोषित की जा चुकी है और पहली बार उस संपत्ति की को बेचकर धन जुटाने की बात कही जा रही है.
2016 में किरण रिजिजू में इसी बिल में संशोधन पेश किया जिसके अनुसार ना केवल पाकिस्तान बल्कि 1962 के चीन भारत युद्ध के बाद देश छोड़कर जाने वाले लोगों की संपत्ति भी शत्रु संपत्ति के अंतर्गत आ गई.
हालांकि इस अधिनियम को अदालत से चुनौती में मिली लेकिन वह खारिज हो गई और अभी भारत में तकरीबन 9000 शत्रु संपत्ति की पहचान की है जिनकी कीमत एक लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है.

क्या हैं इसके फायदे - बता दें कि इस वित्त वर्ष के  7 महीने पूरे होने के बाद भी सरकार ने मात्र 10,000 करोड़ रुपये ही इकठ्ठा किया है जो कि तय लक्ष्य  80,000 करोड़ रूपये से काफी कम है. ऐसे में सरकार अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए वर्षों से बेकार पड़ी शत्रु संपत्ति को बेचेगी. वहीं सरकार का कहना है कि इस बायबैक से मिली राशि से केंद्र के विनिवेश प्रोग्राम को बढ़ावा मिलेगा और इसका इस्तेमाल कल्याण कार्यक्रमों में किया जा सकेगा. एक तरह से देखा जाये तो यह सरकार का सार्थक कदम है ऐसे रजवाड़े जो देश की नागरिकता को छोड़ किसी अन्य देश की नागरिकता अपना चुके हैं ऐसे में यहाँ बरसों से पड़ी हुई उनकी सम्पति को देश हित में खर्च करना कुछ गलत नहीं है. एक सवाल यह उठाया जा रहा है जो लोग देश छोड़ गए उनके वारिश जो इसी देश देश के नागरिक है संपत्ति छीनने से उनके साथ अन्याय होगा. इस सन्दर्भ में बस यही कहा जा सकता है जो असली मालिक था वो तो दूसरे देश का नागरिक बन गया फिर से सम्पति ट्रांसफर कब हुई. इसलिए इस तरह के दलील में कुछ खास दम नहीं है. बता दें कि इस मामले में राजा महमूदाबाद के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट किसी भी मुद्दे पर किसी के पक्ष में कोई फैसला नहीं सुनाया है.

उत्तर प्रदेश में हैं ज्यादा शत्रु संपत्ति -  देश भर में कुल आंकी गयी  9,281 शत्रु संपत्तियों में अकेले उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 4,991 संपत्तियां हैं इसमें भी 125 से ज्यादा शत्रु संपत्तियां अकेले राजधानी लखनऊ में हैं. वहीं दूसरे स्थान पर है पश्चिम बंगाल जहाँ  2,735  शत्रु संपत्तियों का आंकड़ा पेश किया गया है. इसके साथ ही  दिल्ली में 487 संपत्तियां हैं. वहीं चीन गए लोगों से जुड़े 126 शत्रु संपत्तियों में मेघालय में 57 और पश्चिम बंगाल में 29 संपत्तियां हैं.

बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी है लागू शत्रु सम्पति का कानून
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने बहुत पहले ही लगभग बंटवारें के बाद  ही शत्रु सम्पत्ति का हवाला देकर भारत आये हिन्दुओं की जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया था. वहीं पाकिस्तान से अलग होने के बाद बांग्लादेश ने भी शत्रु संपत्ति नियम ला कर भारत और पाकिस्तान गए लोगों की सम्पत्तियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया. 

-विंध्यवासिनी सिंह 




Friday, 9 November 2018

कोर्ट का आदेश ही काफी नहीं, हमें भी जिम्मेदार बनना पड़ेगा

04:44





अक्टूबर के महीनें में दिल्ली के आसमान में छायी धुंध सर्दी के शुरू होने की निशानी नहीं है बल्कि यह बताती है कि दिल्ली कि आबो -हवा में जहरीली गैसों का बढ़ना शुरू हो गया है. वैसे तो दिल्ली की हवा में सालों भर प्रदूषण की मात्रा ज्यादा रहती है, लेकिन अक्टूबर - नवम्बर में तो ये जानलेवा स्तर पर पहुँच जाता है. पिछले साल यही प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानक से तीस गुना ज़्यादा बढ़ गया था, और डॉक्टर कहने लगगए थे कि दिल्ली में रहने वाला  हर व्यक्ति रोजाना 50 सिगरेट पीने जितना जहर अपने अंदर ले रहा है और अपने सांसे घटाता जा रहा है. यही नहीं इस दमघोटू धुंध के चलते पिछले साल स्कूलों तक को बंद करना पड़ा था. मगर अफ़सोस कि इस साल भी हम उसी स्थिति की तरफ अग्रसर है. अभी अक्टूबर ख़तम ही हुआ है लेकिन आप आसानी से मौसम में बदलाव को महसूस कर सकते हैं. वैसे  तो दिल्ली में प्रदूषण के तमाम कारण है लेकिन कुछ प्रमुख कारणों पर भी हम ध्यान दें तो निःसंदेह ही प्रदूषण के स्तर को कम किया जा सकता है.

क्यों ज्यादा बिगड़ जाती है दिल्ली की हवा 

 वैसे तो विश्व के सारे ही शहर प्रदूषण के चपेट में हैं लेकिन अपनी दिल्ली ने टॉप 5 प्रदूषित शहरों में अपना स्थान बना लिया है. नवम्बर से लेकर फ़रवरी तक हवा में प्रदूषण का लेवल डेंजर जोन से भी ऊपर चला जाता है. इसके सबसे प्रमुख करने में सबसे पहले बताया जाता है कि अक्टूबर में अंत में पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा खेत खाली करने के लिए धान की पराली को जलाया जाता है जिसका धुंआ दिल्ली में प्रवेश कर जाता है. वहीँ अगर आप गाड़ियों की बात करें तो एक सर्वे के अनुसार दिल्ली की सड़कों पर रोजाना 1400 नयी गाड़ियां उतरती है. हालाँकि कोर्ट ने पुराने डीजल वाहनों को दिल्ली में बंद कर दिया है लेकिन ट्रकों का अभी भी शहर से होकर अवागमन जारी है. इतना ही नहीं शहर में हो रहे धड़ल्ले से निर्माण कार्य भी काफी हद तक प्रदूषण को बढ़ा देते हैं. वहीँ सड़क के किनारे और मलबों के पास इकठ्ठा डस्ट भी हवा में घुल कर प्रदूषण को बढ़ाते हैं. इन सब के अलावा दिल्ली में निकलने वाले कचरे से कौन परिचित नहीं होगा, ये कचरे भी प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं.

कोर्ट के आदेश का कितना होता है असर

 लगभग हर साल सुप्रीम कोर्ट दिल्ली को साफ करने के मद्देनजर तरह -तरह आदेश पारित करती है जैसे पिछले साल पटाखों की बिक्री पर रोक लगाया था तो इस साल रोक के साथ दिवाली के दिन मात्र दो घंटे ही पटाखों को फोड़ने का आदेश दिया था, उसमें में कम आवाज वाले और छोटे पटाखें ही शामिल थे. मगर हर साल की तरह इस बार भी लोगों ने जम कर पटाखें फोड़े जिसका असर दिवाली की सुबह आसानी से देखा जा सकता था. कोर्ट ने तो कंस्ट्रक्शन साईट को भी हरे कपड़े से ढक कर रखने के आदेश दिए हैं मगर इसका भी पालन होते नहीं दीखता और कहीं होता भी है तो केवल नाम मात्र का. हालाँकि लोकतंत्र में यह सही नहीं है मगर सुप्रीम कोर्ट अगर कोई निर्देश देता है तो उसकी अनुपालना न होने की स्थिति में उसके पास संबंधित अधिकारियों या संस्थानों आदि पर अवमानना के आधार पर कार्रवई करने का अधिकार होता है.  इसलिए प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट को भी सख्त होने की जरुरत है.

दिल्ली में रहने वाला हर व्यक्ति है 'स्मोकर'

 तमाम बड़े डॉक्टर इस बात की चेतावनी देते हैं कि दिल्ली हवा में साँस लेने से फेफड़े पर जहरीली परत जम जाती है जिसका असर लम्बे समय तक रहता है. वहीँ वैज्ञानिकों का कहना है कि 'एक दिन में एक इंसान 25 हज़ार बार सांस लेता है. एक बार में वो 350 से 400 मिलीलीटर हवा अपने अंदर लेता है. जिसमें दिल्ली शहर में लोग रोजाना 10 हजार लीटर प्रदूषित और जहरीली हवा अपने अंदर लेते हैं. सीधे शब्दों में कहा जाये तो एक व्यक्ति रोजाना 20 से 25  सिगरेट पी रहा है. अगर गौर किया जाये तो एक बड़ा स्मोकर भी शायद ही एक दिन में इतनी सिगरेट पीता होगा. एक तरफ तो लगातार सिगरेट पीना जानलेवा बताया जा रहा है तो दूसरी तफर अनजाने में लोग इसके शिकार बन रहे हैं. 

क्या है जनता की जिम्मेदारी 

चिड़िया और किसान की कहानी आप सभी ने सुनी होगी जिसमें किसान अपने सभी सगे- सम्बन्धियों को फसल काटने की बात कहता है लेकिन चिड़िया निश्चिंत रहती है लेकिन जिस दिन वो स्वयं खेत काटने की बात कहता है तब चिड़िया अपने बच्चों को उड़ चलने की सलाह देती है. ठीक वैसे ही जब तक हम खुद जागरूक नहीं होंगे तब तक कोई भी सरकार या सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई असर नहीं होने वाला है. यह हमें सोचना होगा कि दिवाली पर चंद लम्हों की ख़ुशी के लिए जो अँधा -धुंध पटाखें हम फोड़ते हैं उसका कितना बड़ा नुकशान हमें और दूसरों को उठाना पड़ता है. इसके साथ ही गाड़ियों का कम से कम इस्तेमाल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. वैसे ही बेवजह ऐसी न चलाएं और सिग्नल पर गाड़ी का इंजन बंद कर दें. जिस दिन हम सब इन छोटी -छोटी बातों के बारे में सोचने लग जायेंगे उस दिन फर्क अपने आप नजर आने लगेगा. 

खूब फल-फूल रहा है एयर प्यूरिफ़ायर का बाजार 

कहतें हैं कि व्यापारी हर परिस्थिति में अपना मुनाफा देखते हैं. जी हाँ चारों तरफ प्रदूषण के हाहाकार में बाजार में एयर प्यूरीफायर से लेकर एयर मास्क की बिक्री में खूब रौनक रह रही है. डॉक्टरों द्वारा  मास्क लगाकर ही घरों से बाहर निकलने की सलाह और घर के वातावरण को साफ रखने के लिए लोग धड़ल्ले से मास्क और एयर प्यूरीफायर खरीद रहे हैं. सिर्फ साल   2017 में भारत में लगभग दो लाख एयर प्यूरीफ़ाइंग मशीनों की खरीददारी की गयी. वहीँ साल 2022 तक इस  बाज़ार को 14.5 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है.

सरकारें क्या करें 

यह हर साल का रोना है की पंजाब -हरियाणा के किसान पराली जलाते हैं और दिल्ली की हालत ख़राब हो जाती है. लेकिन इस मसले पर कोई भी ठोस कदम उठाते हुए नहीं देखा जा रहा है. वहीं जब दिल्ली में प्रदूषण असहनीय हो जाता है तो 10 - 5  दिन के लिए ऑड- इवेन स्किम लांच कर दी जाती है, जबकि इसका व्यापक असर होता नहीं दीखता है. अगर सच में दिल्ली की सरकार को लोगों की चिंता है तो इस दिशा में ठोस कदम उठाते स्थायी समाधान की तरफ विचार करती. जिसमें रिहायसी इलाकों के साथ ही पूरे दिल्ली में पड़ी मिट्टी की वैक्यूम के साथ पानी का छिड़काव शामिल है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बेहतर और लक्जरी बना कर भी काफी हद तक लोगों निजी गाड़ियों के इस्तेमाल से रोका जा सकता है. इतना ही एमसीडी के कर्मचारी जब सड़कों पर झाड़ू लगाते हैं तो बहुत सारा धूल हवा में उड़ा देते है सरकार को इस दिशा में भी कदम उठाने की जरुरत है कि कैसे कम से कम धूल उड़ाए और कूड़े को जलाये बिना सड़कों की सफाई की जा सके. ऐसे तमाम छोटी -छोटी चीजों पर अगर सालों भर ध्यान दिया गया तो निःसंदेह ही दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण में कमी आएगी. वहीं सरकर को काम करता देख लोग भी जागरूक होंगे.

-विंध्यवासिनी सिंह 


Friday, 2 November 2018

मंदिर मुद्दा- धैर्य जरुरी है

08:01

जब भी चुनाव आता है तब तमाम मुद्दों के साथ ही एक अहम् मुद्दा वर्षों से जनता के सामने गर्माता रहा है. यह मुद्दा कोई और नहीं बल्कि राम लला को घर देने अर्थात उनकी जन्मभूमि अयोध्या में राम -मंदिर का निर्माण कराने का है. इस बार जब बीजेपी की पूर्णबहुमत की सरकार है तब भी यह मामला साढ़े चार साल तक खींचता रहा, बता दें कि बीजेपी ने हमेशा से ही मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाया है और इसे बनवाने की प्रतिबद्धता दिखाई है. जिस तरह से बीजेपी और आरएसएस ने मंदिर निर्माण की पैरोकारी की है उस तरह जनता ने अगर आरएसएस की सहायता से बनी बीजेपी की सरकार से मंदिर निर्माण की उम्मीद लगायी है तो गलत क्या है?. लेकिन जैसा कि हम जानते हैं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ़ की पीठ ने अयोध्या मामले पर सुनवाई जनवरी 2019 के लिए टाल दिया है. इतना ही नहीं कोर्ट ने यह भी कन्फर्म नहीं किया है कि सुनवाई किस बेंच के सामने होगी या सुनवाई किस तारीख से शुरू होगी और इसका फ़ैसला कब आएगा. हालाँकि राजनीति के जानकारों का मानना है कि कोर्ट के इस फैसले से मंदिर मुद्दे का हल इतनी जल्दी निकलना मुश्किल है और इधर चुनाव में भी बहुत कम  समय बचे है. ऐसे में इस मसले पर बिना किसी ठोस हल के इस चुनाव में बीजेपी के सामने चुनौतियाँ कठिन होने वाली हैं. वहीँ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरफ से भी सरकार के लिए मुश्किल खड़े करने वाले बयान दिए जा रहे हैं. कुछ दिनों पहले ही आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार और संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी ने साफ कहा है अगर सर्वोच्च न्यायालय को निर्णय करने में कुछ कठिनाई आ रही है तो सरकार अध्यादेश ला कर मंदिर निर्माण का कार्य सुनिश्चित कराये. 


इधर आम लोगों के बीच भी मंदिर के फैसले को टालने से धैर्य जवाब देने लगा है उस पर से तमाम विपक्षी पार्टियों द्वारा लगातार इस आग में घी डालने का काम किया जा रहा है. बतादें कि कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद ही कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने बयान दिया कि बीजेपी चाहे तो मंदिर मामले पर कानून बनाए, कांग्रेस उसे नहीं रोक रही है. वहीँ महाराष्ट्र में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एलान किया है कि वो 25 नवंबर को अयोध्या जाएंगे और वहीँ से पूछेंगे कि प्रधानमंत्री मोदी कब अयोध्या आएंगे. उद्धव यहीं नहीं रुके और चैलेन्ज करते हुए बोले कि "अगर आपने राम मंदिर का निर्माण शुरू नहीं किया तो हम करेंगे. हम हिंदुओं को साथ लेकर ये निर्माण करेंगे. हिंदू किसी की जागीर नहीं हैं." सब जानते हैं कि 1992 में विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को गिरा देने के बाद हिंदू और मुसलमानों के बीच भड़के सांप्रदायिक दंगे में लगभग 2000 से ज़्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. और अभी भी इस मुद्दे पर बात करने पर दोनों सम्प्रदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. ऐसे में अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता को भड़काना कहाँ तक उचित है.

 जैसा कि सब जानते है हाईकोर्ट ने पहले मंदिर मामले में पहले जमीन का दो तिहाई हिस्सा हिंदू पक्ष को सौंप ही चुका है. और सुप्रीम कोर्ट को भी करोड़ों लोगों के भावनाओं का ख्याल रखते हुए न्याय पूर्ण फैसला ही सुनाना चाहिए. एक बात और ध्यान देने वाली है कि न ही विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस जैसी हिंदूवादी संगठनें भारत के सारे हिंदुओं की प्रतिनिधि है और न ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सभी मुसलमानों की नुमाइंदा है ऐसे में इन धार्मिक संगठनों को भी अपनी मर्यादा और हद समझनी चाहिए. यह सच है कि आम जनता ने अपने आराध्य भगवान राम के मंदिर निर्माण को लेकर बहुत इंतजार किया है, लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि किसी के भड़काने से आवेग में आ जाये. इसके साथ ही कोर्ट को भी अब टाल -मटोल के रवईया को ख़त्म करते हुए अपना फैसला सुना कर वर्षों से चले आ रहे इस विवाद को सुलझा देना चाहिए.


- विंध्यवासिनी सिंह 

Sunday, 1 July 2018

महिलाओं के साथ होने वाले अपराध के लिए कितना जिम्मेदार है समाज? Social Responsibility In Women Violence

03:26



 एक मल्टीनेशनल रिसर्च संथान थॉमसन रॉयटर्स फ़ाउंडेशन ने  अपने सर्वे में ये बात कही है कि  “सांस्कृतिक परंपराएं, यौन हिंसा और मानव तस्करी” के आधार पर भारत महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश है. वहीं यह सर्वे कितना सही है और कितना गलत इस लम्बी चर्चा का विषय हो सकता है लेकिन अभी 27 जून को मध्य प्रदेश के मंदसौर में 7 साल की बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई है उसके बाद किसी चर्चा की गुंजाइस नहीं बचती. और यही घटना क्यों सुबह से लेकर शाम तक अख़बारों, न्यूज चैनलों और समाचार के हर माध्यमों से आपको महिलाओं व बच्चियों के यौन शोषण व उत्त्पीडन, धर्म, जाति और अंधविश्वासी परंपराओं के नाम पर ग़रीबों और दलितों पर अत्याचार की खबरें मिलती रहती हैं. लेकिन कुछ घटनाएं जब मानवता की सीमा को पार कर जाती हैं तब लोगों का धयान उस पर जाता है. ऐसे ही जब दरिंदगी की मिशाल देते हुए 'निर्भया कांड' हुआ तो सारा देश जाग गया और सबका खून उबल पड़ा. देश के हर कोने से अपराधियों के लिए सजा की मांग हुई और बेटियों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा किया गया. वहीं सरकार ने भी 2013 में आनन -फानन में कई सारी योजनाएं बना डाली जिसमें 600 ऐसे केंद्र का निर्माण शामिल था जिसमें  एक ही छत के नीचे पीड़ित महिला को चिकित्सा, कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराया जा सके यहाँ तक कि निर्भया फंड के नाम पर 100 करोड़ का प्रावधान भी पेश किया गया जो कि अब बढ़ कर 300 करोड़ तक हो चूका है. हालाँकि इन सबका कोई असर नजर नहीं आ रहा है. अगर हम 2015  के अपराध के आंकड़ों पर नजर डालें तो 34,000 से ज्यादा सिर्फ बलात्कार के मामले सामने आये वहीं 2016 में यह आंकड़ा बढ़ कर 34,600 को भी पार कर गया. और अभी भी इसका बढ़ना जारी है. 


हमारी संस्कृति 
यह कहना गलत नहीं होगा कि दुनिआ भर में भारत केवल ऐसा देश है जहाँ औरतों की पूजा होती है. पुरुष देवताओं के साथ ही महिला देवियों की भी उपासना की जाती है. नवरात्रों में मानव कन्याओं के पैर पूजे जाते है और उन्हें देवी के स्थान पर बैठाया जाता है. रक्षाबंधन के त्यौहार पर अपना भाई या बहन ना होने पर गली - मोहल्ले के लड़के लड़कियों से राखी बांधना या बंधवाना सहज बात है. जहाँ घरों में औरतों को सम्मान और सुरक्षा देने का पाठ पढ़ाया जाता है.


कहाँ से आते हैं ये दरिंदे
ये सवाल बिलकुल वाजिब है कि जब चारों तरफ इतना अच्छा माहौल है तो फिर वो लोग कहाँ से आते हैं जो गणपति विसर्जन के दौरान  झुण्ड बना कर किसी लड़की को घेर लेते हैं, बस या ट्रेन में खड़ी महिला को पीछे से छेड़ते हैं. चौराहो पर खड़े हो कर महिलाओं पर फब्तियां कस्ते हैं और मौका मिलते ही किसी मासूम के साथ हैवानियत करने से भी पीछे नहीं हटते. इस तरह के लोगों के हौसलें इतने बुलंद कैसे हो जाते हैं कि ये कुछ भी करने से पहले हिचकते नहीं. ये किसी और दुनिया या ग्रह से तो नहीं आते हैं न बल्कि ये हमारे ही समाज का हिस्सा होते हैं.


कितना जिम्मेदार है समाज 
कुछ समय पहले किसी मुहल्ले के बुजुर्ग सभी के चाचा, दादा या काका हुआ करते थे. उस महल्ले की लड़कियां सभी की बहन और बेटी हुआ करती थी. किसी लड़की को अकेले देखने पर लोग हक से पूछ देते थे कि यहाँ क्या कर रही हो. वैसे ही किसी मुहल्ले वाले को कहीं देखने पर किसी लड़की या लड़के के मन में यह डर होता था कि वो हमें देख रहे हैं. मगर यह नजारा अब देखने को नहीं मिलता. मोहल्ला तो दूर अपनी बिल्डिंग के लोगों को भी अब लोग नहीं पहचानते है. एक दूसरे से अजनबी होते जा रहे हैं लोग. अगर रोड पर कुछ मनचले आवारगर्दी करते नजर आते हैं तो लोग मुँह फेर कर वहां से जल्दी से निकल लेते हैं. फिर क्या हक है हमें ऐसी घटनाओं पर छाती पीटने और सरकार या पुलिस को दोष देने का. जहाँ तक मेरा मानना है तो इन सब घटनाओं के पीछे सबसे अधिक समाज का रोल है. कोई छोटी स्कूली बच्ची कहीं अकेली जा रही है तो उसे टोकना किसी की जरुरत नहीं है, कोई लड़की अकेली बस स्टैंड पर खड़ी है तो उसे सुरक्षित महसूस कराना किसी की जिम्मेदारी नहीं है. फिर हम कितना भी कैंडल मार्च कर लें , शोसल मिडिया का डीपी काली कर लें उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. शुरू से ही समाज में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग रहे हैं लेकिन जब अच्छे लोग शिथिल पड़ जाते हैं अपने कर्तब्य को भूलने लग जाते हैं तब बड़ी आसानी से बुरे लोग उभर जाते हैं . याद रखिये अभी भी अपराधी गिने -चुने हैं और भले और सभ्य लोगों की संख्या ज्यादा है बस कमी है तो उनके  जगाने और अपने कर्तब्य को समझने की. ये समस्या हमारी है तो उपाय भी हमे ही सोचना होगा. 


- विंध्यवासिनी सिंह 



 




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